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मथुरा: “हेमा मालिनी ने कुछ भी नहीं किया पर मोदी को ही जितायेंगे”
”हेमा मालिनी यहां आने वाली हैं. जयंत चौधरी आकर चले गये. ये लोग बाबा साहब की मूर्ति पर माला चढ़ायेंगे और चले जायेंगे. इन्हें गरीबों से कोई मतलब नहीं है. देखिये, हम लोगों के मां-बाप इसी क़ब्रिस्तान में रहते थे. यहीं मर गये और दफ़न हो गये. हम लोग भी यहीं रहते हैं और शायद यहीं मर जायेंगे. हमारे पास अपना घर नहीं है. सरकार से हमें कोई फायदा नहीं मिलता है. न उज्ज्वला के तहत गैस कनेक्शन मिला और न राशन मिलता है. मथुरा के वोटर तो हैं, लेकिन कोई लाभ नहीं मिलता.” ये कहना है 55 वर्षीय उमर का.
उमर अपने परिवार के साथ मथुरा रेलवे स्टेशन से महज़ दो किलोमीटर दूर डीग स्थित क़ब्रिस्तान में रहते हैं. इनके पास न अपना घर है और न ही कोई सरकारी सुविधा इनके नसीब आयी है. उमर के परिवार के अलावा सात और मुस्लिम परिवार छोटे-छोटे घर बनाकर क़ब्रिस्तान के अंदर रहने को मज़बूर हैं. इन परिवारों के बच्चे क़ब्रों के आसपास खेलते हैं. उमर से हमारी बातचीत हो रही होती है, तभी पास में ही बाबा साहब की मूर्ति पर माल्यार्पण करने मथुरा से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार हेमा मालिनी पहुंच गयीं.
बड़ी-सी गाड़ी से हेमा मालिनी उतरती हैं. उनके उतरने से पहले एक शख़्स छाता लेकर उनके पास आ जाता है. हेमा की सुरक्षा में मौजूद महिला सुरक्षाकर्मी और उनके अपने बॉडीगार्ड उन्हें लोगों से अलग रखते हुए बाबा साहब की प्रतिमा के पास ले जाते हैं. ब्लैक कलर का चश्मा पहने हुए हेमा मालिनी बाबा साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण करती हैं और वहां मौजूद सैकड़ों जनता से बिना कोई संवाद किये लौट जाती हैं.
बाबा साहब की प्रतिमा के पास खड़े मथुरा के धौरेरा पंचायत के पूर्व प्रधान राजपाल स्वामी कहते हैं, ”ऐसे कोई नेता होता है? जनता से कोई बातचीत नहीं. जनता धूप में खड़े-खड़े इंतजार करती रही, आप आयीं और चल दीं. मथुरा इस बार हेमा मालिनी जी को निराश करने वाला है. इनको इस बार निराश होकर दिल्ली या मुंबई लौटना पड़ेगा.”
हेमा से नाराज़गी पर मोदी से प्यार
मथुरा में ज़्यादातर लोग हेमा मालिनी से ख़फ़ा नज़र आ रहे हैं. मांट थाने के मीरपुर गांव के रहने वाले उम्मेद सिंह कहते हैं, “हेमा मालिनी ने यहां के लिए क्या किया? हमारी सांसद हैं, लेकिन यहां के ग्रामीण इलाके के लोगों को उन्हें टेलीविजन पर ही देखना नसीब होता है. कभी-भी ग्रामीण इलाके में लोगों का दुःख जानने नहीं आयीं. स्थानीय सांसद होता है, तो दुःख-सुख में शामिल होता है. जब हमारे यहां आलू किसान आलू की कीमत नहीं मिलने के कारण सड़कों पर आलू फेंक रहे थे, तब हेमा मालिनी एक शब्द भी नहीं बोलीं. वो हमारी प्रतिनिधि हैं. हमारी आवाज़ संसद में उठायीं क्या? नहीं न. तो हमें ऐसे सांसद की क्या ज़रूरत जो हमारे लिए बोल भी न सके.”
उम्मेद सिंह से हमारी बात हो रही होती है, तभी पास में ही सिगरेट और चाय की दुकान चलाने वाले आशुतोष सिंह कहते हैं, “हेमा मालिनी ने भले कुछ नहीं किया हो, लेकिन मोदी जी ने तो किया है. पाकिस्तान को इससे पहले कभी जवाब दिया गया क्या? वो हमारे सैनिकों का सर काट देते थे और हमारी सरकार ख़ामोश रहती थी. हेमा मालिनी से नाराज़गी है, लेकिन पीएम तो नरेंद्र मोदी को ही बनायेंगे. नरेंद्र मोदी पीएम बनें इसके लिए हेमा मालिनी को जितायेंगे. देश और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए पीएम मोदी का प्रधानमंत्री बनना ज़रुरी है.”
इसके बाद हमारी मुलाक़ात नौहझील थाने के जरैलिया गांव के उस किसान परिवार से हुई, जिनके घर के मुखिया रामेश्वर ने इसी साल 31 जनवरी को कर्ज के कारण आत्महत्या कर ली थी. रामेश्वर के पिता ने कर्ज लिया था और बिना चुकाये उनकी मौत हो गयी थी. उनके निधन के बाद कर्ज की देनदारी रामेश्वर पर आ गयी. गरीबी और खेती में हो रहे नुकसान के कारण रामेश्वर पैसे चुकाने में असमर्थ थे और एक रोज़ खेत में आवारा पशुओं से रखवाली करने गये रामेश्वर ने पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली थी.
पति के निधन के बाद रामेश्वर की पत्नी गुमसुम रहती हैं. वो किसी से बात नहीं करतीं. रामेश्वर के बड़े बेटे प्रवीण कुमार ने इसबार दसवीं की परीक्षा दी है. प्रवीण न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहतें हैं कि “मेरे पापा की मौत के बाद कोई भी हमसे मिलने नहीं आया. बैंक वालों ने कहा कि आप पर जो कर्ज था वो माफ़ हो गया, लेकिन हमें नो ड्यूज का कोई कागज़ नहीं दिया गया. हमें हमेशा डर लगा रहता है कि कल को बैंक वाले हमारी ज़मीन पर कब्जा न कर लें. जब हमारे पिता ने आत्महत्या की, तो हमारी मदद के लिए कोई सामने नहीं आया. हम हेमा मालिनीजी से भी मिलने गये, लेकिन हमारी मुलाकात नहीं हुई. हम उनसे आर्थिक मदद मांगने नहीं गये थे. हम बस चाहते थे कि वो बैंक से बोलकर कर्ज माफ़ करा दें. मेरी बड़ी बहन है, हम उसकी शादी करायेंगे या बैंक का कर्ज देंगे. घर पर कमाने वाले सिर्फ़ पिताजी ही थे. हमारी मदद न योगी सरकार ने की और न मोदी सरकार ने. मेरी तो उम्र नहीं हुई, लेकिन मेरी अम्मा किसी को भी वोट नहीं देंगी. जब हमारे दुःख में कोई शामिल नहीं हुआ, तो हम किसी को वोट क्यों करें.”
जरैलिया गांव के गेट पर लिखा है कि यह ओडीएफ गांव (खुले में शौच से मुक्त) है, लेकिन इस गांव में ज़्यादातर लोगों के घरों में शौचालय नहीं है. महिलाएं और पुरुष खुले में शौच करने जाते हैं. गांव में जाने वाली सड़क टूटी-फूटी है. सड़कों पर नालियां बह रही हैं. इस गांव के रहने वाले श्याम सिंह कहते हैं कि “मेरे गांव में भले कुछ हुआ हो या नहीं, लेकिन पाकिस्तानियों से जिस तरह से मोदीजी ने बदला लिया, जिस तरह पहले भारत के प्रधानमंत्री को कोई जानता तक नहीं था और अब विश्व में डंका बज रहा है, सिर्फ़ इन्हीं वजहों से मैं बीजेपी को वोट दूंगा और चाहता हूं कि पीएम दोबारा नरेंद्र मोदी ही बनें. हमें हेमा से प्रेम नहीं, पर मोदी से नफ़रत भी नहीं है. देशहित के लिए हम मोदीजी को दोबारा पीएम के रूप में देखना चाहते हैं.”
किसानों के लिए सरकार बेहतर करेगी, ये सोचकर मीरपुर गांव के किसान हरि सिंह ने 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को वोट किया था. लेकिन इसबार वो बीजेपी के पक्ष में वोट करने के मूड में नहीं है. हरि सिंह कहते हैं कि “मोदी जी ने हमें चौकीदार बना दिया. खेतों की तरफ इशारा करते हुए वो कहते हैं कि हर खेत में आपको मचान दिख रहा है. हम किसानों की रातें महीनों से यहीं पर कट रही थीं. अभी गेहूं का फसल कट गयी है, तो थोड़े निश्चिंत है. आवारा पशुओं ने जीना हराम कर दिया था. रात में जिस खेत में घुस जाते, उसका स्वाहा कर देते थे. अभी भी वो आवारा पशु आसपास ही मौजूद हैं. आजकल गांवों में घुस आते हैं. पिछले दिनों सांड ने एक किसान को बुरी तरफ़ मार दिया था. सरकार आवारा पशुओं से निजात दिलाने के लिए कुछ नहीं की. गेहूं की खरीद एक अप्रैल से ही शुरू हो जानी थी, लेकिन अब तक शुरू नहीं हुई है. चुनाव के बाद खरीद शुरू करेंगे और कुछ दिनों में बंद कर देंगे. सरकार का वादा था किसानों की आमदनी दोगुनी करने का, लेकिन लागत के बराबर यहां खर्च निकालना मुश्किल हो गया है.”
हाल में हेमा मालिनी की एक फोटो सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हुई, जिसमें हेमा मालिनी गेहूं काटती नज़र आ रही हैं. शाम के वक़्त अपने परिजनों के साथ गेहूं की कटाई कर रही लीला देवी कहती हैं, “हेमा तो अमीर हैं, उन्हें गेहूं काटने की क्या ज़रूरत. फोटो के लिए गेहूं काटने और सचमुच बीघे के बीघे गेहूं काटने में अंतर है. हमारी तबीयत ख़राब हो जाती है. लेकिन मज़बूर हैं, पेट के लिए यह सब करना पड़ता है. हेमा मालिनी चुनाव जीतने के लिए ऐसा कर रही हैं.”
लोगों के बीच देशहित और देश की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है. बीजेपी भी यहां इन्हीं मुद्दों के ऊपर चुनाव लड़ रही है. पूर्व में उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य राज्यमंत्री रहे बीजेपी नेता रामबाबू हरित चुनावी मुद्दों और हेमा मालिनी के प्रति लोगों में नाराज़गी पर चर्चा करते हुए न्यूज़लॉन्ड्री से कहते हैं, “यहां हेमा मालिनी से लोगों में नाराज़गी की वजह ज़्यादा उम्मीद करना है. हेमा मालिनी ने इलाके में बहुत शानदार काम किया है. जहां तक रही चुनावी मुद्दों की बात तो राष्ट्रवाद, देशहित और राष्ट्र की सुरक्षा हमारे लिए सबसे बड़ा मुद्दा है. मोदीजी ने जिस तरह देश का मान-सम्मान विदेशों में बढ़ाया और पाकिस्तान पर जवावी हमले किये, यह बातें हम जनता में पहुंचा रहे हैं और जनता खुश है. देश सुरक्षित नहीं होगा तो देश तरक्की कैसे कर पायेगा?”
रामबाबू हरित की बातों को आगे बढ़ाते हुए मथुरा शहर से विधायक पूरन प्रकाश न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, “हेमा जी से नाराज़गी कुछ लोगों को है, लेकिन मोदीजी से प्रेम सबको है. मोदीजी को पीएम बनाने के लिए मथुरा की एक-एक जनता हेमा मालिनीजी को जिताने जा रही है. इस बार हम ज़्यादा अंतर से चुनाव जीतने जा रहे हैं.”
साल 2014 लोकसभा चुनाव में हेमा मालिनी को 5,74,633 वोट मिले थे. हेमा के बाद राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी थे, जिन्हें 2,43,890 वोट मिले थे. बसपा को यहां से 1,73,572 वोट मिले थे, वहीं समाजवादी पार्टी को महज़ 36,673 वोट हासिल हुए थे. इसबार यहां से सपा-बसपा और आरएलडी एकसाथ मैदान में हैं. बीजेपी ने जहां हेमा मालिनी को दोबारा मैदान में उतारा है, वहीं गठबंधन की तरफ़ से नरेंद्र सिंह मैदान में हैं. नरेंद्र सिंह आरएलडी के उम्मीदवार हैं.
मथुरा में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए कहते हैं, “मथुरा के मुद्दे वही हैं, जो पांच साल पहले थे. यहां बुनियादी विकास नहीं हो पाया है. यमुना का शुद्धिकरण एक बड़ा मसला है. उससे हम सब की धार्मिक आस्थाएं भी जुड़ी हुई हैं. इसके साथ ही बेरोज़गारी एक बड़ा मुद्दा है. पिछली बार मैं यहां से चुनाव हार गया था. उस हार से मैंने बहुत कुछ सीखा है. जनता ने जिस उम्मीद से पिछले चुनाव में वोट किया था, उसके भी कुछ कड़वे अनुभव हैं. हेमा जी की राजनीतिक सोच और दायरा बहुत सीमित है. आज भी वो कह रही हैं कि मैं क्यों गाड़ी से उतरूं, क्यों पैदल चलूं. जनप्रतिनिधि को लोगों को गले भी लगाना होता है, उनके बीच में रहना पड़ता है और संघर्ष करने होते हैं. अगर वो पांच साल में ये भी नहीं समझ पायीं, तो उचित नहीं था कि उन्हें दोबारा चुनाव लड़ने का मौका दिया जाता. उन्हें पब्लिक पर थोपा जा रहा है. मथुरा से हम चुनाव जीत रहे हैं.”
हेमा मालिनी न्यूज़लॉन्ड्री के सवाल, ‘किन मुद्दों पर चुनाव लड़ रही हैं’ के जवाब में कहती हैं, “मैं यहां बाबा साहब की प्रतिमा पर माला चढ़ाने आयी थी.” पूछे गये सवाल से अलग जवाब देने के बाद, बाक़ी सवाल सुने बगैर हेमा मालिनी अपनी गाड़ी का शीशा चढ़ा लेती हैं और उनकी गाड़ी आगे बढ़ जाती है. पीछे से जनता नरेंद्र मोदी ज़िंदाबाद के नारे लगाने लगती है. मथुरा में हेमा मालिनी नहीं, नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं. जनता की बातों से तो यही अहसास होता है.
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