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#गणतंत्र दिवस: संविधान की प्रस्तावना में मौजूद शब्द और उनकी ऐतिहासिकता
‘उद्देशिका एक स्वप्न है जो भारत के लोकतंत्र को समानता और भाईचारे से जोड़ता है.’
9 दिसम्बर, 1946 से 26 नवम्बर, 1949 के दरम्यान संविधान सभा के तकरीबन 308 निर्वाचित सदस्यों ने मिलकर संविधान रचा. उसे 26 जनवरी, यानी आज ही के दिन, 69 साल पहले सन 1950 में लागू किया गया. डॉ राजेंद्र प्रसाद और डॉ भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि वो संविधान को देश की जनता को सौंप रहे हैं. आख़िर ये एक किताब ही तो है और इसे चलाने की ज़िम्मेदारी देश के नेताओं की होगी.
डॉ पट्टाभिसीतारमैया ने कहा, “आख़िर संविधान का अर्थ क्या है? वह राजनीति का व्याकरण है और राजनैतिक नाविक के लिए एक कुतुबनुमा (वाच टावर)… वह चाहे कितना ही अच्छा क्यों न हो, किन्तु वह स्वयं में चेतनाशून्य और प्राणविहीन है. वो इतना ही अच्छा है, जितना हम बना सकते हैं. इसमें निहित शब्दों को जस का तस लेते हैं या उनमें निहित भावना की ओर भी ध्यान देते हैं.” तो क्या संविधान चेतनाशून्य है? इसका जवाब है- नहीं. ये एक जीवंत दस्तावेज़ है और इसकी उद्देशिका यानी प्रस्तावना इसकी और संविधान निर्माताओं की भावना को स्पष्ट करती है.
बाद के राजनेताओं ने ‘राजनीति के व्याकरण’ और उसकी उद्देशिका में ही राजनीतिक करके बदलाव कर दिए. चूंकि संविधान तो गतिमान है, सो इसमें बदलाव स्वाभाविक है, और तभी इसकी सार्थकता है, पर क्या प्रस्तावना में भी बदलाव ज़रूरी हैं? इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि ये है क्या? बदलाव क्या थे और किसने किये और उसका उद्देश्य क्या था?
क्या है उद्देशिका या प्रस्तावना
उद्देशिका आधुनिक भारत का स्वप्न है, नीति सम्बंधित उद्घोषणा है जिसमें राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को समानता और भाईचारे से जोड़ते हुए स्थापित करने का प्रयास है. 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरु ने संविधान सभा में संविधान की उद्देशिका का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था. उद्देशिका के प्रस्ताव पर जवाहरलाल नेहरु ने एक घंटे तक भाषण दिया था.
नेहरू के शब्दों में ये एक घोषणा है, एक दृढ़ निश्चय है, एक प्रतिज्ञा है, एक वचन है और हम सभी के लिए एक समर्पण है. उद्देशिका के सफल संयोजन पर अर्नेस्ट बॉक्रर ने अपनी पुस्तक ‘सोशल एंड पोलिटिकल थ्योरी’ में कहा कि पुस्तक के समस्त तर्क संक्षेप में समाहित हैं और उद्देशिका उनकी किताब का सार है.
नेहरु को इसमें लोकतंत्र शब्द लिखने से परहेज़ क्यों था
यह एक अल्पज्ञात तथ्य है. कम ही लोग इस बात को जानते या मानते हैं कि जब नेहरु ने उद्देशिका पर भाषण दिया, तब उन्होंने लोकतंत्र शब्द का उल्लेख भी नहीं किया और उसकी सफाई भी दी थी. सभा के सभी सदस्यों का एक ही मत था- देश को प्रभुत्वसंपन्न गणतंत्र बनाया जाए. सदस्य, प्रो. केटी शाह ने ‘लोकतंत्र’ शब्द के न होने पर कहा कि संभव है संविधान का स्वरुप लोकतंत्र हो और उसका उद्देश्य भी लोकतांत्रिक हो, लेकिन यदि संविधान के अनुच्छेदों को ध्यान से पढ़ा जाए तो ज्ञात होता है कि लोकतंत्र की परिभाषा ‘लोगों का शासन, लोगों के द्वारा, लोगो के लिए’ अभी दूर है.
इसमें बदलाव कब और क्यों हुआ
इंदिरा गांधी के शासनकाल में आपातकाल लागू किया गया था और इसके तुरंत बाद उन्होंने सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया जिसका उद्देश्य संविधान का पुनरावलोकन करना था. यानी इंदिरा को इसमें कुछ ख़ामियां नज़र आ रहीं थीं और वो इनका निवारण चाहती थीं. कमेटी ने कई प्रस्ताव दिए- जैसे मूलभूत कर्तव्यों (नीति निर्देशक तत्व) का महत्व, साम्प्रदायिकता से परे रहना, संप्रुभता को बचाए रखने के लिए एकता और अखंडता, संविधान द्वारा निर्मित लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान और ये भी कि जनता टैक्स चुकाए, सरकारी संपत्ति का सम्मान रखना (आप पढ़ते हैं न- निगम की बसें राष्ट्रीय धरोहर है. इनकी देखभाल आपका कर्तव्य है और नुकसान पहुंचाना अपराध). रिपोर्ट ने संविधान में संशोधन के अनेक विवादस्पद प्रस्ताव दिए थे. कमेटी का एक सुझाव था जिसमें संविधान की उद्देश्यिका में निहित शब्दों में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘गरिमा’ जैसे शब्दों को जोड़ना. इन सभी सुझावों को 42वें संविधान संशोधन के बाद संविधान में शामिल किया गया.
प्रस्तावना में बदलाव का विरोध
42वें संविधान संशोधन में कुल 59 प्रावधान किये गए थे इसीलिए इसे ‘मिनी कांस्टीट्यूशन’ भी कहा जाता है. इसके तहत विधायिका को अधिकाधिक अधिकार देने की कोशिश की गयी. संविधान विशेषज्ञों ने प्रस्तावना में जोड़े गए शब्दों की अप्रासंगिकता के विरोध में कुछ बातें कहीं. पहली ये कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में बदलाव तो संभव है पर इसकी आत्मा से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. चूंकि, प्रस्तावना भारतीय इतिहास में वो एक अहम क्षण है, जब 1949 में भारतीय जनता ने अपने भविष्य के लिए प्रण लिया था, इसीलिए प्रस्तावना में तब्दीली की गुंजाइश नहीं है.
दूसरा, प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द जोड़कर संविधान के भाव को स्पष्ट करने की बजाय और उलझा दिया गया है. रुसी लेखक ऐलक्जेंडर सोल्ज़िनित्सिन ने किसी और संदर्भ में लोकतांत्रिक समाजवाद की अवधारणा की बड़े पुरज़ोर तरीक़े से मुखालफ़त की है. उनके शब्दों में लोकतांत्रिक समाजवाद सुनने में तो बड़ा अच्छा लगता है पर ये कुछ इसी तरह है जैसे उबलती हुई बर्फ़. जैसे आग बर्फ़ को पिघला देती है, समाजवाद लोकतंत्र को खा जाने के लिए आतुर रहता है. और, जैसे-जैसे लोकतंत्र कमज़ोर होता जाएगा, उत्पीड़न की ताक़तें विश्व में फैलती जायेंगी.
तीसरा, तर्क था कि प्रस्तावना में ‘धर्म-निरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ को शामिल करने से कुछ हासिल नहीं होता है. यह बात एक हद तक सही प्रतीत होती है. शुरुआत की प्रस्तावना में हर नागरिक को अभिव्यक्ति, विचार, धर्म, मज़हब और पूजा का अधिकार देना लिखा गया था. राष्ट्र की एकता की बात भी कही गयी है. ऐसे में पंथ-निरपेक्षता और अखंडता जोड़ना विचारों की पुनरावृत्ति ही है. नेहरु के शासनकाल में धर्म निरपेक्षता का मतलब शासन को हर धर्म से सामान दूरी पर रखना था. बाद में इसे तोड़-मरोड़कर हर मज़हब को ख़ुश रखने से जोड़ दिया गया और यही साम्प्रदायिकता का आधार बना.
मशहूर वकील नानी पालकीवाला ने कहा था कि इसमें ‘समाजवाद’ शब्द भ्रम पैदा करता है. क्यूंकि, ये प्रस्तावना है, इसमें पंथ निरपेक्षता’ और ‘एकता’ जैसे शब्दों के कोई मायने नहीं हैं. उन्हें ये राजनैतिक जुमलेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नज़र नहीं आया.
परिणाम क्या रहा
42वें और 44वें संविधान संशोधनों ने केंद्र सरकार के हाथों में अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान कर दी. आपातकाल लागू किया जा चुका था, न्यायपालिका का दर्ज़ा गिराकर, संसद द्वारा किये संविधान में बदलावों की समीक्षा का अधिकार उससे छीन लिया गया, जनसंख्या वृद्धि रोकने के लिए एक वर्ग को निशाना बनाया गया, हडतालें कम हुईं, सरकारी संस्थानों में कर्मचारी और अफ़सर समय पर आते थे. बाद में केशवानंद भारती बनाम केंद्र, गोलकनाथ बनाम केंद्र और मिनर्वा मिल्स बनाम केंद्र जैसे मामलों ने ये सुनिश्चित किया कि संविधान की आत्मा अक्षुण्ण है और मूलभूत अधिकार नीति निर्देशक तत्वों से ऊपर रखे जाएं. बावजूद इसके, प्रस्तावना का पुराना स्वरुप बरक़रार नहीं रह पाया.
क्या उद्देशिका अब भी सार्थक है
यूं तो ये किसी किताब के प्राक्कथन जैसा नहीं है पर इसको लागू करना संविधान के आदेशों में नहीं है. पर एक बार ऐसा भी वक़्त आया जब तमिलनाडु में हाईकोर्ट ने इसके मद्देनज़र हिंदी-विरोधी आन्दोलनकारियों को राज्य सरकार द्वारा पेंशन दिए जाने के आदेश को उद्देशिका में वर्णित एकता और अखंडता के सिद्धांत का उल्लंघन करने के आरोप में खारिज कर दिया था.
हम चाहे कितना भी ढिंढोरा पीट लें, अब न देश में समाजवाद रहा और ना ही राज्य धर्मनिरपेक्ष रहा. पूंजीवाद अब एक हक़ीक़त है और दीवाली के उपलक्ष्य में कई राज्यों में सरकारी भवनों पर रोशनियां की जाती हैं पर ईद पर ऐसा नहीं किया जाता. हालांकि यह सरकारों पर भी निर्भर करता है.
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