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रविशंकर प्रसाद बनाम शत्रुघ्न सिन्हा : कायस्थों का आपसी मामला

11 मई की शाम को आया यह संदेश पूरी तरह से स्पष्ट था. शत्रुघ्न सिन्हा के पैतृक निवास से कुछ ही मीटर की दूरी पर पटना के कदम कुआं क्षेत्र के सेंट सेवेरन स्कूल परिसर में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा थी. सिन्हा पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र से मौजूदा सांसद और कांग्रेस के उम्मीदवार भी हैं.

अगले दो घंटों में ही वह भीड़ एक बड़े शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बन गयी, जिसका नेतृत्व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने किया. ऐतिहासिक गांधी मैदान के पास उद्योग भवन से सभा स्थल तक पहुंचने से पहले शाह ने ठाकुरबारी, हथुवा बाजार, खेतान बाजार और बाकरगंज की संकरी गालियों से होकर रोड शो किया. शाह केंद्रीय विधि, न्याय और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री तथा बीजेपी उम्मीदवार रविशंकर प्रसाद के लिए प्रचार कर रहे थे.

रोड शो शुरू करने के लिए जगह के चुनाव पर किसी का भी ध्यान नहीं गया था, प्रमुख हिंदी दैनिक अख़बार हिंदुस्तान के पटना संस्करण ने शीर्षक लगाया- “शत्रु के घर में शाह का रोड शो”. प्रसाद ने भी शब्दों के साथ खेलने का मौका नहीं गंवाया. सिन्हा की पहचान बन चुका शब्द “खामोश” जो बॉलीवुड स्टार के तौर पर उनका तकिया कलाम था, को उनके प्रतिद्वंद्वी रविशंकर प्रसाद ने “अब पटना साहिब खामोश नहीं रहेगा” के नारे के रूप में उपयोग किया.

पटना साहिब, पटना नगर निगम क्षेत्र को कवर करने वाले दो लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है, दूसरी सीट पाटलिपुत्र है. यहां के निवासी 19 मई को लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में मतदान करेंगे. आकलन और पूर्वानुमानों की बात करें, तो सिन्हा के लिए 23 मई बहुत भारी पड़ने जा रहा है. बीजेपी के लिए पटना साहिब की एक बड़ी जीत किसी को भी हैरान नहीं करेगी, लेकिन सिन्हा की जीत से लोगों को ज़रूर आश्चर्य होगा. एक तरह से बीजेपी के अपने गढ़ में मुख्य चिंता विपक्ष की नहीं है बल्कि पार्टी के भीतर असंतुष्ट तत्वों की है.

2008 में परिसीमन प्रक्रिया के बाद, पटना साहिब को एक निर्वाचन क्षेत्र के रूप में पटना और बाढ़ को लोकसभा क्षेत्र बनाया गया था. 2009 और 2014 के दो लोकसभा चुनावों में, सिन्हा ने यहां बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की. बाद में पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना में सिन्हा काफी मुखर रहे. बीजेपी से उन्हें टिकट मिलने की उम्मीद थी नहीं, लिहाज़ा समय रहते उन्होंने पटना साहिब सीट से एक बार और किस्मत आज़माने के लिए कांग्रेस का दामन थाम लिया.

2014 में कार्यकर्ताओं और परंपरागत बीजेपी समर्थकों के समर्थन और मोदी लहर ने सिन्हा के ख़िलाफ़ नाराज़गी होते हुए भी सहजता से चुनाव जितवा दिया था. पटना साहिब लोकसभा सीट बीजेपी के लिएकाफ़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बीजेपी के परंपरागत सहयोगी कायस्थ मतदाता और व्यवसायी समुदाय की संख्या इस क्षेत्र के शहरी और उपनगरीय इलाकों में निर्णायक हैं. यहां कुल 19,46,249 मतदाता हैं, जिनमें 8 लाख 93 हजार 971 महिलायें और 10 लाख 52 हजार 278 पुरुष हैं. इस लोकसभा क्षेत्र में छह विधानसभाएं आती हैं, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, बख्तियारपुर और फतुहा. 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इन छह विधानसभा सीटों में से पांच में जीत हासिल की थी. एकमात्र फतुहा सीट राष्ट्रीय जनता दल ने जीता था. फिलहाल आरजेडी महागठबंधन का प्रमुख सहयोगी है. महागठबंधन की तरफ से सिन्हा को लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने टिकट दिया है.

प्रसाद और सिन्हा दोनों ही शहर की प्रतिष्ठित उच्च जाति यानि कायस्थ परिवारों से आते हैं और पारिवारिक मित्र होने के नाते, उन्होंने काफ़ी हद तक एक-दूसरे के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत हमला करने से परहेज किया है. हालांकि, पटना साहिब का चुनावी नतीज़ा तय करने में एक महत्वपूर्ण कारक है कि यहां कायस्थ वोट में विभाजन होगा या नहीं.

इस निर्वाचन क्षेत्र में कायस्थ मतदाताओं की संख्या को लेकर अनुमान अलग-अलग हैं. कायस्थों की कुल संख्या 3 से 5 लाख है, जो 15 से 20 प्रतिशत तक हैं. पिछले कुछ लोकसभा चुनावों में इस वोट बैंक को एकजुट रख पाना ही बीजेपी की सफलता की कुंजी रही है. हालांकि प्रसाद को ऐसा करने में दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे एक कायस्थ (सिन्हा) के अलावा, अरबपति व्यापारी और बीजेपी के राज्यसभा सांसद रवींद्र किशोर सिन्हा भी इस सीट से बीजेपी के टिकट के दावेदार थे. उन्हें टिकट न देना भी प्रसाद के ख़िलाफ़ जा सकता है, क्योंकि कायस्थों का एक हिस्सा उन्हें वोट नहीं देने की धमकी दे रहा है. आमतौर पर टिकट वितरण संबधी शिकायतों को सार्वजनिक नहीं करने वाली बीजेपी में इन दोनों नेताओं (प्रसाद और आरके सिन्हा) के समर्थकों के बीच एयरपोर्ट पर उस वक़्त  मारामारी और नारेबाजी देखने को मिली, जब प्रसाद पहली बार उम्मीदवार घोषित होने के बाद पटना पहुंचे थे.

हाल के वर्षों में आरके सिन्हा ने कायस्थ समाज से जुड़े तमाम सामुदायिक कल्याण कार्यक्रमों और आयोजनों के जरिये कायस्थों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के बीच अपनी लोकप्रियता सिद्ध की थी. अब बीजेपी की उनको मना पाने की क्षमता ही प्रसाद के अंतिम परिणाम पर अपना असर डालेगी.

कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव बिहार में काफ़ी हद तक शहरी इलाकों में सीमित रहा है. इनका दबदबा राज्य के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में रहा हैं. बिहार के सबसे बड़े प्रशासनिक जिले पटना में इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है. इसकी उत्पत्ति स्वतत्रंता से पहले बिहार की राजनीतिक जनसांख्यिकी के अध्ययन से पता की जा सकती है, जब औपनिवेशिक शासन ने अपने प्रशासन को मजबूत करने के लिए बिहार के शहरी सार्वजनिक निकायों में कायस्थों को प्रमुखता से स्थान दिया था. हालांकि यह क्रमिक था, लेकिन औपनिवेशिक शासन में कायस्थ प्रशासन का अग्रिम चेहरा थे.

अंग्रेजी राज से पहले भी लेखा संबंधी कार्य (निचली अदालतों में कामकाज) जैसे साक्षर व्यवसायों से जुड़े होने के कारण, उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक बिहार में जब पेशेवरों की मांग बढ़ी, तो कायस्थों ने इस ज़रूरत को पूरा किया. कलकत्ता (अब कोलकाता) बिहार पर शासन करने के लिए प्रशासनिक मुख्यालय था. 1912 तक शासन की प्रक्रिया में मध्यम दर्जे के क्लर्क, कर्मचारी, बाबू आदि अधीनस्थ कार्यबल, बहुत कम था. बदलते समय में खुद के लिए पेशेवर प्रासंगिकता खोजने की मजबूरी में शायद कायस्थों ने खुद को कलकत्ता विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा का लाभ उठाने की पहल की और फिर पेशेवर अवसरों का लाभ उठाते हुए अपनी एक विशिष्ट प्रशासनिक पहचान स्थापित की.

“20वीं सदी की शुरुआत में बिहारी नौजवानों की एक बड़ी संख्या, जिनमें सच्चिदानंद सिन्हा और राजेंद्र प्रसाद जैसे कायस्थ शामिल थे, कलकत्ता के शिक्षा केंद्रों में पहुंचने लगी. उनका सबसे ज़्यादा आकर्षण कानून विषय में था. यह वह समूह था जिसने ब्रिटिश बंगाल से बिहार को अलग करने की मांग की शुरुआत की, और पटना में एक उच्च न्यायालय की स्थापना की मांग की.” लेखक अरविंद दास अपनी किताब द रिपब्लिक ऑफ बिहार में लिखते हैं.

शहरी केंद्रों में कायस्थों के बढ़ते प्रभाव को औपनिवेशिक बिहार में पेशेवर और साक्षर मध्यम वर्ग के उदय की प्रक्रिया से जोड़कर भी देखा जा सकता है. इस प्रक्रिया ने 1912 में बिहार को एक अलग प्रांत बनाने में और 1913 में पटना को उसकी राजधानी बनाने में अपनी भूमिका अदा की. “लगातार विस्तार कर रहे सरकारी महकमे ने बड़ी संख्या में मध्यवर्गीय युवाओं को रोज़गार दिया, उनमें से तमाम युवा लिखापढ़ी करने वाली जाति कायस्थ से आये, जो कि मैकाले की शिक्षा पद्धति से निकले थे,” दास अपनी किताब में कहते हैं.

बिहार में इस शहरी पेशेवर वर्ग का नेतृत्व कायस्थों के जातिगत हितों के साथ जुड़ते हुए इसने खुद को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीति के साथ एकीकृत कर लिया. कोई आश्चर्य नहीं कि भारत के संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष (राजेंद्र प्रसाद के पहले) सच्चिदानंद सिन्हा ने कई पत्रिकायें स्थापित की, जिनमें ‘कायस्थ समाचार’ और ‘द हिंदुस्तान रिव्यू’ का नाम प्रमुख है. दास का मानना है कि उनका लेखन बिहार में शहरी मध्यम वर्ग की एक पूरी पीढ़ी को विश्वदृष्टि देने का माध्यम बना, साथ ही राजनीति में अपनी हिस्सेदारी बनाने में मदद का एक मंच भी.

स्वतंत्रता के बाद, कायस्थों ने दूसरे जाति समूहों के साथ जुड़कर राज्य में शहरी मध्यवर्ग का गठन किया. हालांकि यह पटना जैसे शहरी केंद्रों में चुनावी रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं. काफ़ी हद तक पटना साहिब की लड़ाई या तो कायस्थ वोट को अपने साथ जोड़ने की है या फिर इसमें होने वाले संभावित बंटवारे को कम से कम करने की है.

रविशंकर प्रसाद उम्मीद कर रहे होंगे कि कायस्थ वोटों का विभाजन न्यूनतम रहे. यदि यह अधिक हो जाता है, तो बीजेपी की उम्मीदें उसके परंपरागत समर्थक व्यवसायी और सर्राफा समाज पर बढ़ जायेगी. शनिवार को अमित शाह के रोडशो के लिए चुने गये मार्ग को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें शाह संकरी गलियों के आवासीय, व्यापारी और व्यस्त बाज़ारों से होकर गुजरे.

कायस्थों के अलावा बीजेपी को राजपूतों, भूमिहारों और ब्राह्मणों जैसी उच्च जातियों का समर्थन प्राप्त है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), जनता दल (यूनाइटेड) को गैर-यादव ओबीसी, मुख्य रूप से कुर्मी और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का समर्थन भी बीजेपी को लाभ पहुंचा सकता है.

इसी तरह, कांग्रेस के उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा को उम्मीद है कि बीजेपी के परंपरागत वोट से होने वाले नुकसान की भरपायी वो राजद के मुस्लिम-यादव और निषाद वोट के साथ ही कायस्थ वोटों में विभाजन के ज़रिये कर सकेंगे. अगर यह सामाजिक समीकरण काम करता है तो सिन्हा अपनी सीट को बचाये रखने में सफल हो सकते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा 16 मई को किये गये रोडशो से सिन्हा के लिए माहौल बनाने में मदद मिली है.

हालांकि इसकी संभावनायें कम ही लगती हैं. इस बात की ज़्यादा संभावना है कि कायस्थ वोट में विभाजन नहीं हो, क्योंकि मतदान समूह की निष्ठा पार्टी के लिए उतनी ही है जितनी कि एक व्यक्ति के लिए. 2014 में यही एक कारण था कि सिन्हा के अनुपस्थित रहने के बावजूद, कायस्थ मतदाताओं ने उन्हें सर्मथन दिया था. व्यक्तिगत स्तर पर प्रसाद का भी यह पहला लोकसभा चुनाव है और उन्हें भी अपने निर्वाचन क्षेत्र की तुलना में राष्ट्रीय मंच पर अधिक दिखने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है. इस तरह की सभी चिंताओं को दूर करने के लिए प्रसाद मजबूत अभियान चला रहे हैं. इसके तहत वो अपने परिवार के शहर में ही रहने, अपनी पत्नी के पटना विश्वविद्यालय में पढ़ाने की दलील देते हैं.

इस बाबत चर्चाएं हैं कि प्रसाद पटना साहिब सीट बड़े आराम से सिन्हा से जीत जायेंगे. लेकिन यह तस्वीर अभी तक साफ नहीं हो सकी है कि विभिन्न समूहों का मतदान व्यवहार किस तरह से इस जीत को प्रभावित करेगा. फिर भी यह देखना दिलचस्प होगा कि कायस्थों की बीजेपी के प्रति निष्ठा किस स्तर तक जुड़ी है.