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15 दिनों का नतीजा: मोदी 106 पेज, केजरीवाल 76 पेज
“आधा-आधा किलो का टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स रोज़ सुबह बहुत भारी पड़ता है, लेकिन अब तो स्थिति और भी खराब है, इंडियन एक्सप्रेस भी उसी ढर्रे पर चलने लगा है,” दक्षिण दिल्ली के चितरंजन पार्क इलाके, जो कि बंगाली लोगों का मुहल्ला है, में रहने वाली रिटायर्ड कर्मचारी आरती सोम दास कहती है. सोम की समस्या बीते लगभग एक महीने के दौरान दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के बीच चल रही विज्ञापनों की होड़ है. सोम कहती हैं, “जहां खोलो विज्ञापन चल रहे हैं. समाचार गायब है. कार में एफएम पर, टीवी में चैनलों पर हर मिनट इनके विज्ञापन हैं. और तो और अखबारों से उम्मीद रहती है कि वहां ख़बरें होंगी, पर बीते 15 दिनों में तो इन अख़बारों ने हद ही कर दी. पूरे-पूरे पेज के 10-10, 12-12 पन्ने भरे हुए हैं.”
सोम को उम्मीद है कि अब जबकि चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं तो इस होड़ में कुछ कमी आएगी. 10 मार्च की शाम को चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीखें घोषित कर दी हैं. इसके साथ ही देश भर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है.
पिछले महीने (फरवरी) की 23 तारीख को इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स में दिल्ली सरकार ने पूरे पन्ने के पांच-पांच विज्ञापन प्रकाशित करवा कर एक अलग ही बहस को जन्म दे दिया. उस दिन सभी अख़बारों में लगभग इतनी ही तादाद में दिल्ली सरकार के विज्ञापन छपे थे. जाहिर है चुनावों की आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले दिल्ली सरकार ने विज्ञापनों की एक अंधी होड़ शुरू कर दी थी जिसमें अगले दिन से ही केंद्र की भाजपा सरकार भी कूद पड़ी.
7 मार्च के इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स के 7-7 पन्ने मोदी सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के विज्ञापनों के नाम रहे. उस दिन लगभग सभी अख़बारों की यही स्थिति रही.
ये सारी कवायद लोकसभा चुनावों की आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले मतदाताओं के दिलो-दिमाग पर छा जाने की है. लिहाजा अखबारों का वजन बढ़ता जा रहा है. कुछ अखबार बिना वजन बढ़ाए ही अख़बार में ख़बरों की हिस्सेदारी घटाकर उन्हें विज्ञापनों के लिए समर्पित कर दे रहे हैं. अब जबकि आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है और विज्ञापनों की इस होड़ पर विराम लगने की उम्मीद बंध रही है, न्यूज़लॉन्ड्री ने 20 फरवरी से 6 फरवरी तक के टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में जनता के पैसे से छपे सरकारी विज्ञापनों का एक जायजा लिया.
इस पड़ताल में दिल्ली-एनसीआर में मोदी सरकार और दिल्ली सरकार के बीच विज्ञापन देने की होड़ साफ दिख रही थी. अंग्रेजी के इन तीन बड़े अख़बारों में प्रतिदिन छप रहे विज्ञापनों की संख्या और उस पर होने वाले खर्चों की जांच-पड़ताल में चौकाने वाले आंकड़े सामने आए.
इंडियन एक्सप्रेस
इंडियन एक्सप्रेस में 20 फरवरी से 6 फरवरी के दरम्यान मोदी सरकार ने पूरे पन्ने के 32 विज्ञापन छपवाए. वहीं दिल्ली की आप सरकार भी इस मामले में ज्यादा पीछे नहीं रही. आप सरकार ने इस तरह के 27 विज्ञापन दिए हैं. अगर बात आधे पेज के विज्ञापनों की करे तो इस दौरान मोदी सरकार ने एक और आप सरकार ने ऐसे तीन विज्ञापन दिए.
हिंदुस्तान टाइम्स
देश के इस प्रतिष्ठित अखबार में इस दौरान मोदी सरकार के पूरे पन्ने के विज्ञापनों की संख्या 34 रही तो दिल्ली सरकार ने 31 पूरे पन्ने के विज्ञापन छपवाए. दूसरी तरफ दोनों ही सरकारों ने क्रमश छह और तीन विज्ञापन आधे पेज के दिए.
टाइम्स ऑफ इंडिया
टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में मोदी सरकार के पूरे पन्ने के विज्ञापनों का आंकड़ा दिल्ली की आप सरकार के आंकड़ों के दोगुने से भी ज्यादा है. इस दौरान इस अख़बार में मोदी सरकार के 40 तो दिल्ली सरकार के 18 विज्ञापन छपे.
अब अगर 15 दिनों के तीनों अख़बारों के साझा आंकड़ों की बात करे तो मोदी सरकार ने जहां 106 वहीं आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने 76 पूरे पन्ने के विज्ञापन छपवाए. इन विज्ञापन पर आने वाले खर्चे का आंकलन करने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री ने इंडियन एक्सप्रेस के विज्ञापन विभाग के एक कर्मचारी से बात की.
बातचीत में उन्होंने बताया कि सरकार से संबंधित तमाम विज्ञापन डीएवीपी के रास्ते आते है. जहां विज्ञापन की कीमत डीएवीपी ही तय करता है. दिल्ली-एनसीआर में एक पूरे पन्ने के विज्ञापन के लिए इंडियन एक्सप्रेस को लगभग एक लाख रुपए मिलते हैं. वहीं हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ़ इंडिया को इंडियन एक्सप्रेस की तुलना में ज़्यादा पैसे मिलते हैं. इसकी वजह है बाकी दोनों अखबारों की अधिक प्रसार संख्या.
अगर हम इंडियन एक्सप्रेस के विज्ञापन दर के हिसाब से आकलन करें तो इन 15 दिनों में मोदी सरकार जनता के पैसे का एक करोड़ छह लाख रुपए और दिल्ली सरकार ने 76 लाख रुपए अपने प्रचार-प्रसार पर खर्च किया. यहां यह बात साफ कर दें कि डीएवीपी के भुगतान की दर टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स के लिए इंडियन एक्सप्रेस के मुकाबले कहीं ज्यादा है. हालांकि इन दोनों संस्थानों के मार्केटिंग विभाग ने हमें विज्ञापन की कीमतों के बारे में जानकारी देने से मना कर दिया.
यह खर्च सिर्फ पूरे पन्ने वाले विज्ञापनों का है. आधे पेज और उससे छोटे विज्ञापनों के लिए एक्सप्रेस को क्रमशः 50 हजार और 25 हजार रुपए मिलते है. सनद रहे ये आंकड़ें सिर्फ तीन अख़बारों में छपे विज्ञापनों के हैं. ऐसे कई अख़बार हैं जिनमें दिल्ली सरकार और मोदी सरकार के विज्ञापन नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे हैं.
दिल्ली सरकार और विज्ञापन
केंद्र की मोदी सरकार को विज्ञापन मामले में टक्कर दे रही अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार एक खास इलाके का विज्ञापन भी पूरे पन्ने पर देती रही. जैसे ओखला में किसी काम के उद्घाटन का ही विज्ञापन, सरकार ने तमाम अख़बारों में पूरे पन्ने पर छपवाए
यही नहीं आप सरकार सरकारी स्कूलों और उसमें पढ़ने वाले बच्चों का इस्तेमाल भी अपने प्रचार-प्रसार के लिए करती रही है. दिल्ली स्कूल टीचर्स एसोसिएशन के सचिव अजय वीर यादव न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में बताते हैं, “दिल्ली सरकार का आदेश है कि हर स्कूल में उन विज्ञापनों को लगाया जाए जो सरकार के शिक्षा के संबंध में किए गए कामों को बारे में बताते है. हर स्कूल में दिल्ली सरकार का पोस्टर लगवाना अनिवार्य है.”
अजय वीर यादव आगे कहते हैं कि हमारे मुख्यमंत्री आईआईटी से पढ़े हुए हैं. वे जानते हैं कि स्कूल में पढ़ाई करने वाले ये छात्र/छात्राएं आने वाले समय में वोटर बनने वाले हैं. इसको ध्यान में रखते हुए सरकार शिक्षा के संबंध में होने वाले हर काम के उद्घाटन का लाइव प्रसारण बच्चों को दिखाती है. लाइव दिखाना एक तरह से अनिवार्य हो गया है.
मजे की बात है कि अखबारों में देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का विज्ञापन शायद ही कभी दिखता हो. पिछले दिनों दिल्ली कांग्रेस ने अखबारों में धड़ल्ले से विज्ञापन दे रही दिल्ली सरकार पर आम जनता का पैसा बर्बाद करने का आरोप लगाया था.
दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष शीला दीक्षित ने आप सरकार के विज्ञापनों को लेकर कहा, “केजरीवाल की दिल्ली सरकार दिल्लीवालों के टैक्स के पैसे को अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाकर अपने प्रचार में बर्बाद कर रही है.” शीला दीक्षित ने केजरीवाल सरकार पर विज्ञापनों के जरिए लोगों को गुमराह करने का भी आरोप लगाया.
कभी आम आदमी पार्टी के नेता रहे वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने भी केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार पर विज्ञापन देने को लेकर जमकर हमला बोला. आशुतोष ने ट्वीट किया कि तगड़ा मुक़ाबला है. केजरीवाल और मोदी में. चुनाव के पहले जनता के ख़ज़ाने का कितना बेजा इस्तेमाल किया जा सकता है. केजरीवाल के पांच फ़ुल पेज विज्ञापन तो मोदी के कुल मिलाकर आठ.
क्यों छप रहे हैं विज्ञापन?
10 मार्च यानी लोकसभा चुनाव की तारीख़ों की घोषणा से एक महीने पहले तक हिंदी या अंग्रेजी के किसी भी अखबार में ख़बरों से ज़्यादा विज्ञापन छपते रहे. जानकार कहते हैं कि चूंकि लोकसभा चुनाव के तारीखों का एलान होने के बाद से सत्ता में बैठी पार्टियां सरकारी खर्चे पर विज्ञापन नहीं कर सकती इसलिए धड़ल्ले से अखबारों में विज्ञापन दिए गए. तमाम चैनलों के कॉन्क्लेव भी हुए जहां सरकारी उपक्रम प्रायोजक और सरकार के नुमाइंदे बतौर वक्ता हिस्सा ले रहे हैं.
(ख़ालिद समीर के सहयोग से)
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