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बिहार में लगातार मरते हुए झील-पोखर आख़िर इस चुनाव में मुद्दा क्यों नहीं हैं?
बेगूसराय पहुंचा तो कन्हैया कुमार, तनवीर हसन और गिरिराज सिंह के हाई प्रोफाइल मुकाबले से कहीं ज़्यादा उत्साह मन में 15 हजार एकड़ में फैली एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील कांवर लेक को देखने का था. बताया गया था कि जिले के मंझौल अनुमंडल मुख्यालय से ही इस झील की आधिकारिक सीमा शुरू हो जाती है और इस इलाके का प्रसिद्ध जयमंगला गढ़ मंदिर इसी झील के बीचोबीच स्थित है.
जब हम मंझौल से निकले तो बिना पानी में घुसे ही सड़क सीधे जयमंगला गढ़ तक पहुंच गयी. मंदिर परिसर के आगे सड़क जहां खत्म हुई, उसके भी आगे तकरीबन पांच सौ मीटर पैदल चलने पर मटमैला पानी देखने को मिला. वहां कुछ नावें और मछली पकड़ते कुछ लोग दिखे. उन लोगों ने जब बताया कि हम जहां खड़े हैं वही कांवर झील है, तो मन सचमुच उदास हो गया.
उस वक्त झील का पानी बमुश्किल दस एकड़ में फैला था. कहीं भी पानी की गहराई दो-तीन फीट से अधिक नहीं थी. मछुआरों ने बताया कि ऐसे ही कुछ और टुकड़े होंगे, जहां पानी जमा होगा. इस बार यही कांवर झील है. बाकी पूरी ज़मीन में हमें गेहूं और गन्ने की फसल खड़ी या कटती हुई मिली.
आख़िर इस झील को क्या हो गया? क्या यही बिहार सरकार द्वारा घोषित संरक्षित क्षेत्र है और केंद्र सरकार ने इसे ही पक्षी अभ्यारण्य घोषित कर रखा है? क्या यही झील है जो कभी इस इलाके की प्राणवायु कही जाती थी? जहां की मछलियां काफी स्वादिष्ट हुआ करती थीं? यही वह जगह है जहां साठ से अधिक किस्म के प्रवासी पक्षी आया करते हैं?
मन में उमड़ते इन सवालों के बीच वहां की स्थिति को देखकर स्पष्ट मालूम हो रहा था कि कांवर झील अब कुछ वर्षों की ही मेहमान रह गयी है. बहुत जल्द यह पूरा इलाका एक विशाल खेत में बदल जाने वाला है.
बेगूसराय इतनी विशाल एक झील अंतिम सांसें गिन रही है. लोकतंत्र का महापर्व चालू है लेकिन इसमें केवल सिर गिने जाते हैं, जल स्रोत नहीं. इस झील के मृतप्राय होने से बेगूसराय क्या, मंझौल के मतदाताओं पर भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा है. हमें वहां मौजूद कई लोग साल 2013 में लागू उस कानून की चर्चा करते मिले जिसके तहत कांवर झील की 15 हजार एकड़ जमीन की खरीद-बिक्री को सरकार ने अमान्य घोषित कर दिया था. मंझौल के किसानों ने अदालत में इस कानून को चुनौती दी थी और वहां की किसान संघर्ष समिति इस बात को लेकर आंदोलन कर रही थी कि उन्हें कांवर झील के भीतर पड़ने वाली अपनी ज़मीन की खरीद-बिक्री का अधिकार मिले.
झील रहे या मर जाये, इसकी परवाह किसी को नहीं थी. ज़ाहिर है, झील अगर ख़त्म हो जाये तो किसानों को खेती के लिए और ज़मीन मिलेगी. हां, ऊपरी तौर पर वे ज़रूर कह रहे थे कि अब झील की जितनी भी ज़मीन बची है, तकरीबन 5000 एकड़, उसे झील के रूप में संरक्षित कर लिया जाये और शेष जमीन का स्वामित्व लोगों को दे दिया जाये. यह संतोष कर लिया जाये कि झील अब इतनी ही बड़ी है.
हां, स्थानीय मछुआरों के भीतर ज़रूर इस झील के ख़त्म होते जाने को लेकर चिंता थी. वे इसे रोज़ अपनी आंखों के सामने मरता जो देख रहे थे. उनका सबसे बड़ा संकट यह था कि अब वे मछली पकड़ने कहां जायेंगे. उनका कोई संगठित विरोध हालांकि नज़र नहीं आया.
हमें जो मछुआरे मिले, उन्होंने बताया कि एक स्थानीय नदी है, जिससे अगर इस झील को जोड़ दिया जाये, तो इसमें साल भर पानी रह सकता है. हैरत की बात है कि कभी ऐसा भी वक़्त था, जब इस झील को बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ा गया था ताकि झील का अतिरिक्त पानी नदी में जा सके. आज इस झील की मद्धिम मौत स्थानीय लोगों के लिए खुशी का कारण है. उन्हें खेती के लिए अतिरिक्त ज़मीन जो मिलने वाली है.
इस मसले पर हमने इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के बिहार प्रमुख अरविंद मिश्रा से बातचीत की. उन्होंने साफ़-साफ़ कहा, “कांवर झील को सुखाकर खेत में बदलने की साजिश में जितनी भूमिका इलाके के बड़े सामंती किसानों की है, उससे कम सरकार की नहीं है. सरकार ने ख़ुद बिहार के दो बड़े पक्षी अभ्यारण्य कांवर और कुशेश्वरस्थान का क्षेत्रफल कम करने का सुझाव दिया है. कहा जा रहा है कि जहां तक अभी पानी है उसे ही झील मान लिया जाये, मगर सच तो यह है कि झील में पानी न हो ऐसी स्थिति बड़े किसानों के हित में जानबूझ कर पैदा की जाती है. आज भी अगर बूढ़ी गंडक के बसही बांध से नगड़ी-गोड़ियाड़ी नहर को जोड़ दिया जाये और उस नहर को रिचार्ज कर दिया जाये तो कांवर में कभी पानी की कमी नहीं होगी. ऐसा प्रयोग भरतपुर में सफलतापूर्वक किया जा चुका है. सवाल है कि क्या सरकार सचमुच कांवर को बचाने की मंशा रखती है?” कहना मुश्किल है!
यह कहानी सिर्फ़ बेगूसराय के कांवर झील की नहीं है. पड़ोस के दरभंगा जिले में भी इन दिनों तालाबों का मरना, उसे भरना और उन पर घर बना लेना जारी है. कभी दरभंगा जिले की पहचान “पग-पग पोखर” से हुआ करती थी. कहा जाता था कि यहां हर कदम पर कोई न कोई तालाब है, मगर हाल के वर्षों में शहर की इस पहचान पर खतरा पैदा हो गया है. महज तीस साल पहले शहर में 213 तालाब हुआ करते थे, जबकि इस वक़्त यह संख्या बमुश्किल 70-75 रह गयी है. जो तालाब बच गये हैं, उनके लुप्त होने का संकट लगातार कायम है.
इस बात का सबसे तीव्र अहसास दरभंगा के लहेरियासराय स्थित गामी तालाब को देखने से होता है. हमें जानकारी थी कि यह तालाब पांच एकड़ में फैला हुआ है. जब हम वहां पहुंचे तो हमें तालाब तक पहुंचने का कोई रास्ता ही नहीं मिला. चारों तरफ खड़ी इमारतें तालाब को घेरे हुए थीं. एक जगह मुश्किल से दस मीटर चौड़ा एक संकरा रास्ता मिला तो हम भीतर जा पाये.
उस तालाब को देख कर ऐसा लग रहा था कि इसका मौजूदा आकार एक एकड़ भी नहीं होगा. तालाब के चारों ओर बने मकानों ने उसे पाट दिया था और उसकी ज़मीन पर अपने आशियानों को फैला लिया था. तालाब के पास हमें दो-तीन लोग मछली पकड़ते नजर आये. उन्होंने बताया कि लगातार तालाब को भर कर ज़मीन हड़पी जा रही है. कुछ स्थानीय दलित जाति के लोगों ने कुछ साल पहले तालाब को भरे जाने का विरोध किया था, क्योंकि उनके लिए नहाने-धोने की यह एक जगह थी. इसको लेकर एक आंदोलन भी चला, मगर आंदोलन कर रहे एक युवक की लाश इसी तालाब से बरामद हुई. इसके बाद सभी लोग डर गये और आंदोलन ख़त्म हो गया.
इसी तरह शहर में एक बाबा सागर दास तालाब हुआ करता था. इसे भी भू-माफियाओं ने भरना शुरू कर दिया था. 2015-16 में इस तालाब को बचाने का आंदोलन चला था, जिसमें जल-पुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह पहुंचे थे. इस बार चुनावी चक्कर में घूमते हुए जब हम उस तालाब के पास पहुंचे, तो वह सपाट मैदान में बदल चुका था. वहां इमारतें खड़ी होने लगी थीं.
दरभंगा शहर में ऐसा सिर्फ़ इन छोटे और मझोले तालाबों के साथ ही नहीं हो रहा. शहर के बीचोबीच स्थित तीन बड़े ऐतिहासिक तालाबों -हराही, दिग्घी और गंगा सागर तालाब- को भी लगातार भरने की कोशिश की जा रही है. इस शहर में एक चलन बन गया है कि भले जमीन का छोटा टुकड़ा भी मिले, मगर तालाब के किनारे मिले तो पौ-बारह. लोग उस दो डिसमिल के टुकड़े को दो-तीन साल में ही एकड़ में बदल लेते हैं. शहर में सबकी सहमति से लगातार तालाब भरे जा रहे हैं. यहां भी यह कोई राजनीतिक या चुनावी मुद्दा नहीं है.
बावजूद इसके कि इन तालाबों को भरे जाने से इलाके का जलस्तर लगातार गिर रहा है. कभी इस इलाके में 30-40 फीट की गहराई में पानी मिल जाता था. फिर जलस्तर सौ-सवा सौ फुट नीचे गया. आज की स्थिति में आयरन मुक्त अच्छा पानी 300 फुट से कम गहराई में नहीं मिलता. इसी शहर में लोग ब्रह्मवेला में बाइक में गैलन बांध कर पानी की तलाश में निकलते हैं, मगर उन्हीं लोगों के लिए तालाबों का भरा जाना कोई मुद्दा नहीं है. अकेले नारायणजी चौधरी नामक एक आंदोलनकारी हैं जो तालाब को बचाने के लिए आंदोलन चलाते रहते हैं.
पड़ोस के मधुबनी जिले में, थोड़ी दूर स्थित मोतीहारी में, गया में, राजधानी पटना में, हर जगह लगातार तालाब भरे जा रहे हैं. मोतीहारी शहर का नाम मोती झील के नाम पर रखा गया था. यह शहर के बीचोबीच स्थित बड़ा-सा तालाब था. आज वह भी अतिक्रमण का शिकार है. गया जैसे सुखाड़ प्रभावित शहर में लोग पीने का पानी चंद पौराणिक तालाबों से ही प्राप्त करते हैं, मगर तालाब को अतिक्रमित करने से नहीं चूकते. राजधानी पटना में तो ख़ुद सरकार ही तालाबों को पाटकर संस्थानों की इमारतें बनवा रही है.
झीलों-तालाबों का मरना, उन पर किया जा रहा अतिक्रमण आख़िर इस लोकसभा चुनाव में कोई मुद्दा क्यों नहीं है? नदियों-तालाबों पर काम करने वाले वरिष्ठ जल आंदोलनकारी रंजीव कहते हैं, “इन झीलों और तालाबों पर कब्ज़ा कर रहे हैं, आज राजनीति के केंद्र में तो वही लोग हैं. देश की सभी बड़ी पार्टियां प्राकृतिक संसाधनों पर गलत कब्ज़ा करने वालों का समर्थन करती हैं और उनसे लाभान्वित होती हैं, तो फिर ये दल इन सवालों को कैसे उठायेंगे. इस साल जो घोषणापत्र जारी हुए हैं, उनमें कांग्रेस को छोड़ दिया जाये तो शायद ही किसी के मेनिफेस्टो में पर्यावरण पर कोई बात की गयी है”.
वे कहते हैं, “यह दोष सिर्फ सरकार का नहीं है. हाल के कुछ वर्षों में हमारा समाज भी कमज़ोर हुआ है. यही समाज कभी इन झीलों और तालाबों का संरक्षण और संवर्धन करता था, मगर अब उसने सबकुछ सरकार के भरोसे छोड़ दिया है. लिहाज़ा इन संसाधनों से व्यक्तिगत लाभ अर्जित कर लेना ही उसकी नीति हो गयी है. वह अब झीलों और तालाबों के संरक्षण की बात नहीं सोचता. वह सिर्फ़ यह सोचता है कि इससे थोड़ा हासिल कर अपना लाभ कमा लिया जाये’’.
इन्हीं कारणों से चुनावी शोर के बीच बेगूसराय के कांवर या दरभंगा के तालाब और झील-पोखरों का ख़त्म होना और इसकी वजह से जलस्तर का गिरना कोई मुद्दा नहीं है.
(रिपोर्ट मीडिया विजिल डॉटकॉम से साभार)
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