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प्लाएबल पत्रकारिता और गाल पर ढलक आए आंसुओं के बीच नंगा खड़ा लटियन दिल्ली का पत्रकार
साल की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया को दिए जाने वाले सालाना इंटरव्यू से हुई. इस बार उन्होंने प्राइवेट न्यूज़ एजेंसी एएनआई की मैनेजिंग एडिटर स्मिता प्रकाश को साक्षात्कार दिया. तक़रीन डेढ़ घंटे से भी ज़्यादा समयावधि वाले इस इंटरव्यू को लेकर लोगों की अलग-अलग राय है, जो कि कमोबेश सामान्य बात है. कुछ को इंटरव्यू प्रायोजित लगा, तो कुछ को संतुलित. कुछ को लगा कि ये पिछले पांच सालों में हुए पीएम के सभी इंटरव्यू से बेहतर था तो कुछ को लगा कि सवाल के बाद प्रतिप्रश्न नदारद थे, सवाल लचीले थे इत्यादि.
कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की भी कुछ ऐसी ही राय थी. उन्होंने एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस के दौरान कह दिया कि– एएनआई की मैनेजिंग एडिटर स्मिता प्रकाश खुद ही प्रधानमंत्री से सवाल भी कर रहीं थीं और खुद ही उसका जवाब भी दे रहीं थीं. राहुल गांधी ने इंटरव्यू के दौरान स्मिता प्रकाश के पूरे व्यवहार को अंग्रेज़ी के एक शब्द ‘प्लाएबल’ से परिभाषित किया.
‘प्लाएबल’ शब्द का हिंदी अर्थ होता है लचीला, आसानी से किसी से सहमत हो जानने वाला या दब्बू. यह निस्संदेह एक अपमानजनक शब्द तो है लेकिन, गाली नहीं है मसलन– प्रेस्टीट्यूट, बाज़ारू, दलाल और न्यूज़ ट्रेडर्स जैसे शब्दों के मुकाबले. ये शब्द पत्रकारों के लिए मूल रूप से बीजेपी और आप के नेताओं ने समय-समय पर इस्तेमाल किया है.
राहुल गांधी के इस कटाक्ष पर स्मिता प्रकाश ने कड़ा विरोध जताते हुए उन पर सीधे-सीधे ट्वीटर के ज़रिए हमला किया. देखा जाए तो ये द्विपक्षीय मामला था– जो राहुल गांधी और स्मिता प्रकाश के बीच की बात थी और दोनो आसानी से इसे खुद सुलझा लेते. लेकिन रातों-रात ये मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया. सोशल मीडिया से लेकर मीडिया के संगठनों ने तलवारें खींच ली.
राहुल की तरफ़ से कांग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया टीम और स्मिता प्रकाश की तरफ़ से तमाम बड़े पत्रकारों के अलावा वित्तमंत्री अरुण जेटली भी मैदान में उतर गए. अरुण जेटली ने तो एक मौके पर बिल्कुल ट्रोल्स वाली भाषा में पूछा- “कहां हैं वो लिबरल, सेक्युलर पत्रकार.”
जेटली के मैदान में उतरने का असर हुआ. शहर के तमाम बड़े पत्रकार भी स्मिता प्रकाश के पक्ष में बयान जारी करने को मजबूर हो गए. लगे हाथ मीडिया और पत्रकार संस्थाएं जिनमें एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, वुमेन प्रेस कॉर्प्स, प्रेस एसोसिएशन आदि शामिल हैं, ने भी राहुल के बयान की लानत-मलानत कर फर्ज अदायगी कर दी. साथ ही इस पूरे मामले को प्रेस पर किए गए पूर्व के हमलों (जो आप और बीजेपी के नेताओं ने की थीं) से जोड़ दिया गया.
इस तस्वीर का एक और पहलु है. ठीक उसी समय जब स्मिता प्रकाश पर राहुल की टिप्पणी को लेकर पत्रकारिता संकट में थी तब देश के सुदूर दक्षिण के राज्य केरल में कुछ अभूतपूर्व घट रहा था. केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे आंदोलन में एक नया मोड़ उस वक्त आया जब साल के पहले दिन छह लाख महिलाओं ने पूरे राज्य में एक दीवार बनाई. इसके एक दिन बाद, बुधवार की सुबह साढ़े तीन बजे बिंदु और कनकदुर्गा नाम की दो महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए. इस घटना के विरोध में अगले दिन से मंदिर परिसर के नज़दीक और केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में संघ परिवार, भाजपा ने संगठित विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया.
संघ और भाजपा के इस प्रदर्शन से जुड़ी एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें कैराली टीवी की फ़ोटो-जर्नलिस्ट ‘शजीला-अली-फ़ातिमा अब्दुलरहमान’ को संघ के कार्यकर्ता घेर कर डराने-धमकाने की कोशिश करते दिख रहे थे. शजीला को पीछे से लात मारी गई. जिस समय शजीला पर ये शारीरिक हमला किया गया उस समय वे अपने कैमरे से विरोध-प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग कर रहीं थीं. मीडिया में वायरल तस्वीर में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि शजीला की आंखों से आंसु ढलक कर उनके गालों तक पहुंच गए हैं, फिर भी शजीला रोते हुए अपना काम कर रही हैं. वे न भागीं, न हटीं, न डरीं.
शजीला उस वक्त़ एक पत्रकार का ही फर्ज़ नहीं अदा कर रहीं थीं, बल्कि वे भारत की उन कामकाजी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं, जिन्होंने सदियों की रूढ़ियों को तोड़कर अपने लिए स्थान बनाया है. शजीला ने उस दिन भारतीय पत्रकारिता की मशाल को अकेले अपने कंधों में एक कैमरे के रूप में उठाए रखा. उस घटना के बारे में बताते हुए शजीला ने टीवी-18 को दिए एक इंटरव्यू में बताया, “मुझे जब पीछे से लात मारी गई तो मैं सदमे में थी. वो मेरे प्रोफेशनल करियर का सबसे बुरा अनुभव था. मुझे नहीं पता कि वो लात मुझे किसने मारी, मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन काफी चोट लगी. मैं दर्द से कराह रही थी, उन हमलावरों ने मुझसे मेरा कैमरा छीनने की कोशिश की लेकिन मैंने उसे बचाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया. इस सब में मेरी गर्दन में भी चोट आयी. मैं डर के कारण नहीं रो रही थी, बल्कि बेबसी के कारण रो रही थी.”
उन्होंने आगे कहा, “मैं बीजेपी से डरती नहीं हूं. मैं आगे भी बीजेपी के प्रदर्शनों को कवर रहूंगी… शायद इन लोगों को महिलाओं का घर से बाहर आना पसंद नहीं है.”
वापिस, स्मिता प्रकाश की तरफ लौटते हैं– लुटियंस दिल्ली के पॉवर ज़ोन में ये सभी को पता है कि वे एएनआई की न सिर्फ़ मैनेजिंग एडिटर हैं बल्कि मालकिन भी हैं. एएनआई की स्थापना उनके ससुर ने कुछ साल पहले की थी. उसकी ज़िम्मेदारी अब स्मिता के कंधों पर आ गई है. इस लिहाज से स्मिता आधुनिक भारत की सशक्त, पेशेवर, कामकाजी महिला का प्रतिनिधि चेहरा हैं. जाहिर है उन्होंने राहुल गांधी की टिप्पणी का प्रतिकार कर उचित ही किया. अगर प्रिविलेज्ड होने के बावजूद स्मिता के साथ कोई ग़लत व्यवहार होता है तो उन्हें अपने हक़ के लिए खड़े होने और औरों का उनका साथ देने में कोई भेदभाव सिर्फ़ इसलिए नहीं होना चाहिए कि वो प्रिविलेज्ड क्लास से हैं. क्योंकि अंतत: वे एक महिला हैं और मीडियाकर्मी भी. ऐसे में उनके दोनों ही अधिकारों की रक्षा करना मीडिया फ्रटर्निटी की भी ज़िम्मेदारी है.
लेकिन फ्रटर्निटी की यह भावना कितनी चुनिंदा, क्लास केंद्रित और दिल्ली केंद्रित है, उसके लिए हिंदी साहित्य के अंडरवर्ल्ड में इस्तेमाल होने वाला एक वाक्य सबसे मुफीद है- “तू मेरा पंत, मैं तेरा निराला”. दिल्ली की मीडिया फ्रटर्निटी भी बिल्कुल उसी तर्ज पर तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाऊं का रुख एकाधिक मौकों पर अख्तियार करती रही है.
एडिटर्स गिल्ड ने जिस वक्त स्मिता प्रकाश के पक्ष में आवाज़ उठाने का निर्णय किया तब तक सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका शजीला फातिमा के ऊपर हुआ हमला उसे क्यों नज़र नहीं आया. आज तक उसे शजीला का दर्द महसूस नहीं हुआ है क्योंकि लटियन का मीडिया भी टेफ्लॉन कोटेड है, जिसे लटियन वालों का ही दर्द समझ में आता है, बाकियों के दर्द से वह मुक्त है. महिला भी उसके लिए सिर्फ स्मिता प्रकाश हैं, शजीला नहीं.
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, वुमेन प्रेस कॉर्प्स या प्रेस एसोसिएशन ने बार-बार अपने आपको एक दूसरे का मुखापेक्षी सिद्ध किया है. एक तो ये संस्थान अपनी तरफ से पहल करके कोई स्टैंड नही लेते, इंतजार करते हैं. देर से मिला जुलाकर कोई बयान जारी भी करते हैं तो वह कोई स्पष्ट स्टैंड होने की बजाय बैलेंसवादी कसरत ज्यादा होती है. स्मिता प्रकाश के मामले में भी यही हुआ. एडिटर्स गिल्ड के बयान के बाद इन्होंने लचर सा बयान जारी किया. शजीला को लेकर इनकी नींद अभी भी नहीं खुली है.
स्मिता प्रकाश के मुकाबले शजीला को रखकर एक बार दोनों के ऊपर हुए हमले का एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कीजिए. स्मिता प्रकाश अस्तित्व या शारीरिक संकट से ज्यादा एक अहम और परसेप्शन की लड़ाई लड़ रही हैं. इस लड़ाई में उन्हें ज्यादा से ज्यादा ईगो की संतुष्टि मिलेगी. राहुल गांधी कोई उनकी जान के ऊपर खतरा बन कर नहीं मंडरा रहे. और इस लड़ाई में उनके साथ परम शक्तिशाली अरुण जेटली जैसे लोगों का साथ भी है.
इसके विपरीत शजीला की लड़ाई किसी व्यक्तिगत अंहकार को तुष्ट करने की है ही नहीं. शजीला के सामने संकट उनकी नौकरी के साथ उनकी जान-माल का है. उनके साथ स्थानीय पत्रकारों के अलावा कोई ताकतवर व्यक्ति नहीं खड़ा है, न ही उन्हें देश का प्रधानमंत्री साक्षात्कार के लिए बुलाता है. शजीला की लड़ाई एकाकी है.
शजीला और स्मिता प्रकाश का यह अंतर ही मीडिया संगठनों, पत्रकार संगठनों की प्रतिक्रिया में अंतर पैदा कर देता है. एक स्मिता प्रकाश अनगिनत शजीला को रोजी-रोटी मुहैया करवाती है. एक शजीला के स्मिता प्रकाश बनने की राह में असंख्य रोड़े हैं. टेफ्लॉन कोटेड लटियन मीडिया जानता है कि स्मिता प्रकाश के पक्ष में बोलने के मुनाफे शजीला के पक्ष में बोलने से कई गुना ज्यादा हैं.
जिस एडिटर्स गिल्ड को मीटू के दर्जनों आरोपों के बाद एमजे अक़बर और तरुण तेजपाल की सदस्यता खत्म करने में महीनों और सालों लग गए, वही एडिटर्स गिल्ड स्मिता प्रकाश के मामले में 24 घंटे के भीतर बयान जारी कर देता है. गिल्ड को महीनों पुराने वाकये याद आते हैं, लेकिन संघ के उपद्रवियों द्वारा 24 घंटे पहले, केरल की सड़कों पर प्रताड़ित की जाती शजीला की तस्वीर नज़र नहीं आती. जो एडिटर, संपादक, एंकर, मीडिया मालिक, पत्रकार स्मिता के समर्थन में सोशल मीडिया पर अपना समय और ऊर्जा इनवेस्ट कर रहे हैं, क्या उन्हें आंखों में आंसु भरी शजीला की वो शानदार छवि इतना भी प्रेरित नहीं कर पायी कि उसके पक्ष में भी एक स्टेटमेंट जारी कर देते?
दरअसल मुद्दा न पत्रकार हैं, न पत्रकारिता और न ही कोई महिला या उसकी गरिमा. मुद्दा सिर्फ़ और सिर्फ़ ये है कि यहां हर कदम, हर बयान और हर विरोध के पीछे एक सोची समझी और स्थापित परंपरा है. स्मिता प्रकाश और शजीला फ़ातिमा की हैसियत में जो फर्क़ वो ही मौजूदा समय का असल मुद्दा है.
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