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#राजस्थान चुनाव: चुनावी कोलाहल में गुम अलवर के युवाओं की सामूहिक आत्महत्या
रामभरोसे मीना को उम्मीद थी कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलवर में चुनाव प्रचार के लिए आएंगे तो उनके ऊपर असमय आई विपत्ति के बारे में बात करेंगे. 53 वर्षीय रामभरोसे मीना उस विपत्ति से उबरने की कोशिश कर रहें हैं जो उन पर और जिले के तीन अन्य मीना परिवारों पर 20 नवंबर को आयी. उनके पुत्र मनोज मीना ने अपने तीन अन्य दोस्तों के साथ सामूहिक आत्महत्या कर ली. अलवर जिले के बहारकोकला गांव के निवासी रामभरोसे को अभी भी उस कारण की तलाश है जिसकी वजह से उनके पुत्र ने आत्महत्या की.
घटना के तत्काल बाद ही स्थानीय मीडिया इस सामूहिक आत्महत्या को ले उड़ा. मौत की बात सामने आने के कुछ ही घंटों के भीतर पूरी पटकथा बदल गयी. खबरें चलने लगी कि चारो युवाओं ने बेरोजगारी की वजह से आत्महत्या की. राजस्थान के कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य की बीजेपी सरकार को आड़े हाथों लिया. पायलट ने कहा कि उन्होंने पहली बार यह सुना है कि बेरोजगारी के कारण युवा इतने परेशान हैं कि वे आत्महत्या का फैसला ले रहे हैं. इस मुद्दे पर बीजेपी सुरक्षात्मक रुख अपना रही है. पार्टी इस मामले से इतना डरी हुई है कि मृत युवाओं के परिजनों का दावा है कि भगवा दल का कोई बी नेता उनसे मिलने के लिए नहीं पहुंचा, जबकि राज्य में चुनावी चल रहे हैं.
20 नवंबर को अलवर में पढ़ने वाले छह दोस्त (सभी मीना समुदाय से) एक रेलवे ट्रैक के पास इकठ्ठा हुए. वे सभी ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे थे. उनमें से कुछ ने अपने परिजनों से बात भी की. परिवार और पुलिस के मुताबिक यह शाम 7:30 से 8 बजे के बीच की बात है. इसके बाद अगली सुबह अलवर और देश भर के लिए इनमें से तीन युवाओं की आत्महत्या की ख़बर लेकर आयी. मनोज मीना, ऋतुराज मीना और सत्य नारायण ट्रेन से कुचल कर मारे गए. चौथा दोस्त- अभिषेक मीना गंभीर रूप से घायल हो गया था. अभिषेक पुलिस की एकमात्र आशा थी जिससे यह पता लग जाता कि वास्तव में इस सामूहिक आत्महत्या के लिए किसने प्रेरित किया. लेकिन उसका भी शनिवार को अस्पताल में देहांत हो गया. अब पुलिस के पास बाकी बचे दो युवकों, जो कि घटना के गवाह भी हैं, के बयान हैं. ये हैं राहुल मीना और संतोष मीना.
पुलिस अभी भी इन आत्महत्याओं के पीछे किसी ठोस कारण को तलाश नहीं कर पायी है. लेकिन मीडिया के जरिए आत्महत्या की वजह बेरोजगारी को बताया और स्थापित कर दिया गया है. इसमें बेरोजगारी का कितना योगदान है? क्या विभिन्न आयु और भिन्न आर्थिक पृष्ठभूमि के युवा इस तरह से अपने जीवन को समाप्त करने का रास्ता चुन सकते हैं?
न्यूज़लॉन्ड्री ने मृत युवाओं के परिजनों से बातचीत कर इस घटना की कड़ियां जोड़ने की कोशिश की. बहरकोकला गांव में मनोज मीना के परिवार का कोई भी सदस्य बेरोजगारी के सिद्धांत को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. रामभरोसे कहते हैं, “हमारा परिवार गरीबी में रहा है. मैंने केसीसी से और निजी देनदारों से कर्ज लिया है लेकिन देनदारों ने एक बार भी मेरे बच्चों पर कोई दबाव नहीं डाला.” उन्होंने बताया कि घर की आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उनके दोनों पुत्र- मनोज और संतोष को कभी भी आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ा.
वो आगे कहते हैं, “मैं एक किसान हूं. मेरे पास बहुत सीमित संसाधन हैं. जब मुझे उनकी कोचिंग की फीस जमा करनी होती थी तब मैं दूसरों से पैसे उधार लेता था.” 24 वर्षीय मनोज मीना अपने भाई संतोष के साथ अलवर में रहते थे. उन्होंने 2011 में अलवर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और प्रारंभिक परीक्षाओं के लिए जयपुर चले गए. बाद में वह दो साल के लिए दौसा चले गए, जहां उनका छोटा भाई बीटेक कर रहा था. 2017 में वह फिर से अलवर लौट आया. एसएससी और रेलवे की प्रतियोगी परीक्षाओं में लगभग छह वर्षों तक अपनी किस्मत आजमाने के बावजूद उसे अभी तक कोई सफलता नहीं मिली थी.
रामभरोसे एक सीमांत किसान हैं. उनके ऊपर कुछ लाख रुपए का ऋण है. हालांकि, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके तीनों बच्चे अपनी शिक्षा पूरी करें. मनोज ने स्नातक की उपाधि प्राप्त की, संतोष ने बीटेक पूरा कर लिया था और उनकी बहन ने एमए के बाद बीएड किया था. हालांकि, तीनों भाई-बहन अभी भी नौकरी की तलाश में थे.
रामभरोसे अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मनोज ने आत्महत्या जैसा बड़ा कदम क्यों उठाया. “मैं इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूं कि उसने बेरोजगारी की वजह से आत्महत्या की है.” मनोज के भाई संतोष ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि चूंकि मनोज के पास फ़ोन नहीं था, इसलिए उसका सिमकार्ड सत्यनारायण (उर्फ़ दुती) के फ़ोन में था. वो दोनों एक साथ घूमते-फिरते थे. “मैंने कभी यह महसूस नहीं किया कि वो किसी तनाव या दबाव में था जिसकी वजह वो आत्महत्या के लिए मजबूर हो जायेगा,” संतोष कहते हैं.
यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर बुचपुरी गांव में सत्यनारायण का घर है. उनके सबसे बड़े भाई, नमीचन्द सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में जवान हैं और जब उन्हें यह ख़बर मिली थी तब वे छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित इलाके में चुनावी ड्यूटी पर थे. नमीचन्द पूछते हैं, “मुझे बताइए, मैं बेरोजगारी के कोण पर कैसे भरोसा कर सकता हूं? उसने केवल एक साल पहले ही स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी और ज्यादा से ज्यादा दो या तीन प्रतियोगी परीक्षा में बैठा था. ऐसे किसी को बेरोजगारी महसूस होती है?”
नमीचंद ने तर्क दिया कि 22 वर्षीय युवा छात्र बेरोजगारी का दबाव कैसे महसूस कर सकता है. नमीचन्द एसएसबी में शामिल होने से पहले के दिन याद करते हैं. उन्होंने कहा कि जब वह एसएसबी में शामिल होने से पहले पत्थरों को तोड़ने और बेचने का काम करते थे, तभी उन्होंने सुनिश्चित किया था कि उनके दोनों भाई सुरेंद्र और सत्यनारायण को अलवर में अध्ययन करने के लिए सभी संसाधन मिलें.
12वीं की परीक्षा पास करने के ठीक बाद, सत्यनाराण तीन से चार साल पहले अलवर शहर चला गया था और तब से प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. दोनों भाई शहर में एक फ्लैट लेकर रहते थे. नमीचन्द की बेटी जो कि सातवीं कक्षा में पढ़ती है, वह भी साथ ही रहती थी.
दुती की मौत के बारे में सुरेन्द्र ने चुप्पी रखना ही उचित समझा. जब उनसे पूछा गया कि सत्यनारायण किसी भी प्रकार के तनाव में था तो सुरेंद्र ने जवाब दिया, “हमारा रिश्ता दोस्ती का था. अगर वो तनाव में होता तो मुझसे इस बारे में चर्चा जरूर करता.” सुरेंद्र विवाहित है और उसके दो बच्चे भी हैं. वह भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है, लेकिन उसे अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है.
कुछ साल पहले तक सुरेंद्र का परिवार कच्चे घर में रहता था. हालांकि, सबसे बड़े भाई को नौकरी मिलने के बाद और कृषि से होने वाली आय को जोड़कर उन्होंने पक्का घर बनवा लिया. अब उनके पास पांच कमरे का पक्का घर है.
राहुल ने दावा किया था कि मृतकों ने फोन पर अपने परिवार के सदस्यों से बात की थी. सत्यनारायण की बहन ने इसकी पुष्टि की, “उस शाम को वह मां से बात करना चाहता था. वह उस समय खेत गई हुई थी और अंधेरा हो चुका था इसलिए मैंने उसे सुबह फ़ोन करने के लिए कहा.” उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वह उनके भाई दुती का आखिरी फ़ोन होगा. सुरेंद्र को एक परिचित व्यक्ति के माध्यम से बहुत रात को दुती की मौत की जानकारी मिली थी.
तीसरा नाम ऋतुराज था, उसकी मौत मौके पर हो गयी. 17 वर्षीय ऋतुराज, पुलिस हेड कांस्टेबल का पुत्र था. वह कुछ महीने पहले ही अलवर शहर आया था. 11वीं का यह छात्र अच्छे कपड़े और मोबाइल का शौक़ीन था. उनके 51 वर्षीय पिता बाबूलाल मीना ने बताया, “मेरा बड़ा बेटा मानसिक रूप से ठीक नहीं था. इसलिए, मैं जो कुछ भी कमाता था, वह ऋतुराज के लिए था. हमने उसे कुछ भी खरीदने से नहीं रोका. उसे कभी पैसे की या किसी और चीज़ की कमी का सामना नहीं करना पड़ा.” उसकी बहन कांताबाई मीना ने बताया कि करीब छह महीने पहले उन्होंने उसे 70,000 रुपये का एक मोबाइल फोन खरीद कर दिया था. उसने दो महीने पहले ही एक और फोन खरीदा था.
ऋतुराज अलवर शहर के शांतिकुंज इलाके में अकेले रहता था. सभी चार मृतकों में से उसकी आर्थिक स्थिति सबसे मजबूत लगती है. बेरोजगारी के कोण को खारिज करते हुए, बाबूलाल कहते हैं, “आप खुद सोचिए, क्या 17 वर्षीय कोई भी युवक कोई सरकारी नौकरी कर सकता है?” बाबूलाल आगे बताते हैं, “हमने उसे पहले अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा था. वह किसी भी क्षेत्र में अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र था.” एक पुलिसकर्मी होने के बावजूद, बाबूलाल अभी तक जांच में शामिल नहीं है.
“मुझे शांति चाहिए,” बाबूलाल ने कहा, “मुझे ये बात परेशान करती है कि घटना के इतने दिनों बाद भी हम नहीं जानते कि उसने आत्महत्या क्यों की.”
शनिवार को अभिषेक की भी मृत्यु हो जाने से पुलिस की जांच बुरी तरह प्रभावित हुई है. राहुल और संतोष ने पुलिस को अपना बयान दिया है. राहुल ने दावा किया कि संतोष समेत सभी छह आत्महत्या करने के लिए तैयार थे लेकिन संतोष बाद में पीछे हट गया, उसने उसका विरोध किया. संतोष इस बात पर टिका रहा कि वह आत्महत्या के इस निर्णय का हिस्सा नहीं था जो कि बाकी चारों ने लिया.
एसएचओ और इस मामले के जांच अधिकारी, हरि सिंह ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि राहुल के मुताबिक चारों युवक बेरोजगारी के चलते परेशान थे और वे यह बात भी कर रहे थे कि वे ना तो प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर पा रहे हैं और ना ही वे खेती करने की स्थिति में हैं, इसलिए उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है.
“चारों मृतकों की आर्थिक पृष्ठभूमि और उम्र को ध्यान में रखते हुए यह तर्क समझ में नहीं आता है. लेकिन हम सभी संभावित कोणों पर जांच कर रहे हैं.” सिंह ने कहा. उन्होंने आगे बताया कि चारो की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी सामान्य है. “पहले दोनों मृतकों का शरीर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त था. हमें तीसरे मृतक के शरीर में कोई पदार्थ या अल्कोहल नहीं मिला.”
इस राजस्थान चुनाव में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. इन युवकों ने किस वजह से आत्महत्या की उसका कारण कुछ भी हो इसके बावजूद आने वाले दिनों में, खासकर छोटी चुनावी सभाओं और बैठकों में, इस मुद्दे पर गहन राजनीति होगी.
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