Newslaundry Hindi
‘चिल्ड्रेन ऑफ वॉर’ की याद दिलाती हिबा निसार
साल 2015 में तुर्की के समुद्र तट पर औंधे मुंह पड़े 3 साल के आयलान कुर्दी का बेजान शरीर, जिसने सीरिया संकट की भयावहता को दुनिया के सामने ला दिया था. कश्मीर के शोपियां जिले की हिबा की तस्वीर आयलान की तस्वीर के समकक्ष खड़ी नज़र आती है. मीडिया में आई हिबा की तस्वीरें विचलित करने वाली थी. हिंदी मीडिया में इस पर कोई भी विस्तृत रिपोर्ट अब तक देखने-पढ़ने को नहीं मिली है. यही कारण था कि हिंसाग्रस्त क्षेत्र में हिबा और आयलान होने के सामाजिक और राजनीतिक मायने समझने के लिए इस रिपोर्टर ने दक्षिण कश्मीर के शोपियां का दौरा करने का निर्णय किया.
हिबा का पूरा नाम है हिबा निसार. हिबा की चर्चा इनदिनों कश्मीर की सबसे छोटी उम्र (18 महीने) की पेलेट गन सर्वाइवर के रूप में हो रही है. जिस वक्त हम शोपियां के कापरन गांव स्थित हिबा के घर पहुंचे, उस वक्त हिबा अपने बड़े भाई शहादत (साढ़े चार साल) के साथ खेल रही थी. अपने घर आए नए चेहरों को देख शहादत ने खेलना बंद कर दिया. हिबा ने हमारी तरफ ध्यान नहीं दिया. वह हमसे दूर भागती रही. हिबा की मां मर्शला जान ने बताया कि जब भी कोई हिबा के करीब आता है तो वह काफी डर जाती है, क्योंकि उसे लगता है कि डॉक्टर आया है.
यह जान लें कि ऐसा पहली बार नहीं है जब हिबा के परिवार में किसी को पेलेट लगा है. इससे पहले साल 2016 में बुरहान वानी की मौत के हंगामे के दौरान हिबा की चचेरी बहन इंशा ने भी पेलेट के कारण अपने दोनों आंखों की रोशनी गंवानी पड़ी थी.
दहशत की रात
25 नवंबर, 2018 के दिन सुरक्षाबलों को सूचना मिली थी कि शोपियां के बठकंड गांव में 6 आतंकवादी छिपे हुए हैं. सेना ने गांव को चारों ओर से घेर लिया और तकरीबन रात 1 बजे से आतंकियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ शुरू हो गई. सुबह 8:30 बजे तक चली इस कार्रवाई में 6 आतंकी और सेना का एक जवान मारा गया.
जैसे ही अंधेरा छटने को हुआ गांव के लोगों ने सुरक्षाबलों पर पत्थर चलाना शुरू कर दिया. जवाबी कार्रवाई में सेना ने पेलेट गन का इस्तेमाल किया. कोई स्पष्ट आंकड़ा मौजूद नहीं हैं कि उस दिन कितने लोग पेलेट से घायल हुए लेकिन गाम्रीण अपने हाथों पर पेलेट के निशान दिखाते हैं.
सुबह करीब साढ़े छह बजे सेना ने पत्थर फेंक रहे युवाओं को भगाने के लिए टियर सेल (मिर्ची गैस का गोला) का इस्तेमाल किया. एक ऐसा ही टियर सेल मर्शला जान के घर में गिरा. मर्शला बताती हैं, “हमारे घर पर उन्होंने ‘ज़हर’ फेंका. ‘ज़हर’ की महक बर्दाश्त के बाहर थी.”
मिर्ची गैस से होनेवाली जलन और घुटन से परेशान होकर हिबा का परिवार बाहर निकला ही था कि पत्थरबाज़ों पर चलाई जा रही पेलेट हिबा की दाईं आंख में जा लगी.
“हिबा पत्थरबाज़ नहीं है फिर पेलेट उसे क्यों मारा गया”
दक्षिण कश्मीर में शोपियां और त्राल क्षेत्र सबसे ज्यादा आंतक प्रभावित इलाका है. “रेज इन कश्मीर” के लेखक डेविड देवदास कहते हैं, “1998 से 2005 के वर्ष, जिसे सामान्य तौर पर घाटी का शांतिप्रिय वक्त बताया जाता है, तब भी शोपियां एक ऐसा क्षेत्र था जहां मिलिटेंट्स सक्रिय थे.”
शोपियांके -8 डिग्री सेल्सियस तापमान में बात करना भी मुश्किल हो रहा था. लेकिन मर्शला के घर के अंदर एक अजीब सी दुर्गंध थी. मर्शला ने कहा, “इसीलिए मैं आपको अंदर नहीं ला रही थी.” उनके घर में मिर्ची गैस फेंके हुए महीना बीत चुका था लेकिन उसकी गंध अभी भी बनी हुई थी. मेरे लिए यह अंदाजा लगाना पाना कतई मुश्किल नहीं था कि मिर्ची गैस की वास्तविक गंध क्या रही होगी.
बातचीत करते हुए मर्शला सहज हो गईं थीं. वह वापस उस सुबह को याद नहीं करना चाहती लेकिन उन्हें उम्मीद है कि दिल्ली से आए पत्रकार को बताने पर उनकी कुछ मदद हो सकती है. मर्शला पूछती हैं, “हिबा की क्या गलती थी? उसे क्यों पेलेट मारा गया?” गांव के लोग कैमरे पर क्या रिकॉर्डर पर भी कुछ बताने को तैयार नहीं हुए. हालांकि 25 नवंबर के घटनाक्रम का जिक्र करते हुए जो तस्वीर बनती है, उसमें यह स्थापित होता नहीं दिखता कि हिबा को टारगेट करके पेलेट मारा गया होगा. लेकिन तथ्य यह है कि 18 महीने की बच्ची अपनी आंखों की रोशनी खोने के कगार पर है.
हिबा के दादा ने बताया, “आंख में पेलेट लगने के बाद हिबा का पूरा चेहरा खून से लथपथ था. मर्शला और मैं उसे धुंए में ही लेकर भागे जा रहे थे. भागते हुए हमें इतना भी ध्यान नहीं रहा कि शहादत घर पर ही छूट गया है.”
हिबा को कुछ स्थानीय लड़के अपनी बाइक से अस्पताल लेकर गए. हिबा का प्राथमिक ईलाज शोपियां के जिला अस्पताल में हुआ था. उसके बाद उसे श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह अस्पताल रेफर कर दिया गया. शहादत और मर्शला को भी हाथों पर तीन-तीन पेलेट लगे थे.
मर्शला ने कहा, “हिबा अभी भी बच्ची है. न वह नारे लगा रही थी. न वह पत्थर फेंक रही थी. न उसका घाटी को लेकर कोई मत है. जब निर्दोष लोगों पर पेलेट चलता है तो बहुत दुख होता है. गुस्सा आता है.”
हालांकि मर्शला की बातें एक मां की भावनाएं ज्यादा हैं और इस बात के सबूत नहीं हैं कि हिबा को टार्गेट करके सुरक्षाबलों ने पेलेट चलाया. लेकिन कश्मीर की हिंसाग्रस्त जिंदगी में इस तरह के अनगिनत उदाहरण हैं जो इस टकराव में अनायास पिस रहे हैं.
“लोगों की दुनिया उजाड़कर आप कैसे शांति स्थापित करवाएंगें?” मर्शला आगे जोड़ती हैं. “मेरा चिंता हिबा के भविष्य को लेकर रहती है. मैं सिर्फ चाहती हूं कि उसकी आंखों की रोशनी किसी तरह वापस आ जाए,” कहते हुए मर्शला रोने को हो जाती हैं.
उस दिन को याद करते हुए मर्शला बताती हैं, “जब मैं अपने बच्चों के साथ जहरीली गैस से बचने घर के बाहर आई थी, मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि हिबा के साथ कुछ ऐसा होगा. अगर मैंने दरवाज़ा नहीं खोला होता तो धुंए की वजह से अंदर ही सबका दम घुट गया होता.” वह बार-बार मिर्ची गैस को ज़हर कहती हैं.
घाटी में इंसाफ नहीं हैं आसान
मर्शला को हिबा के लिए इंसाफ चाहिए लेकिन कैसा इंसाफ वह खुद भी नहीं जानती. वह नहीं जानती या शायद कहना नहीं चाहती कि हिबा के लिए इंसाफ घाटी की शांति होगी या हिबा का बेहतर भविष्य. मर्शला ने कहा, “अगर हिबा की आंखों की जगह कहीं और पेलेट लगा होता तो उनकी दुनिया आज कुछ और होती,” कहते हुए मर्शला हिबा की ओर देखने लगीं.
पेलेट लगने के बाद हिबा का वज़न साढ़े 6 किलो से घटकर 5 किलो रह गया है. एनेस्थिसिया के कारण हिबा का खाना-पीना भी काफी कम हो गया है. हिबा की दाईं आंख की रोशनी वापस आएगी या नहीं इस पर संशय बना हुआ है. डॉक्टर इस आशंका से इनकार नहीं करते कि उसकी आंखों की रोशनी जा सकती है.
18 महीने की छोटी सी उम्र में हिबा को कई सर्जरियों से गुज़रना होगा. वह उस पड़ाव पर है जहां वह अपने दर्द को सिर्फ महसूस कर सकती है लेकिन बता नहीं सकती. जब मैंने हिबा को गोद लेने की कोशिश की तो वह बिना डरे गोद में आ जरूर गई. लेकिन दर्द होने पर वह सिर्फ अपनी आखों की ओर इशारा करने लगती है.
घटना के दिन हिबा के पिता घर पर नहीं थे. वह अनंतनाग में सेबों के बगान में काम करते हैं. मर्शला ने हमें बताया कि जो पेलेट हिबा की आंखों में लगे थे उसे हिबा के पिता ने संभालकर रखा है. “जब वह बड़ी हो जाएगी, तो उसे उसकी हालत का क्या जवाब देंगे? वह पेलेट हिबा को जवाब होगा,” हिबा के दादा ने कहा.
श्रीनगर स्थित जम्मू-कश्मीर कोलिजन ऑफ सिविल सोसायटी के कार्यालय से मिले पेलेट संबंधित कैज़ुएलिटी के आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2016 से फरवरी 2017 के बीच 6,221 लोग पेलेट गन से घायल हुए थे. जिसमें से 782 लोगों की आंखों में पेलेट लगी थी.
हालांकि श्रीनगर के एसएमएचएस अस्पताल के रिकॉर्ड्स के मुताबिक बीते 4 महीनों में 1,178 लोगों की आंखें पेलेट से खराब हुई हैं. सिविल सोसायटी का कहना है कि लोगों की आंखों में जब पेलेट लगती है तो उसे काफी नजदीक से मारा जाता है. वहीं सीआरपीएफ द्वारा गृह मंत्रालय को भेजी गई एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले अगस्त 2016 में 1.3 मिलियन पेलेट्स इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया था.
घाटी में 2010 से पेलेट गन का इस्तेमाल जारी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक पेलेट गन से 2016 में 13 लोगों की जान गई थी, वहीं 2017 में 4 लोगों की मौत पेलेट गन से हुई है. सरकारी अधिकारियों ने शहादत का बयान दर्ज किया है.
मैंने जब हिबा के भाई शहादत से मुठभेड़ वाली रात के संबंध में पूछा तो उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया- “आर्मी” और “पेलेट”. वह हिबा की आंख पर लगी पट्टी को छूकर कहता है, “यह मेरे आंख में लगता!” मैं जब तक वहां रही, शहादत हिबा के पास ही बना रहा. कभी उसे अपने खिलौने देता या उससे बातें करने की कोशिश में लगा रहता. या कभी उससे मेरा फोन छीनने की कोशिश करता.
उसे अपने हाथों पर लगे पेलेट याद नहीं हैं लेकिन उसे याद है कि कैसे हिबा को उस दिन पेलेट लगा था. रिमोट कंट्रोल कार, मेरे फोन और नोटबुक के लिए लड़ते शहादत और हिबा पेलेट गन से ज़ख्मी हुए ‘चिलड्रेन ऑफ वॉर’ के बच्चे नज़र आ रहे थे.
हिबा से मिलने के बाद मैं एनकाउंटर साइट पर पहुंची. जिस जगह एनकाउंटर हुआ था वह घर पूरी तरह जल चुका था. गैराज में पड़ी मारुति 800 भी पूरी तरह जली पड़ी थी. मेरी नज़र सबसे पहले वहां पड़े एक अधजले जूते पर गई जो शायद किसी आतंकी का रहा होगा.
उस जले हुए घर के अंदर कई नारे लिखे थे. स्थानीय लोग एनकाउंटर साइट के अंदर जाने से मना करते नज़र आए क्योंकि वहां ऐक्टिव आईडी होने की संभावना होती है. जिस घर में यह एनकाउंटर हुआ उसके मालिक की मौत घटना के बाद दिल का दौरा पड़ने से हो गई. स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि ऐसे मामलों में सेना अक्सर घर के लोगों पर ही मिलिटेंट्स को संरक्षण देने के जुर्म में पीएसए लगा देती है.
सरकार का मुआवज़ा या मज़ाक
इस घटना को करीब एक महीना गुज़र चुका है पर हिबा से मिलने अब तक किसी राजनीतिक पार्टी या स्वयंसेवी संस्था से कोई नहीं आया. हिबा की मां ने बताया कि कुछ स्थानीय पत्रकारों के अलावा उनसे मिलने अभी तक कोई नहीं आया.
जम्मू कश्मीर की सरकार की तरफ से हिबा के परिवार को एक लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि यह मुआवज़ा चेक के रूप में नहीं दिया गया बल्कि फिक्स्ड डिपॉज़िट के रूप में दिया गया है जो 30 नवंबर, 2021 में मैच्योर होगा. एक लाख रुपये हिबा के इलाज के लिए न सिर्फ नाकाफी हैं बल्कि उसकी आंखों की रोशनी के बदले असंवेदनशीलता की कहानी भी हैं.
हिबा के गांव में एक अन्य पेलेट गन सर्वाइवर से हमारी मुलाकात हुई. उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि उनकी आंखों की सर्जरी में अब तक 58 लाख रुपये तक का खर्च आ चुका है. पेशे से पत्रकार रह चुके अदनान (बदला हुआ नाम) की भी आंखों में ही पेलेट लगी थी जिसकी वजह से उन्हें अपनी दाईं आंख की रोशनी पूरी तरह गंवानी पड़ी.
अक्सर मुआवजे के रूप में चेक दिया जाता है लेकिन हिबा के परिवार को फिक्स डिपॉजिट दिया गया है. वे पैसे निकाल सकते हैं लेकिन ब्याज़ उन्हें नहीं मिलेगा. हिबा की एक सर्जरी में 15-20 हज़ार रुपये तक का खर्च आता है.
कश्मीर विवाद के जानकार बताते हैं कि वर्तमान में घाटी में सक्रिय आतंकी 1990 के दौरान पैदा हुई पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं. उनकी परवरिश ही उग्रवाद और हिंसा के बीच हुई है. कहीं शहजाद और हिबा को बचपन में लगी चोटें उम्र ढलने के साथ भयावह रूप न ले लें.
जाहिर है हिबा और उसका परिवार एक ऐसी गलती का खामियाज़ा भुगत रहे हैं जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं.
Also Read
-
Public money, govt line: How DD News used pro-Modi govt farmer leaders to push E20
-
Rs 428 crore in, Rs 1 crore out: How Chinese capital and public money vanished into Gurugram’s garbage
-
BJP promises ‘positive content’. Its new social media team’s record tells another story
-
Exclusive: Inside the bulk objections targeting Muslims in Uttarakhand’s SIR
-
South Central 89: India’s food safety crisis and BJP’s political reshuffle