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पुलवामा आतंकी हमले में शहीद जवान नितिन राठौर का अधूरा सपना
14 फरवरी की सुबह तकरीबन 10 बजे सी.आर.पी.एफ के जवान नितिन राठौड़ जब अपनी पत्नी से बात कर रहे थे, तब उनकी पत्नी वंदना को ज़रा भी इल्म ना था कि अपने पति से वह आखिरी बार बात कर रही हैं. क्योंकि इस बातचीत के कुछ ही घंटों बाद 35 साल के सी.आर.पी.एफ कांस्टेबल राठौड़ पुलवामा में आतंकवादी संगठन जैश-ए- मोहम्मद द्वारा किये गए आत्मघाती हमले में शहीद हो गए.
राठौड़ के परिवार में उनके माता- पिता, पत्नी और दो बच्चे हैं. महाराष्ट्र के बुलढाणा शहर के चोर पांगरा गाँव के रहने वाले राठौड़ 2005 में सी.आर.पी.एफ में भर्ती हुए थे. वह सी.आर.पी.एफ की ‘जी’ कंपनी की 03 बटालियन में थे. बहुत ही जल्द उनकी नौकरी में तरक्की होने वाली थी.
न्यूज़लॉन्ड्री से बात करते हुए उनके एक रिश्तेदार अशोक चव्हाण कहते हैं, “अभी 9 फरवरी को ही परिवार के साथ तकरीबन एक महीने की छुट्टी बिताने के बाद वह कश्मीर में अपनी तैनाती पर रवाना हुए थे. मैं खुद उन्हें ट्रेन से रवाना करने के लिए अकोला तक गया था. गुरुवार के दिन आखरी बार उनकी मेरी बहन, जो की उनकी पत्नी है, से बात बात हुई थी, किसी को भी अन्दाज़ा नही था कि ऐसी अनहोनी होने वाली है.
चव्हाण कहते हैं, “जब से मेरी बहन को उनके पति की मृत्यु के बारे में पता चला है तब से उनका रो-रो कर बुरा हाल है, उन्हें शांत करना बेहद मुश्किल हो गया है. मेरे जीजाजी शुरुआत से ही देश की सुरक्षा के लिए काम करना चाहते थे और इसीलिए वह सी.आर.पी.एफ में भर्ती हुए थे. कश्मीर की तैनाती के पहले वह असम में थे. उनकी छह साल की नौकरी और बाकी थी, लेकिन किसे पता था कि ऐसा हो जाएगा. हमारा पूरा परिवार सदमे में है.”
शहीद जवान राठौड़ की सात साल की एक बेटी और एक नौ साल का बेटा है.
राठौड़ के सी.आर.पी.एफ के साथी और करीबी गौतम लहाने कहते हैं, “हम दोनों एक ही बटालियन में थे. वह मेरे लिए एक बड़े भाई के तरह थे.सभी से उनका बर्ताव बहुत शानदार था. मैं यहां सात तारीख को पहुंचा था और नौ तारीख को वह कश्मीर के लिए रवाना हो गए थे. असम में तैनाती के दौरान एक बार लॉन्ग रॉड पेट्रोलिंग करते हुए उग्रवादियों के साथ उनकी घमासान मुठभेड़ हुई थी जिसमे उन्होंने गज़ब की बहादुरी दिखाई थी. वह एक बहादुर और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे, जो अपने साथी सिपाहियों का ख्याल रखते थे.”
लहाने ने बताया कि हाल ही में राठौड़ ने एक ज़मीन पसंद की थी, जिसे वह अपने बच्चों की आगे की पढ़ाई को सुरक्षित करने के लिए खरीदने वाले थे. अपनी अगली छुट्टी में वे ज़मीन के पैसों का भुगतान करके उसे खरीदने वाले थे, लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था.
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