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ग्राउंड रिपोर्ट : योगीराज में गायों की कत्लगाह बने मुजफ्फरनगर का रहस्य!
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के साथ ही बूचड़खाने बंद हो गए. आवारा पशुओं (जिनमें नकारा, उम्रदराज गायें भी थी) से प्रदेश के सड़क और खेत-खलिहान भर गए. सरकार को कुछ न सूझा तो उसने शराब पर गौसेस नाम से एक नया उपकर लगा दिया. सरकार का नारा साफ है, “जमकर शराब पीयो, गौ-कल्याण में योगदान दो.” लेकिन गौवंश की दशा सुधरने की बजाय बिगड़ती रही. लोक से गऊ का संबंध लगातार छिन्न-भिन्न होता जा रहा है. यह रिपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर इलाके में हो रही गायों की बड़े पैमाने पर मौत की पैमाइश है.
मुजफ्फरनगर के जलालपुर बेहड़ा गांव के निवासी सतवीर भारी गले से कहते हैं, ‘‘बारिश में दिनभर अपनी मरी हुई गायों की तलाश में भटक रहा हूं. दोपहर के दो बज रहे हैं. सुबह से अन्न-जल को छुआ नहीं है. जी कर रहा है कि ज़हर खाकर मर जाऊं. सालों से गायों को खिला पिलाकर बड़ा किया, अब वो न जाने कैसे एक-एक करके मर रही है.’’
सतवीर जब यह सारी बात हमसे बता रहे थे, उसी वक्त उनकी एक गाय अंतिम सांस ले रही थी. चारों खाने चित्त पड़ी गाय के बगल में ही उसका बछड़ा अपनी तकलीफ से गुजर रही मां के पास जाने के लिए बेचैन होकर अपनी रस्सी को तोड़ देना चाहता था. सतवीर बछड़े की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि इसकी मां अगर मर गई तो यह भी दो-तीन दिन में मर जाएगा.
इस तकलीफ से सिर्फ सतवीर ही नहीं गुजर रहे हैं. मुजफ्फरनगर जिले का मोरना ब्लॉक से लगता खादर का इलाका है. इस ब्लॉक के जलालपुर बेहड़ा और रणजीतपुर गांव में रहने वाले लगभग सभी गो-पालक इन दिनों अपनी गायों की असमय और रहस्यमय मौत से परेशान हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने इलाके का दौरा कर पाया कि खादर इलाके में हर तरफ मरी हुई गायों के अवशेष बिखरे पड़े थे. कुछ सड़ी-गली लाशें तो कुछ नई लाशें. चील-कौवे और कुत्ते उन लाशों को नोचते नजर आते हैं. खादर की हवा में बदबू फैली हुई थी. सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी.
60 वर्षीय गज्जे सिंह खुले ग्राउंड की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ये पूरा मैदान मरी हुई गायों से पट गया था. धीरे-धीरे जंगली जानवर लाशों को खा गए. अब तो सिर्फ उनके अवशेष पड़े हुए हैं.
गज्जे सिंह बताते हैं, ‘हमारी 13 डंगर (गायें) मर गई हैं. दुःख तो हमारे जीव को पता है. पर हम करें क्या? हम तो लाचार हैं. किसे क्या कहे? किसके सामने रोए. हम गरीब आदमी है. जैसे तैसे गुजर कर रहे हैं. आगे तो भगवान ही हमारा मालिक है.”
गंगा और उसकी सहायक सलानी नदी के आसपास के खादर में सालों से किसान अपनी गायों को चराते रहे हैं. बरसात के मौसम में जब खादर में पानी भर जाता है तो किसान गांव में लौट आते हैं. बाकी गर्मी और ठंड के महीने में खादर में ही झोपड़ी बनाकर अपनी गायों को चराते रहते हैं. इस साल भी किसान अपनी गायों के साथ खादर में पहुंचे थे, लेकिन फरवरी महीने के शुरू होते ही यहां गायें अचानक से मरने लगी. किसानों का कहना है कि सुबह-सुबह गायें ठीक थीं, लेकिन शाम तक जंगल में गिरकर मर गई. पिछले 15 दिनों के अंदर कई गायें मर चुकी हैं.
मृत गायों की संख्या पर विवाद
खादर में पिछले पंद्रह दिनों में कितनी गायों की मौत हुई इस आंकड़ें पर विवाद है. जहां स्थानीय लोगों का दावा है कि कम से कम 200 से ज्यादा गायों की मौत हुई है और गायों के मरने का सिलसिला अभी जारी है. वहीं स्थानीय प्रशासन का दावा है कि यहां सिर्फ 30 गायों की मौत हुई है. मोरना प्रंखड के मुख्य पशु चिकित्सक डॉक्टर अखिलेश कुमार के देख रेख में बनी टीम के अनुसार वहां इस टीम को 30 पशुओं के शव बरामद हुए. जिसमें से 28 पशु 1 से 1.5 माह पूर्व मृत प्रतीत होते हैं.
लेकिन यहां के लोग सरकारी दावों को खोखला बताते हैं. परमधाम गोशाला के चरवाहा रामकेश प्रशासन के आंकड़े पर सवाल खड़ा करते हैं. जिन गड्ढों में गायों को दफनाया उस तरफ इशारा करते हुए रामकेश कहते हैं, “50 से ज़्यादा तो हमारे गोशाला की गायें मरी हैं. खादर में जिस भी तरफ से आप गुजरिए हर तरफ मरी हुई गायें पड़ी हुई हैं, लेकिन प्रशासन जानबूझकर संख्या कम बता रहा है. उन्हें योगी सरकार का डर है.”
60 वर्षीय किसान सखतू बताते हैं कि उनके पास 85 गायें थी जिसमें से 35 गायों की मौत हो चुकी है. मरी गायों में से 11 दूध देने वाली थी. सुबह हमारी गायें सही जाती थी पर शाम में जंगल में गिरी मिलती थी. दुबली पतली गायें ही नहीं मोटी और तंदरुस्त गायें भी मर गई है. हम लोग तो बर्बाद हो गए है, लेकिन ज़िंदा हैं.
कैसे हुई गायों की मौत?
मृत गायों की संख्या की तरह ही गायों की मौत के कारणों पर भी विवाद है. एक तरफ जहां किसानों का दावा है कि गायों की मौत भूख, करेंट लगने और ज़हरखुरानी के चलते हुई है, वहीं प्रशासन इन मौतों को निमोनिया की वजह से हुई मौत बता रहा है. मरने वाली सैंकड़ों गायों में कुछ का पोस्टमार्टम किया गया है. पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर रविदीप सिंह बताते हैं कि फरवरी के शुरुआत में बरसात हुई थी जिसमें ओले पड़े. जिसके बाद गायों को निमोनिया हो गया. गायों की मौत उसी वजह से हुई है. जहर और करेंट से मौत का कोई लक्षण नहीं मिला है.
स्थानीय निवासी और परमधाम गोशाला के वालंटियर पंकज कुमार न्यूज़लॉन्ड्री से बताते हैं कि खादर इलाके में सैकड़ों सालों से किसान अपनी गायें चराते रहे हैं. चारे की कमी के कारण अब किसानों की निर्भरता खादर के इलाके पर ज्यादा हो गई है. लेकिन इस साल खादर के आधे हिस्से में भू-माफियाओं ने अवैध कब्जा करके गेहूं की खेती कर ली है.
पंकज कुमार आगे बताते हैं, भू-माफिया वन और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को घूस देकर इस इलाके में अवैध कब्जा किए हुए है. इन भू-माफियाओं ने जमीन पर तो कब्जा किया ही, खेत के आसपास के जंगल को भी जला दिया. जिसे गायें चरती थीं. अब भूखी गायों को कुछ चरने को नहीं मिलता तो वो भूख से मरने लगी है. दूसरा इन भू-माफियाओं ने खेत के चारों तरफ इलेक्ट्रिक वायर की बाड़ लगा दिया है. उसमें हमेशा करेंट छोड़ते रहते हैं. भूखी गायें जब खेतों में घुसने की कोशिश करती हैं तो उन्हें करेंट का झटका लगता है और वो वहीं गिर पड़ती हैं. तीसरी बात यह हो रही है कि कुछ भू-माफिया खेत के किनारे के हिस्से में जहर छिड़क देते हैं. गलती से भी अगर गायें इस इलाके में चरती हैं तो उनकी मौत हो जाती है.
हाल के दिनों में हुई बड़ी संख्या में मौतो के पीछे जहरखुरानी ही सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है.
रिपोर्टिंग के दौरान हमने इन अवैध कब्जे वाले खेतों का मुआयना किया तो वहां खेतों के आसपास बिजली का तार लगा मिला और खेत के बीच बने झोपड़ों में सोलर प्लांट और बैटरी लगी हुई थी. इसी सोलर प्लांट के जरिए वायर में बिजली छोड़ी जाती है.
खादर की जमीन पर कब्जा करने वाले ज़्यादातर भू-माफिया मुजफ्फरनगर और बिजनौर के रहने वाले हैं. पुलिस ने इन तमाम भू-माफियाओं के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है. लेकिन क्या प्रशासन की जानकारी के बिना इतने बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा किया गया. इस सवाल के जवाब में जिले के एडीएम आलोक कुमार बताते हैं, “जहां जमीन पर कब्जा किया गया है वो बहुत इंटीरियर का इलाका है. वहां जाना बेहद मुश्किल काम है, लेकिन फिर भी तमाम पहलुओं पर धीरे-धीरे कार्रवाई होगी. सबसे पहले हमने अवैध कब्जा करने वालों की पहचान करके उनपर मामला दर्ज करा दिया है. जल्द ही खेतों का अवैध कब्जा भी हटाया जाएगा.
भू-माफियाओं का किसी पार्टी से संबंध है या उन्हें कोई राजनीतिक दल संरक्षण देता है? इस सवाल के जवाब में पंकज कुमार बताते हैं कि ऐसा तो स्पष्ट नहीं कह सकते, लेकिन जब यहां अवैध कब्जे पर खेती शुरू हुई तब जिला बीजेपी अध्यक्ष सुधीर सैनी ने कहा था कि आप लोग खेती करो बाकी हम देख लेंगे. हमने इस बारे में सुधीर सैनी से भी बात की. इस आरोप को नकारते हुए सुधीर सैनी कहते हैं कि खादर में पहले से ही बड़े-बड़े भू-माफिया जमीनों पर कब्जा किए हुए हैं. मैं भू-माफियाओं के पक्ष में कभी खड़ा नहीं हुआ. खादर में कुछ किसानों को भी जमीनें है जो बिजनौर से सीमा विवाद की वजह से फंसी हुई है. उनको लेकर जरूर कहा था कि आप लोग खेती कीजिए.
सुधीर सैनी गायों की मौत को प्राकृतिक आपदा बताते हैं.
गायों पर करोड़ों खर्च कर रही योगी सरकार
बीजेपी का गाय प्रेम किसी से छुपा हुआ नहीं है. केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद गाय खूब चर्चा में रही. गाय के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की हत्या हुई. इस डर से कई किसानों ने गाय पालना छोड़ दिया. पशुओं की खरीद-बिक्री कम हो गई. डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार ऐतिहासिक पुष्कर मेले में साल 2017 में केवल 161 मवेशियों को व्यापार के लिए लाया गया था और उसमें से केवल आठ की बिक्री हुई.
सबसे ज़्यादा गो-रक्षा के नाम पर हत्याएं राजस्थान में हुई, लेकिन यूपी भी पीछे नहीं रहा. योगी सरकार के कड़े कानून के कारण गायों का व्यापार बंद हो गया. इसके बाद लावारिस गायें किसानों के लिए संकट का बायस बन गईं.
हाल ही में योगी सरकार ने अपना बजट पेश किया. योगी सरकार ने गायों के कल्याण के लिए 632 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया है. द प्रिंट की एक खबर के अनुसार हाल ही में प्रदेश में शराब की बिक्री पर विशेष उपकर लगाया गया है. जिससे प्राप्त होने वाले अनुमानित राजस्व, 165 करोड़ रुपये, का उपयोग प्रदेश के निराश्रित एवं बेसहारा गौवंश के भरण-पोषण पर किया जाएगा. ग्रामीण क्षेत्र में गौवंश के रख रखाव एवं गौशाला निर्माण के लिए 247.60 करोड़ रुपये आवंटित हुआ है. शहरी क्षेत्र में कान्हा गौशाला के साथ बेसहारा पशु आश्रय योजना के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रावधान. देश के विभिन्न शहरों में गौवंश के लिए काजी हाउस की स्थापना और पुनर्निर्माण कार्य के लिए 20 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है.
जब प्रदेश में एक ऐसी सरकार है जो गाय के पक्ष में हर वक़्त खड़े रहने का दावा करती है. उनकी सुरक्षा पर करोड़ों खर्च करने का दावा करती है. ऐसे में मुजफ्फरनगर में गायें बिजली करेंट, जहरखुरानी से मर रही हैं. डॉक्टर कह रहे हैं कि युद्ध स्तर पर गायों का इलाज चल रहा है, लेकिन रिपोर्टर को खादर में कोई भी डॉक्टर नजर नहीं आया. गायें अब भी मर रही हैं.
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