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अबला जीवन की यही कहानी: सिर पर मैला, हाथ में रोटी
हाल ही में प्रयागराज पहुंचे पीएम नरेंद्र मोदी ने सफाईकर्मियों के पैर धोए थे. इसको लेकर मीडिया में बहस चल पड़ी. कुछ लोगों ने पीएम मोदी की तारीफ की तो कुछ ने नाटक बताया. प्रधानमंत्री जब यह सब कर रहे थे तब दिल्ली से महज 70-80 किलोमीटर दूर न्यूज़लॉन्ड्री ने कुछ ऐसा ढूंढ निकाला जिसके बारे में यही कहा जा सकता है कि वहां सभ्यताओं की रोशनी अभी नही पहुंची है.
हम दिल्ली के पड़ोसी मेरठ जिले के शाहजहांपुर गांव में थे. दोपहर के वक़्त बारिश के तुरंत बाद आसमान में सूरज निकल आया है. 50 साल की बुजुर्ग महिला मिथलेश को घर के छोटे-छोटे बच्चे घेरे बैठे हैं. वो आंगन में पकी-अधपकी, बासी-ताजी रोटियों को अलग कर रही हैं. रोटियों के बीच जैसे ही बच्चों की नजर पास्ता पर पड़ती है, बच्चे चहक जाते हैं. ये पास्ता बीती रात का बना हुआ था.
मिथलेश के घर यह तस्वीर रोजाना की है. वह वाल्मीकि समुदाय की महिला हैं. जो सालों से लोगों का मल उठाने का और साफ करने का काम कर रही हैं. हालांकि अब उम्र बढ़ गई है, इसलिए मिथलेश ने खुद मैला उठाना और शौचालय साफ करना कम कर दिया है, बदले में इनके साथ इनकी बहू पूनम अब यह काम करने लगी है.
पूनम बताती हैं , “मायके में ये सब काम मैं नहीं करती थी. शादी के बाद जब ससुराल आई तो मजबूरी में ये ‘गंदा’ काम करने लगी. इस काम को करने का मेरा बिल्कुल मन नहीं करता है. कोई और काम हमें मिल जाए तो इसे छोड़ दें. रोटी के लिए ये सब करना पड़ता है.’’
30 साल की पूनम यह कहते-कहते उदास हो जाती है. पिछले दस साल से पूनम लोगों के घरों से मैला उठाने और शौचालय साफ करने का काम करती आ रही है. हर सुबह सूरज जहां लोगों के लिए नई शुरुआत लेकर आता है, वहीं इनके लिए सूरज ज़लालत की ज़िंदगी लिए आता है. ये हर सुबह मुंह पर दुपट्टा बांध, हाथ में कड़ाही लेकर चल देती हैं.
पूनम देश की राजधानी दिल्ली से महज 80 किलोमीटर दूर मेरठ के शाहजहांपुर गांव की रहने वाली हैं. मेरठ का शाहजहांपुर एक मुस्लिम बाहुल्य गांव है. यहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग काफी पैसे वाले हैं. यहां कुछ ही घर वाल्मीकि समुदाय के लोगों के हैं. वाल्मीकि समुदाय के लोग सफाईकर्मी का ही काम करते हैं. दिल्ली में सफाईकर्मियों के लिए न जाने कितने आंदोलन हुए पर पूनम जैसी कई महिलाओं की जिंदगी पर इसका कोई असर नहीं हुआ. उसमें सालों से कोई बदलाव नहीं आया. देश में मैला उठाना कानूनन बंद हो चुका है लेकिन जमीन पर हकीकत अभी तक नहीं बदली है.
न्यूज़लॉन्ड्री की मुलाकात जब पूनम से हुई तब वो अपनी सास मिथलेश के साथ गांव के घरों से मैला उठाने और शौचालय साफ करने के लिए जा रही थीं. जिन घरों में ये लोग काम करने जाती हैं, उसे ‘ठिकाना’ कहते हैं. पूनम के पास 20 ठिकाने हैं.
12 वीं तक पढ़ाई करने वाली पूनम बताती हैं कि मैं पढ़ने में अच्छी हूं. पढ़कर अपनी जिंदगी को बेहतर रास्ते पर ले जाना चाहती थी. घर वालों के पास पैसे नहीं थे. उन्होंने मेरी शादी कम उम्र में यहां कर दी. अब मैं अपनी जिंदगी नहीं बदल सकती हूं. लेकिन मैं चाहती हूं कि जो काम मैं कर रही हूं वो काम मेरे बच्चे न करें. मेरे बच्चे बाकी समाज के बच्चों की तरह पढ़ाई-लिखाई कर इज्जत का काम करें.
मेरठ के शाहजहांपुर की तरह हरियाणा के कई जिलों में हजारों महिलाएं आज भी मैला उठाने और लोगों का शौचालय साफ़ करने में लगी हुई हैं. ग्रामीण सफाई कर्मचारी यूनियन, फरीदाबाद के प्रमुख मनोज मिर्जापुर बताते हैं कि फरीदाबाद जिले के कई गांवों में आज भी लोग इस तरह के काम करने को मज़बूर हैं. महिलाएं सुबह-सुबह बड़े लोगों के घरों में उनका शौचालय और नाला साफ करने जाती हैं.
कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद गांव के रहने वाले सुखविंद भी वाल्मीकि समुदाय के रहने वाले हैं. सुखविंद बताते हैं कि जब हम छोटे थे तब तो हम उनका सूखा शौचालय भी साफ़ करते थे, धीरे-धीरे शौचालय बनने लगे, लेकिन आज भी हमारे घर की महिलाएं सवर्णों के यहां सफाई करने जाती है.
रोजाना काम के बदले एक रोटी
लोगों का मैला सिर पर उठाने और शौचालय साफ करने से कई तरह की बीमारियां होती हैं. पूनम कहती हैं कि काम से लौटकर आने के बाद घण्टों तक कुछ खाने का मन नहीं होता. कई बार उल्टी भी हो जाती है. शरीर मे दाग होना तो आम बात है. सैकड़ों बीमारियों को न्यौता देने वाले इस काम के लिए इन्हें जो कुछ मिलता है वह मज़ाक लगता है. पूनम बताती हैं, ‘‘हर रोज का हमारा मेहनताना कुछ रोटी भर है. लोग सब्जी अपने मन से देते हैं. वो उनके मन पर निर्भर है.’’
सालों से मैला उठाने का काम करने वाली 60 साल की बुजुर्ग क्रांति बताती हैं, ‘‘पिछले 40 साल से रोजाना एक रोटी ही मेहनताने में मिल रही है. इसके अलावा अब साल भर में 15 से 20 किलो अनाज (चावल-गेहूं) दे देते है. पहले अनाज कम मिलता था.’’
यहां लोग रोटी देने में भी छुआछूत करते हैं. पूनम बताती है, “सब लोग तो नहीं पर कुछ लोग रोटी देते हुए बेहद गलत व्यवहार करते है. गलती से अगर हमारा हाथ या बर्तन उनके शरीर को छू जाए तो वे नाराज़ हो जाते हैं. एक बार एक आंटी ने तो मुझे गाली तक दी. कोई कुछ उल्टा भी बोलता है तो भी हम चुप ही रहते है.”
मेरठ जिले में मैला उठाने वालों के पुनर्वास के लिए काम करने वाली माया बताती हैं, “सिर्फ मेरठ में ही नहीं यूपी के कई इलाकों में महिलाएं सिर्फ एक रोटी और कुछ अनाज की खातिर लोगों का मैला उठाने को उनके शौचालय की सफाई करने को मजबूर हैं. कुछ जगहों पर अब रोटी देना बंद कर दिया गया है. अब उन्हें महीने के 20 से 30 रुपए दिए जाते हैं. 20 से 30 रुपए में क्या किसी का परिवार चल जाएगा?”
मेरठ की तरह ही हरियाणा में भी इन्हें जो मेहनताना मिलता है वो मज़ाक ही लगता है. जींद के रहने वाले संजय कालवन, खुद एक सफाईकर्मी हैं, वो बताते हैं, “यहां भी पहले दो रोटी ही देते थे. बाद में जब कुछ महिलाओं ने शिकायत की तो किसी को महीने के 30 रुपए तो किसी को महीने के 50 रुपए मिलते है.”
पुनर्वास और सरकारी उदासीनता
मैला उठाने वालों के पुनर्वास के लिए ‘नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ पास हुआ. इसमें सरकार ने इनका पुनर्वास कर इन्हें इस काम से निकालने की बात कही, पर पुनर्वास बेहतर तरीके से नहीं हो पा रहा है.
जून 2018 में इंटर मिनिस्टीरियल टास्क फोर्स ने मैनुअल स्कैवेंजर की संख्या का आंकड़ा बताया था. रिपोर्ट के अनुसार देश के 12 राज्यों में 53, 236 लोग मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं. यह आंकड़ा साल 2017 में 13,000 थी. आंकड़ों के अनुसार यूपी में 28,796 मैला सफाईकर्मी हैं. यानि 2017 के मुकाबले मैला ढोने वालों की संख्या में चार गुना बढ़ोत्तरी हो गई थी.
मैला ढोने की इस कुप्रथा को लेकर देश भर में आंदोलन चला रहे बेजवाड़ा विल्सन बताते हैं कि इच्छाशक्ति की कमी की वजह से आज भी मैला साफ करने की प्रथा कायम है. वर्तमान सरकार या पूर्व की सरकार, किसी में भी मैला प्रथा ख़त्म करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखती है. अगर इच्छाशक्ति हो तो यह गंदी प्रथा एक दिन में ख़त्म हो जाए.
सफाईकर्मियों पर मेरठ में काम करने वाली माया बताती हैं, “मेरठ के शाहजहांपुर में ही अभी तक सिर्फ 10 से 12 महिलाओं का पुनर्वास हुआ है. यहां ज्यादातर महिलाएं अभी भी पुनर्वास के इंतज़ार में हैं. हमने सर्वे करके रिपोर्ट कई बार अधिकारियों को सौंपी पर वो सुनने को तैयार नहीं है. सफाईकर्मी भी अब आंदोलन करके थक गए हैं.”
एक आरटीआई से सामने आया था कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान (22 सितंबर, 2017 तक) मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए कोई राशि जारी नहीं की है. इससे पहले आखिरी बार 2013-14 में 55 करोड़ रुपए जारी हुए थे जिसमें से 24 करोड़ रुपये अभी तक खर्च नहीं हुए हैं. तब यूपीए की सरकार थी. जब सरकार पैसे ही खर्च नहीं कर पा रही है तो किस तरह से इन लोगों का पुनर्वास होगा.
सफाई ना करें तो क्या होगा
अगर कोई किसी के यहां काम करने से इंकार कर दे तो क्या होगा. इस सवाल के जवाब में हरियाणा के सरवजीत कुमार बताते हैं, “अगर हम उनका काम न करें तो गांव वाले हमारा बहिष्कार कर देते है. हम लोग गरीब हैं. उनके पास गाड़ियां हैं, खेत हैं. हमारे घर में कोई बीमार होता है तो उनके ही गाड़ी से अस्पताल ले जाते है. उनके ही खेतों से डंगर के लिए घास काटते हैं. अगर हम उनके घर की सफाई नहीं करेंगे तो वो हमारी मदद नहीं करेंगे. जरूरत पड़ने पर वो हमें कर्ज नहीं देंगे.”
मनोज मिर्जापुर कहते हैं कि सफाई ना करने पर हमें मारते भी है. जातिसूचक गालियों का प्रयोग करते है. ऐसा दबाव बनाते है कि हमारी मज़बूरी हो जाती है. अब हमारा समाज पढ़ लिख रहा है तो वो ऐसे काम नहीं करना चाहता है. सरकारी नौकरी का हाल सबको पता है. प्राइवेट में काम करने हमारे समाज के लोग जाते है तो जाति देखकर उन्हें काम पर नहीं रखा है.
दोहरी मार झेल रहे सफाईकर्मी
सत्ता में आने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने खुले में शौच से मुक्ति के लिए स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत सरकार उन लोगों को शौचालय बनवाने के लिए पैसा देती है, जिनके यहां शौचालय नहीं है. इसकी जमकर आलोचना हुई, लेकिन बहुत जगहों पर शौचालय बने भी हैं.
मैला उठाने का काम करने वाली मिथलेश बताती हैं कि लोगों के यहां शौचालय बनने से हमें इस गन्दे काम से कुछ हद तक आज़ादी तो मिली पर हमारी रोजी-रोटी पर ही संकट आ गया है. पहले मेरे 50 से ज्यादा ‘ठिकाने’ थे पर अब 25 से 30 रह गए हैं. शौचालय बनते जा रहे हैं और हमारा काम कम होता जा रहा है. एक तरफ सरकार हमें कोई आर्थिक मदद नहीं दे रही वहीं दूसरी तरफ काम कम होने से परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है.
इस मामले पर बेजवाड़ा विल्सन कहते हैं, “शौचालय तो बने ही ताकि इन्हें इस गंदे काम से आजादी मिले, लेकिन साथ ही इन लोगों का पुनर्वास भी जरूरी है.”
हम एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कार्यक्रम की बात करते हैं जिसमें उन्होंने सफाईकर्मियों के पैर धोए. प्रधानमंत्री के इस आयोजन पर दिल्ली के सफाइकर्मी रणजीत कहते हैं कि दिल्ली के एमएसीडी में बीजेपी सालों से सत्ता में हैं, लेकिन यहां सफाईकर्मियों को समय पर वेतन नहीं मिलता है. पिछले कई दिनों से हम अपने वेतन के लिए आंदोलन कर रहे हैं. मोदीजी ने जो किया वो बस एक चुनावी स्टंट था.
ऐसा ही कुछ कहना है रंजू का. रंजू सफाईकर्मी हैं. वो बताते हैं कि दिल्ली में कई सफाईकर्मियों की मौत सीवर में उतरने के कारण हो गई. उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला. हमारे लोगों को सुरक्षा के लिए कोई समान नहीं मिलता है. बनियान पहनकर सीवर में उतर जाते हैं. बेहतर होता कि मोदी जी हमारी सुरक्षा का इंतज़ाम करते ना कि पैर धोते. पैर धोकर पीएम हमारे दुःख और तकलीफ कम नहीं कर सकते हैं.
बेजवाड़ा विल्सन ने पीएम के पैर धुलाई पर नाराजगी जाहिर करते हुए ट्वीट किया कि वह सफाईकर्मियों के पांव पकड़ते हैं, तो वह यह संदेश दे रहे हैं कि- “आप (सफाईकर्मी) बहुत तुच्छ हैं और मैं महान हूं. इससे किसका फायदा होता है? इनके पैर धोकर वह खुद को महान दिखा रहे हैं. यह बहुत खतरनाक है. पीएम साहब अपने मन को साफ़ करें ना की उनके पैर को.”
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