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भोजपुरी गीतों से महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश
तक़रीबन दो साल या इससे थोड़ा और पहले की बात है, जब भोजपुरी पॉपस्टार अनु दुबे, 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को समर्थन देने के कारण इलाके भर की तमाम भाभियों को चिढ़ाते हुए एक भोजपुरी गीत के शुरुआती हिस्से में तंज़ करती हैं. यहां गायिका अनु दुबे ने स्पष्ट नहीं किया कि यह, मूलत: अराजनैतिक, गीत मोदी सरकार द्वारा लागू की गयी नोटबंदी के समर्थन में है या ‘भऊजी’ की दिक्कतों को आड़े हाथों लेता है. अनु ताने भरे लहज़े में कहती हैं- “कूद-कूद मोदी के देले रही वोट, भऊजी के सौसे धरायल काला नोट.”
अब 2019 की चुनावी सरगर्मियों में भोजपुरी गानों में ‘भऊजी’ की ख़ुशामदी फिर दिख रही है. जैसे-जैसे चुनावी अभियानों में तेज़ी आ रही, न केवल प्रधानमंत्री मोदी की पार्टी यह करती दिखायी दे रही है, बल्कि बराबर की टक्कर देते हुए विपक्षी गठबंधन भी बिहार के भोजपुरी बेल्ट और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भोजपुरी चुनावी गीतों के साथ तैयार खड़ा है.
पिछले हफ़्ते की शुरुआत में ही राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने अपना आधिकारिक स्लोगन ज़ारी किया है, जिसे अभी गीत में बदला जाना है.
बात तनिक अजीब पर दिलचस्प है कि इस तरह के सांगीतिक चुनाव प्रचार में औरतें ही केंद्र में हैं, लेकिन इसके उलट रुटीन के तौर पर रचे गये इस तरह के स्पष्ट रूप से राजनीतिक गीत भले ही संजीदगी से तैयार किये गये हों, ये महज़ चुनावी संदेश बनकर रह जाते हैं.
पिछले कुछ सालों में भोजपुरी पॉप म्यूज़िक इंडस्ट्री, जो हाल-फिलहाल की गतिविधियों पर अपनी संगीतमय टिप्पणी के लिए जाना जाता है, में चुनावी अभियान में गीतों के इस्तेमाल में भारी उछाल देखा गया है. जो नयापन है, वह है- महिला वोटरों को मद्देनज़र रखते हुए गीतों का रचा जाना. इस बात का सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि चुनावी अभियानों द्वारा महिला वोटरों, ख़ास तौर पर ग्रामीण औरतों की उपस्थिति में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज़ की जा रही है और अपने पाले में खींचने का गुणा-भाग किया जा रहा है. हालिया अध्ययनों में सामने आया है कि विधानसभा व लोकसभा चुनावों में महिला वोटरों की तादाद में काफ़ी इजाफ़ा देखा गया है. इस मामले में हिंदी पट्टी के प्रदेशों को अभी लंबी दूरी तय करनी है, लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि आबादी के नज़रिये से बड़े भारतीय प्रदेशों में से बिहार में साल 2014 लोकसभा चुनाव में यह उछाल सबसे ज़्यादा (पुरुषों की तुलना में 3% अधिक) देखा गया.
चुनावी अभियान संभालने वाले चुनाव-प्रबंधक शायद इस तरह के उभार के प्रति अब ज़्यादा जागरूक हैं. अब जब समर्थन हासिल करना गुणात्मक समीकरणों से तय होने लगा है, यह बात (इस तरह का उभार) इसलिए भी और गौरतलब हो जाती है, क्योंकि यह भी माना जाने लगा है कि अब औरतें घर-परिवार के मर्दों के मत-रुझान से प्रभावित हुए बिना स्वेच्छा से वोट देती हैं. बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में सबसे अधिक बोली जाने वाली 5 बोलियों में से एक, भोजपुरी में रचे गये इन अभियान-गीतों में अलग-अलग पीढ़ी की औरतों का ध्यान खींचने का प्रयास देखा जा सकता है.
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने किस तरह 2015 चुनाव के दौरान इस्तेमाल किये गये गीतों को 2019 में भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, भले ही तबसे लेकर आज तक गठबंधन में बड़ा फेरबदल हो चुका है. प्रसिद्ध भोजपुरी गायक व अभिनेता पवन सिंह द्वारा गाये हुए इस गीत में तीन पीढ़ी की औरतों से गुज़ारिश की गयी है. अलग-अलग उम्र की औरतों को मद्देनज़र रखते हुए गीत में ‘चाची’, ‘दादी’ और ‘भऊजी’ से अपील की गयी है.
थोड़ी श्रद्धा दिखाते हुए पवन सिंह ‘चाची’ से वोट अपील करते हैं- “मांगी ला असीस चाची छू के चरनिया, दे दिहा आपन दुलार, वोट मांगे बेटवा तोहार.” वहीं भऊजी से मुख़ातिब पवन सिंह के गीत में उनके निवेदन पर गौर किये बिना किसी और पार्टी के उम्मीदवार को वोट न देने की अपील है- “दोसरा से करिहा न भऊजी कौनों करार हो, एनडीए के राज मांगत बाटे बिहार हो, सेवा तोहार करी तोहरे देवरवा, बदली ना कभी विचार हो, वोट मांगे देवरा तोहार हो.”
हाल में अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय गायक पी के राजा ने बीजेपी के समर्थन में प्रतीकात्मक रूप से काल्पनिक ‘भाभी’ को लेते हुए अपना गाना रिलीज़ किया. इस गीत में एक औरत से रोजी-रोटी की ख़ातिर बाहर रह रहे पति से महागठबंधन को हराने व वोट देने के लिए घर लौटने की गुज़ारिश करने की अपील के साथ, मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं मसलन आवास व एलपीजी गैस कनेक्शन आदि की याद भी दिलायी गयी है.
यही नहीं, इसके बाद उसे मतदान के दिन चुनाव बूथ (मसलन, गांव के स्कूल) तक जाते हुए ‘क्या करना चाहिए’ इसकी सलाह देते हुए राजा का गीत है- “उन्निस के चुनाव में भऊजी वोट दिहा फूल पर, मोदी क नारा लगावत जइहा गऊंवा के इस्कूल पर…देसवा खातिर मोदी जी कइनी बड़ी काम हो, गरीब किसान के झोपड़ी बनवलीं मकान हो, देले ना रहतीं गैसवा, त खाना बनवता चूल्ह पर.”
आरजेडी की अगुवाई वाले महागठबंधन के समर्थन में भी एक गाना चलन में है, जिसमें सुशासन की उधेड़बुन में लगी पत्नी को 2019 चुनाव के बाद केंद्र में आरजेडी का दबदबा हो जाने की उम्मीद करते हुए, इसके लिए निश्चिंत हो जाने को कहा जा रहा.
प्रमोद यादव ‘प्रेमी’-अंतरा सिंह द्वारा गाये युगल गीत में पत्नी (गाने में जिसे रानी का संबोधन दिया गया) एनडीए सरकार के प्रति अपनी निराशा ज़ाहिर करते हुए अपने पति (जिसके लिए ‘राजा’ का संबोधन है) से पूछती है कि सुशासन कब आयेगा- “हमरो बिहार बर्बाद होएल बा, सूसन क देख न राज आएल बा, मन में सोचल पूरा आस कब होई?”
पति बड़ी उम्मीद से जवाब देता है- “आवे द 2019 रानी तब होई, लालू के सरकार होई.”
आरजेडी के चुनाव-प्रचार में भी ‘भाभी’ वाले संवादपरक गीत का इस्तेमाल देखने को मिलता है. बिहार के प्रसिद्ध भोजपुरी गायक व अभिनेता खेसारी लाल यादव और ख़ुश्बू उत्तम द्वारा गाये युगल गीत का इस्तेमाल आरजेडी के 2019 के चुनावी अभियान में किया जा रहा है, हालांकि इसका इस्तेमाल तब भी हुआ था, जब नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) भी महागठबंधन का हिस्सा थी.
गीत के बोल ऐसे हैं जैसे कोई ‘भऊजाई’ अपने देवर से इस दुविधा पर बात कर रही हो कि आख़िर वोट किसे दें. वो कहती हैं- “सुनीं देवर जी हमार फेल होइल मतिया, केकरा के वोट दीं, बुझाएत नाहीं बतिया, रउए बताईं बटन केकर दबाईं?” इसके जवाब में देवर आरजेडी के चुनाव-चिह्न ‘लालटेन’ पर जोर देते हुए कहता है- “लल्टेनिए काम आई, सुन ए भऊजाई.”
चुनावी अभियान में इस्तेमाल किये जा रहे इन गानों ने महिला वोटर्स को स्थानीय राजनीतिक बहसों के केंद्र में ला दिया है, हालांकि उनमें से अधिकांश के मूल में औरतों को कम आंकना ही है. उनके सोचने-समझने और निर्णय लेने पर हमेशा से घर-परिवार के पुरुष सदस्यों के पूर्वाग्रह थोप दिये जाते रहे हैं. इन गानों की थीम में बदलाव लाने की ज़रूरत है कि किस तरह महिलाएं स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हुए वोट देने के अपने अधिकार का बख़ूबी इस्तेमाल कर रही हैं. दूसरी तरफ़, भोजपुरी लोक में चुनाव बूथों पर महिला वोटरों की भारी तादाद में बढ़ रही उपस्थिति नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकी है. कहना होगा कि 2019 लोकसभा चुनावों के बाद भी इस तरह के गाने-बजाने की मदद से ‘भऊजी’ को लुभाने का प्रयास जारी ही रहेगा.
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