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क्या सरकार नेशनल हेरल्ड के खिलाफ बदले की कार्रवाई कर रही है?
पी–गुरूज़ वेबसाइट की एक ख़बर के मुताबिक शहरी विकास मंत्रालय ने नोटिस जारी कर एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) को 15 नवंबर तक नेशनल हेरल्ड बिल्डिंग खाली करने का आदेश दिया है. एजेएल नेशनल हेरल्ड वेबसाइट और साप्ताहिक अख़बार का प्रकाशन करती है. पहले यह नेशनल हेरल्ड, नवजीवन और कौमी दुनिया नामक डेली अख़बारों का प्रकाशन करती थी.
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 2011 में पटियाला हाउस कोर्ट में याचिका दायर कर गांधी परिवार के ऊपर नेशनल हेरल्ड की संपत्तियों को अवैध तरीके से हड़पने का आरोप लगाया था. 2016 में स्वामी ने ही शहरी विकास मंत्रालय में यह याचिका दायर कर मांग की थी कि एजेएल नेशनल हेरल्ड बिल्डिंग का दुरुपयोग कर रहा है, वहां से कोई अखबार नहीं निकलता, कोई प्रिंटिंग गतिविधि नहीं होती, लिहाजा उसकी लीज रद्द की जाय और भवन को सरकार के कब्जे में लिया जाय.
शहरी विकास मंत्रालय का नोटिस कहता है कि हेरल्ड हाउस में कोई मीडिया संबंधित गतिविधि नहीं होती. लेकिन एक सच यह है कि साल 2015 के बाद से यहां से नेशनल हेरल्ड वेबसाइट का संचालन हो रहा है.
एजेएल की तरफ से मामले को दिल्ली हाईकोर्ट में लेकर पहुंचे वकील सुनील फर्नांडिज़ कहते हैं, “आवंटित बेंच के पास मामले की फाइल नहीं पहुंची थी, इसलिए उसने मामले की सुनवाई 15 नवंबर तक के लिए टाल दी है. अगर हमें अपने पक्ष में फैसला नहीं मिलता है तो भी सरकार को पब्लिक प्रिमाइस एविक्शन एक्ट के तहत कार्रवाई से पहले हमें सूचित करना होगा. इसमें कुछ हफ्ते का वक्त लगेगा. ऐसा नहीं है कि 15 नवंबर को वो बिल्डिंग में घुस जाएंगे.”
बहरहाल इस नोटिस को समझने से पहले इस पूरे विवाद को समझना जरूरी है.
नेशनल हेरल्ड विवाद
सुब्रमण्यम स्वामी ने एक याचिका दायर करके इस मामले को उठाया था. कोर्ट में दाखिल दस्तावेजों के मुताबिक नेशनल हेरल्ड की सारी संपत्तियां यंग इंडियन नाम की कंपनी के स्वामित्व में हैं. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी के दस्तावेज बताते हैं कि यह कंपनी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी की निजी कंपनी है.
एक अनुमान के मुताबिक देश भर में हेरल्ड की लगभग 2500 करोड़ की संपत्ति है. इसमें नई दिल्ली स्थित बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थिति हेरल्ड हाउस प्रमुख है. स्वामी का लगातार दावा रहा है कि इसी संपत्ति के लिए गांधी परिवार ने एजेएल के स्वामित्व में हेरफेर करके इसका टेकओवर किया.
दिल्ली के महत्वपूर्ण इलाके आईटीओ पर स्थित हेरल्ड हाउस से मोटा किराया मिलता है. विदेश मंत्रालय इस भवन के दो तलों पर पासपोर्ट कार्यालय संचालित करता है. 2015 में विदेश मंत्रालय इसके लिए 60 लाख रुपया प्रतिमाह किराया देता था. इसके दो तल टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ ने ले रखे हैं. इसका किराया 2015 में 27 लाख रुपए महीना था. यानी दस करोड़ रुपए से अधिक सालाना आमदनी नेशनल हेरल्ड की बिल्डिंग से होती है. इसके अलावा हेरल्ड की लखनऊ, भोपाल, जबलपुर में भी संपत्तियां हैं.
अपनी याचिका में स्वामी ने आरोप लगाया है कि एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (नेशनल हेरल्ड की मूल स्वामित्व वाली कंपनी) से धांधली करके यंग इंडियन को इसका स्वामित्व ट्रांसफर कर दिया गया. इस कथित धांधली में सिर्फ सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही नहीं बल्कि उनके साथ पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी शामिल हैं.
नेशनल हेरल्ड का जन्म
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के आंदोलन के दौरान भारतीय पक्ष को दुनिया के सामने तार्किक और सशक्त तरीके से रखने के लिए एक भारतीय स्वामित्व वाले अखबार की कल्पना की थी. इसी का परिणाम था नेशनल हेरल्ड अखबार. इसके संचालन की जिम्मेदारी एक ट्रस्ट के कंधे पर थी. इस ट्रस्ट में आजादी के आंदोलन से जुड़े लगभग पांच हजार भारतीय शामिल थे.
ये पांच हजार लोग नेशनल हेरल्ड को संचालित करने वाली संस्था एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के शेयरधारक थे. कभी ट्रस्ट की संपत्ति रहा नेशनल हेरल्ड और उसकी संपत्तियां आज तकनीकी तौर पर यंग इंडियन नामक कंपनी के हाथ में हैं. स्वामित्व में बदलाव की प्रक्रिया 2011 में शुरू हुई थी, तब केंद्र में यूपीए की सरकार थी और गांधी परिवार सत्ता के शीर्ष पर था.
9 सितंबर, 1938 को एजेएल की स्थापना हुई. यह कंपनी नेशनल हेरल्ड अखबार का प्रकाशन करती थी. बाद में यह नवजीवन और क़ौमी आवाज का भी प्रकाशन करने लगी. उस वक्त कंपनी की कैपिटल वैल्यू पांच लाख रुपए थी. करीब पांच हजार शेयरधारकों ने इसमें निवेश किया था.
सुब्रमण्यम स्वामी के मुताबिक यंग इंडियन का मूल लक्ष्य किसी अखबार या प्रिंटिंग प्रेस को स्थापित करना नहीं है, जबकि एजेएल का प्रारंभिक मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन कहता है– “इसका उद्देश्य संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) समेत देश के दूसरे हिस्सों में समाचार एजेंसी, अखबार और पत्रिका के प्रकाशन, प्रिंटिंग प्रेस और इससे संबंधित समस्त दूसरे व्यवसायों को स्थापित करना और कंपनी के हित में उन्हें संचालित करना है.”
सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका इस पर सवाल खड़ा करती है. याचिका कहती है– “यंग इंडियन नाम की कंपनी ने नेशनल हेरल्ड का अधिग्रहण किया है, उसकी भविष्य की योजनाओं में किसी अखबार, पत्रिका या प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना नहीं है.”
कंपनी के मेमोरेंडम पर जवाहरलाल नेहरू के अलावा पुरुषोत्तमदास टंडन, नरेंद्र देव, कैलाश नाथ काटजू, रफी अहमद किदवई, कृष्ण दत्त पालीवाल और गोविंद बल्लभ पंत जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं. यह किसी व्यक्ति विशेष की कंपनी नहीं थी, न ही इसका उद्देश्य समाचारों के अलावा किसी और व्यवसाय से जुड़ना था.
साल 2008 तक आते–आते नेशनल हेरल्ड गंभीर आर्थिक संकट में फंस चुका था. लिहाजा एजेएल ने इसका प्रकाशन बंद करने की घोषणा कर दी. 2008 से 2011 के बीच एजेएल के स्वामित्व को लेकर कुछ ऐसे काम हुए जिसने कांग्रेस पार्टी और उसके प्रथम परिवार पर सवाल खड़ा कर दिया.
स्वामित्व में हेरफेर
2011 में यंग इंडियन नाम की एक कंपनी का गठन हुआ. इस कंपनी की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास थी. तकनीकी तौर पर किसी कंपनी मे 74 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी जिस व्यक्ति की होती है वही सैद्धांतिक तौर पर कंपनी का मालिक होता है. बाकी 24 फीसदी शेयर कंपनी के चार अन्य हिस्सेदारों– सुमन दुबे, सैम पित्रोदा, मोतीलाल बोरा और ऑस्कर फर्नांडिज– के बीच बंटे थे.
यंग इंडियान का गठन कंपनी एक्ट–1956 के सेक्शन 25 के तहत हुआ है. ऐसी कंपनी अलाभकारी संस्था होती है यानी यह कंपनी किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकती. साथ ही वह तमाम स्रोतों से होने वाली आय का इस्तेमाल सिर्फ कंपनी के मूल उद्देश्यों के प्रचार–प्रसार में कर सकती है, किसी अन्य व्यवसाय में नहीं.
2011 में एजेएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक में एक प्रस्ताव पारित हुआ जो कुछ इस तरह से था– “एजेएल ने कांग्रेस पार्टी से 90.21 करोड़ रुपए का ब्याजमुक्त कर्ज लिया था. इस लेनदारी को कांग्रेस पार्टी ने यंग इंडियन नाम की कंपनी को स्थानांतरित कर दिया है, इसलिए अब एजेएल यह उधारी कांग्रेस पार्टी को न देकर यंग इंडियन को देगी. एजेएल ने इस लोन को खत्म करने के लिए यंग इंडियन को अपनी 10 रुपए कीमत वाले 9.02 करोड़ शेयर सौंप दिए. इस प्रकार एजेएल का पूरा मालिकाना हक यंग इंडियन के हाथ में चला गया.”
कांग्रेस पार्टी ने एक और खेल किया. एजेएल पर कांग्रेस की जो 90.21 करोड़ रुपए की उधारी थी जिसे उसने यंग इंडियन को सौंप दिया था, उसका निपटारा यंग इंडियन ने कांग्रेस पार्टी को 50 लाख रुपए देकर कर कर दिया. इस पूरे लेनदेन का विवरण 26 फरवरी, 2011 को एजेएल द्वारा पास किए गए प्रस्ताव में मौजूद है. इस पर एजेएल के तत्कालीन चेयरमैन मोतीलाल बोरा के हस्ताक्षर हैं.
कांग्रेस के पूर्व कोषाध्यक्ष मोतीलाल बोरा की भूमिका इस पूरे विवाद में बेहद दिलचस्प रही. बोरा यंग इंडियन के निदेशकों में से एक थे, साथ ही वे एजेएल के तत्कालीन चेयरमैन और कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष भी थे. यानी विवाद के घेरे में आई तीनों संस्थाओं से मोतीलाल बोरा जुड़े हुए थे.
एजेएल से यंग इंडियन के बीच हुए लेनदेन को बारीकी से समझें तो हितों का दिलचस्प टकराव नजर आता है. यंग इंडियन के निदेशक मोती लाल बोरा ने एजेएल के चेयरमैन मोतीलाल वोरा के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वे कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतालाल वोरा से कहकर 90,21,68,980 रुपए के ब्याजरहित लोन की लेनदारी यंग इंडियन को दिलवा देंगे. इस सहमति के बाद उन्हीं मोतीलाल वोरा ने 26 फरवरी, 2011 को एजेएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की एक असाधारण बैठक में एक प्रस्ताव पास करके एजेएल के सारे शेयर यंग इंडियन प्रा.लिमिटेड को दे दिए.
इन तीन संस्थाओं में से कांग्रेस पार्टी और यंग इंडियन ऐसी हैं जहां मोतीलाल बोरा सीधे सोनिया गांधी, राहुल गांधी के मातहत काम करते हैं और इन्हीं दोनों लोगों को इस लेन देन में सबसे ज्यादा लाभ होता दिखा.
स्वामी की याचिका कहती है एक राजनीतिक दल चंदे के रूप में जो पैसा लेता है वह अपने कोष का इस्तेमाल किसी व्यावसायिक गतिविधि में नहीं कर सकता क्योंकि इस चंदे पर कोई टैक्स नहीं दिया जाता है. आयकर अधिनियम के सेक्शन 13ए और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के सेक्शन 29ए और सी में इसका विस्तार से विवरण है.
कांग्रेस पार्टी ने एक निजी संस्था (एजेएल) को 90,21,68,980 रुपए का ब्याजमुक्त कर्ज क्यों दिया, कैसे उसने यह लेनदारी एक अन्य निजी कंपनी (यंग इंडियन) को ट्रांसफर कर दी, और कैसे कांग्रेस ने यंग इंडियन से मिलीभगत करके 90 करोड़ का निपटारा सिर्फ 50 लाख रुपए में कर लिया.
ये सब सवाल अब एक जटिल मुकाम पर पहुंच गए हैं. अगर सरकार नेशनल हेरल्ड बिल्डिंग पर कब्जा करती है तो इस मामले में कोर्ट से कोई निर्णय आने से पहले ही यह एक राजनीतिक अखाड़ा बन जाएगा.
नेशनल हेरल्ड के संपादकीय विभाग से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य के मुताबिक इस नोटिस या हाईकोर्ट के संभावित फैसले का संपादकीय गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उपरोक्त सदस्य ने शहरी विकास मंत्रालय के इस दावे का खंडन किया कि हेरल्ड हाउस में किसी तरह की मीडिया या प्रिंटिंग गतिविधि नहीं चल रही है. उन्होंने बताया, “बेसमेंट में प्रिंटिंग प्रेस चल रहा है. पहले एक मशीन खराब थी जिसे हमने हाल ही में बदलवाया है. फिलहाल यहां से नेशनल हेरल्ड (संडे) और नवजीवन का साप्ताहिक संस्करण प्रकाशित होता है.”
(गौरव सरकार के सहयोग के साथ)
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