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मीडिया संस्थान रिपोर्टिंग फेलोशिप बांट रहे हैं, इसमें फायदा किसका है?
जून महीने में ‘कारवां मैगजीन’ ने एक साल के लिए पांच फ़ेलोशिप देने का ऐलान किया था. इसमें राजनीतिक और सरकार के विभिन्न विभागों में रिपोर्टिंग संबंधित फ़ेलोशिप भी शामिल थी. हाल ही में दो न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ और ‘स्क्रोल’ ने भी इसी तर्ज पर फ़ेलोशिप की घोषणा की है. भारतीय मीडिया संस्थान में काम करने के लिए फेलो रखे जा रहे हैं, यह एक नए चलन का इशारा कर रहा है. इस फैसले के पीछे क्या कारण हैं, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. आखिर क्यों इन लोगों को स्थाई कर्मचारी के तौर पर नहीं रखा जा रहा. फेलोशिप मॉडल नियोक्ता और मीडिया संस्थानों में काम कर रहे लोगों के लिए कैसे काम करता है. क्या इससे भारतीय मीडिया में पहले से ही बेहद कमजोर जॉब सुरक्षा की स्थितियां और बदतर नहीं होंगी?
प्रिंट मीडिया मजीठिया वेज बोर्ड के तहत आता है. वहां मजीठिया आयोग की सभी सिफारिशें लागू होती हैं. हालांकि बड़े–बड़े मीडिया घरानों ने इसका पालन न करने के रास्ते अख्तियार कर लिए हैं. कुछ तो इस मामले में अदालत में जा चुके हैं.
प्रिंट मीडिया के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब पोर्टल्स मजीठिया बोर्ड या इस तरह के किसी वेज बोर्ड के दायरे में नहीं आते. कॉन्ट्रैक्ट आधारित रोजगार टीवी और डिजिटल मीडिया के लिए समान्य सी बात है. जिसका सीधा असर यहां काम करने वाले कर्मचारियों के ऊपर पड़ता है. इनके ऊपर असुरक्षा की तलवार हमेशा लटकी रहती है. 2013 में टीवी-18 में एक साथ करीब 350 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया था.
लेबर क़ानूनों और नौकरी सुरक्षा के मामले में कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी और मजीठिया बोर्ड के तहत काम करने वाले कर्मचारियों के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है. नए मीडिया संस्थानों द्वारा ‘फेलोशिप मॉडल’ की नई प्रवृत्ति मीडिया उद्योग में रोजगार की स्थितियों को और कमजोर करने वाला कदम साबित हो सकती है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने द कारवां, द वायर और स्क्रोल, इन तीनों संस्थानों से बातचीत की. इन तीनों संस्थानों ने हाल ही में फेलोशिप की घोषणा की है जिसमें एक महीने से लेकर एक साल की अलग–अलग तरह की फेलोशिप शामिल है.
द वायर ने अपने ग्रिट सेक्शन के लिए 5 से 6 फेलोशिप की घोषणा की है. इसमें कहा गया है कि इसका लक्ष्य देशभर में मैला ढोने की प्रथा और स्वच्छता सं संबंधित कवरेज को बढ़ाना है. संस्थान उन्हें 20,000 रुपए देगा. फेलो से अपेक्षा रहेगी कि वो संबंधित विषय पर दो से तीन हफ्ते के भीतर एक बड़ी, समग्र स्टोरी करके देगा. यह पूछने पर कि क्या इन फेलो को किसी और तरह की सुविधाएं भी वायर मुहैया ककरवाएगा. द वायर की जान्हवी सेना ने बताया, “यह शॉर्ट टर्म फेलोशिप है जो सिर्फ एक स्टोरी के लिए है. 20,000 मं उसके खाने–पीने, यात्रा आदि सभी चीजें जुड़ी हुई हैं. इस दौरान उन्हें वायर की संपादकीय टीम से जरूरी दिसानिर्देश प्राप्त होंगे.”
दिलचस्प बात यह है की द वायर के विपरीत स्क्रोल ने तीन से छह महीने की रिपोर्टिंग फैलोशिप की घोषणा की है. यह एंट्री लेवल के पत्रकारों के लिए है जिसमें 0 से 2 साल के अनुभव की आवश्यकता है. दोनों वेब पोर्टल्स अपने फेलोज़ से चाहते हैं की वे एक आम रिपोर्टर की सभी ज़िम्मेदारियां निभाएं. यहां एक प्रश्न लाज़मी हो जाता है की इन लोगों को रिपोर्टर या ट्रेनी रिपोर्टर के तौर पर भर्ती क्यों नहीं किया जाता.
स्क्रोल के एसोसिएट एडिटर रोहन वेंकेट ने कहा, “फेलोशिप शुरू करने का उद्देश्य नए पत्रकारों को फील्ड में बीट रिपोर्टिंग का अनुभव देने के लिए था, जहां अमूमन अनुभवी और पुराने पत्रकारों को ही मौका मिलता है. ताकि फैलोज़ को फील्ड रिपोर्टिंग के साथ और उस क्षेत्र का अधिक से अधिक अनुभव मिल सकें. स्क्रोल की पहली दो फेलोशिप तमिलनाडु और कश्मीर में राज्यस्तरीय संवादाता के लिए था. मौजूदा फेलोशिप राजनीति, तकनीक और आधार जैसे विषयों पर केन्द्रित है.” वेंकट आगे कहते हैं, “फेलोज़ को उतना ही मासिक भत्ता दिया जाता है जितना एंट्री लेवेल पर पत्रकारों को दिया जाता है.”
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे इन फेलोज़ को कोई और तरह का लाभ देते हैं, लेकिन भत्ते का आंकड़ा देखकर ऐसा लगता नहीं है. नियोक्ता को कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए कर्मचारियों की भविष्य निधि में योगदान देना अनिवार्य है. चूंकि फेलोज़ को कर्मचारी के तौर भर्ती नहीं किया जाता इसलिए ऐसे मामलो में नियोक्ता भविष्य निधि मे योगदान न करने के लिए स्वतंत्र है. अगर यह चलन लोकप्रिय होता है तो न्यूज़रूम में नए, रंगरूट रिपोर्टरों की एंट्री ही रुक सकती है. अगर दूसरे संस्थान भी अपने यहां फेलोशिप देने लग जाएं तो हो सकता है फ्रेशर्स को इंटर्नशिप के बाद नाममात्र के भुगतान पर फेलोशिप ऑफर की जाने लगे.
नौकरी सुरक्षा और स्थाई रोज़गार का प्रश्न भी जस का तस बना हुआ है. स्क्रॉल ने हालांकि इस बात की गारंटी नहीं दी लेकिन उसने कहा कि फेलोशिप समाप्त होने के बाद कुछ लोगों को फुल टाइम स्थाई नौकरी का ऑफर दिया जा सकता है. स्क्रोल के पहले दो फेलोज़ को 2016 में स्थाई नौकरी का प्रस्ताव दिया गया था.
अंत में द कारवां की बात आती है, जो कि दिल्ली प्रेस समूह का हिस्सा है. इसने सबसे ज्यादा फेलोशिप की घोषणा की है. कारवां में काम करने वाले एक सूत्र के मुताबिक, “फेलोशिप की घोषणा से न्यूज़रूम में उत्साह का माहौल है, क्योंकि इससे उनकी टीम का विस्तार होगा. साथ ही काम का दबाव भी कम होगा और लोग अपनी रिपोर्टिंग पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे.”
संक्षेप में अगर कहें तो नए कर्मचारियों ने पुरानी टीम के ऊपर से दबाव कम कर दिया है और अब वो अधिक से अधिक मुद्दों को कवर करने में सक्षम हैं. वेतन के बारे सवाल करने पर सूत्र ने तपाक से जवाब दिया, “वेतन को लेकर कारवां कुख्यात है. ये अपने कर्मचारियों को हमेशा बाजार के मानकों से बेहद कम भुगतान करते हैं.”
कारवां के संपादक विनोद के जोस ने बताया कि उनकी पत्रिका को बंगलुरु स्थित एक गैर–लाभकारी संगठन, इंडिपेंडेंट पब्लिक स्पिरिटेड मीडिया फाउंडेशन (आईपीएसएमएफ) से एक साल के लिए फंड मिला है. इसी के बाद उन्होंने फेलोशिप की शुरुआत की है, ताकि ज्यादा से ज्यादा मामलों पर रिपोर्टिंग की जा सके.
विनोद ने बताया कि इस साल के लिए उनके पास फंड है. अगले साल के लिए फण्ड का इंतजाम करने की कोशिश तो हम कर ही रहे हैं लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है. वर्तमान में नौ फेलोज़ मैगज़ीन के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें उत्तर और दक्षिण भारत में रिपोर्टिंग फेलोशिप और दिल्ली में सरकार की रिपोर्टिंग शामिल है.
कारवां ने यह भी कहा कि पत्रिका में अन्य पत्रकारों और फैलोज़ की भूमिकाओं या जिम्मेदारियों में कोई अंतर नहीं है. किसी अन्य दिल्ली प्रेस कर्मचारी को दिए जा रहे सभी लाभ भी इन फेलोज़ को दिए जाते हैं.
कारवां के मामलें में यह बात स्पष्ट है कि फेलो केवल एक वर्ष की अवधि के लिए ही काम कर रहें है और उनसे कारवां को अन्य पत्रकारों के समान ही काम करने की अपेक्षा की गई है.
यह स्थिति कारवां को और उसके कर्मचारियों को सक्षम बनाता है कि वो अपना विस्तार कर सकें, लेकिन एक वर्ष बाद इन को अनिश्चितता का शिकार होना पड़ सकता है. हमने यह सवाल कारवां के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल किया कि वे फुल टाइम पत्रकारों के बजाय फेलो क्यों रख रहे हैं, तो उन्होंने बताया, “हमारे पास केवल एक साल की पूंजी है. इसलिए एक साल की ही फेलोशिप कराई जा रही है. पता नहीं हम इसे अगले साल जारी रख भी पाएंगे या नही.”
बाल ने बताया कि संस्थान को अपनी स्थिति का अंदाजा है हालांकि उनकी पत्रिका आगे भी उन्हें फेलो के तौर पर बनाए रखना चाहती है. हम और फंड के जुगाड़ में हैं.
तो यह फेलोशिप का तरीका नए मीडिया संस्थानों और द कारवां जैसे साधनविहीन संस्थानों को सक्षम बना सकती है, उन्हें विभिन्न विषयों पर रिपोर्टिंग करने का अवसर देती है. लेकिन अगर यह प्रवृत्ति बड़े मीडिया संस्थानों तक पहुंच जाती है तो पत्रकारों के अधिकारों के लिए यह चिंता का सबब बन सकती है. फेलोशिप कराने वाले समाचार पोर्टलों में से एक में कामम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ने बताया, “इस चलन से कर्मचारियों के अधिकारों में कटौती हो सकती है और साथ ही इसे नियोक्ता हाथोंहाथ ले सकते हैं.”
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “एक संवाददाता के नजरिए से यह चलन बहुत खराब है. कह सकते है ये स्थिति भयावह है. यदि यह बड़े बड़े मीडिया संस्थानों में शुरू हो जाएगा, तो आगे यही एक आदर्श मॉडल बन सकता है, जहां नियोक्ताओं की नाममात्र की ज़िम्मेदारी होगी. ऐसे में मीडिया में जॉब सुरक्षा की स्तिथियां कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी से भी बदतर हो जाएगी.”
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