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किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है कंजर-भाट समाज में प्रचलित कौमार्य परीक्षा
शादी के जश्न का माहौल है, सभी लोग उत्साहित नज़र आ रहे हैं. शादी का कार्यक्रम खत्म होने के बाद कुछ लोग दूल्हा दुल्हन के कमरे के बाहर बैठकर शराब पी रहे हैं, थोड़ी देर बाद यह लोग आवाज़ लगा कर दूल्हे से पूछते हैं- ‘माल असली है या नकली’. ये लोग दूल्हा-दुल्हन के कमरे के बाहर ही जमे रहते हैं. अगली सुबह पंचायत बैठती है, तब दूल्हा-दुल्हन को खून से सना सफ़ेद कपड़ा पंचायत के सदस्यों को दिखाना पड़ता है. अगर सफ़ेद कपड़े में खून लगा होगा तो शादी को जायज़ माना जाएगा वरना नहीं. क्योंकि अगर चादर पर खून नहीं होगा तो उसका अर्थ यह माना जाता है कि लड़की कुंवारी नहीं है और शादी के पहले उसके किसी से संबंध थे. सोचने में बेहद अजीब और वीभत्स इस परंपरा को कौमार्य परीक्षा कहते हैं जो कि आज भी कंजर-भाट समाज में प्रचलित है और जो भी इस क्रूर परंपरा के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करता है उसका समाज से बहिष्कार कर दिया जाता है.
परीक्षण की प्रक्रिया
असल में ये परंपरा सदियों से कंजर-भाट समुदाय में चली आ रही है. यह समुदाय प्रमुखता से राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और हरियाणा में रहता है. इन्हें सांसी और कंजर के नाम से भी जाना जाता है. इनकी अनुमानित आबादी 15 से 20 लाख तक है जिसका सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान और मध्य प्रदेश में रहता है.
इसमें शादी की औपचारिकताओं के बाद दुल्हन को एक कमरे में ले जाया जाता है जहां एक उम्रदराज़ महिला रिश्तेदार उसकी जांच करती है. इस जांच के दौरान दुल्हन को पूरी तरह से निर्वस्त्र किया जाता और छानबीन की जाती है कि कहीं उसने कोई नुकीली चीज़ अपने पास छुपा तो नहीं रखी है, यहां तक कि उसकी चूड़िया तक उतरवा ली जाती है.
समान रूप से दूल्हे की भी किसी पुरुष द्वारा जांच की जाती है जिसके बाद दूल्हे को दुल्हन के कमरे में भेजा जाता है और दोनों को एक सफ़ेद चादर दी जाती, उन्हें निर्देश दिए जाते हैं कि वे उसी चादर को बिस्तर पर बिछा कर सोएं. इसके बाद कंजर-भाट समाज की जात पंचायत के निर्देश पर दूल्हा-दुल्हन के रिश्तेदार या कई बार पंचायत के सदस्य उस कमरे के बाहर बैठ जाते हैं और दूल्हे से आवाज़ लगा कर पूछते है कि लड़की कुंवारी है कि नहीं.
अगले दिन सुबह पंचायत बैठती है जिसमें दूल्हा-दुल्हन के अलावा उनके रिश्तेदार भी मौजूद रहते हैं. पंचायत के सदस्यों को सफ़ेद चादर दिखाई जाती है, अगर उसमें खून लगा हो तो शादी वैध मानी जाती है वरना नहीं. चादर पर खून के दाग ना होने की स्थिति में लड़की को चरित्रहीन करार दिया जाता है ऐसी सूरत में अगर दूल्हा लड़की को अपने साथ ना ले जाना चाहता हो तो उसे शादी का आधा खर्च लौटना होता है और यदि वह लड़की को अपने साथ ले जाना चाहे तो लड़की को पंचायत की तरफ से समझाइश दी जाती है कि वह चरित्रहीनता से बाज़ आए.
इस कौमार्य परीक्षा के खिलाफ पहली आवाज़ उठाने वाली युवती हैं ऐश्वर्या भाट. ऐश्वर्या पुणे स्थित पिम्परी के भाट नगर इलाके में रहती हैं. इनकी कंजर-भाट समुदाय के इतिहास में पहली शादी है जो बिना कौमार्य परीक्षा के हुई, हालांकि उनको अपने इस कदम के लिए भरपूर विरोध झेलना पड़ा लेकिन वह अपने फैसले पर बनी रहीं. ऐश्वर्या के पति विवेक तमाईचेकर ने भी मुखर रूप से कौमार्य परीक्षा का विरोध किया था और स्टॉप द वी (वर्जिनिटी) रिचुअल नाम का एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया था. इस ग्रुप में कंजर-भाट समुदाय के तक़रीब 80 युवक-युवतियां शामिल थे जो कौमार्य परीक्षा के विरोध में थे.
ऐश्वर्या को हाल ही में 15 अक्टूबर को एक गरबा कार्यक्रम के दौरान बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. इस बहिष्कार को लेकर उन्होंने स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज कराई थी.
न्यूज़लांड्री से बात करते हुए ऐश्वर्या कहती हैं, “नवरात्रि के दौरान में हमारे ही समुदाय द्वारा आयोजित एक गरबा समारोह में गरबा खेलने गयी थी. जब मैं वहां पहुंची और गरबा खेलने लगी तो आयोजकों ने संगीत बंद कर दिया. थोड़ी देर में मेरी मां मेरे पास आयीं और मुझे वहां से चलने के लिए बोलने लगीं. उन्होंने बताया की आयोजकों का कहना है कि जब तक मैं वहां से नहीं जाऊंगी तब तक गरबा शुरू नहीं करेंगे. मेरी मां मुझ पर नाराज़ हो रहीं थी लेकिन मैंने भी ठान ली थी कि मैं वहां से नहीं जाउंगी, जब मैं वहां से नहीं गयी तो आयोजकों ने ऐलान किया कि वह संगीत शुरू कर रहे हैं लेकिन सिर्फ लड़के नाचेंगे. वहां थोड़ी देर रुकने के बाद इस बहिष्कार के विरोध में शिकायत दर्ज करने के लिए मैं पुलिस स्टेशन की ओर निकली और जैसे ही मैं वहां से निकली उन्होंने फिर से गरबा शुरू कर दिया.”
गौरतलब है की ऐश्वर्या की शिकायत पर पुणे के पिम्परी पुलिस थाने में सामाजिक बहिष्कार अधिनियम 2016 के अंतर्गत आठ लोगों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गयी थी.
ऐश्वर्या बताती हैं कि उन्होंने और उनके पति विवेक ने उनकी सगाई के समय ही यह निर्णय कर लिया था कि वह कौमार्य परीक्षा की परंपरा को नहीं स्वीकार करेंगे. वह कहती हैं, “हमारी शादी मई 2018 में हुई, सगाई हुई थी, जून 2016 में. जब हमारी सगाई हो रही थी तभी हम दोनों ने निर्णय लिया कि हम कौमार्य परीक्षण की कुप्रथा को नहीं स्वीकारेंगे. लेकिन कौमार्य परीक्षा के खिलाफ लिए हमारे निर्णय को तब हमने अपने परिवार वालों को नहीं बताया था क्योंकि हमें पता था कि वह हमारे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे. हमारे निर्णय के बारे में उनको हमने शादी से छह महीने पहले बताया, जब हमारी शादी की तारीख तय हुई थी.”
गौरतलब है कि, ऐश्वर्या और विवेक ने जब अपने परिवार के सदस्यों को अपने इस निर्णय के बारे में बताया तो उनका जबर्दस्त विरोध हुआ. विवेक ने तो अपने परिवार के लोगों के साथ तर्क-वितर्क करके मना लिया, लेकिन ऐश्वर्या का परिवार उनके इस निर्णय के खिलाफ ही रहा.
ऐश्वर्या बताती हैं, “तकरीबन एक महीने तक अपने परिवार को मनाने के बाद जब उनकी सुनवाई नहीं हुई, तो विवेक ने मीडिया के ज़रिये अपने विरोध का प्रदर्शन किया. जिसके बाद समाज के सभी लोगों को उनके इस निर्णय के बारे में पता चला गया था और उनका बहुत विरोध हुआ.”
वह कहती है, “समाज के लोग आकर मुझसे कहते थे कि मैं ऐसे लड़के से क्यों शादी कर रही हूं जो कौमार्य परीक्षा के खिलाफ है. वह यह भी कहते थे कि लड़का शायद नपुंसक है और अपनी खोट छुपाने के लिए वह कौमार्य परीक्षा नहीं करवा रहा है और तेरी इज़्ज़त बचाने की दुहाई दे रहा.”
दिसंबर २०१७ से मई २०१८ के दौरान ही विवेक ने ‘स्टॉप द वी( वर्जिनिटी) रिचुअल’ नाम का ग्रुप बनाया जो कुल कर कौमार्य परीक्षा के सोशल मीडिया के ज़रिये विरोध करने जिसके चलते उनके कुछ सदस्यों पर जानलेवा हमले भी हुए.
विवेक जो फ़िलहाल में बिहार के कटिहार जिले में ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में काम करते हैं, बताते हैं, “मैं बचपन से ही देख रहा हूं कि कैसे इस कुप्रथा के ज़रिये महिलाओं का शोषण होता है और कैसे उन्हें उनके पति और समाज द्वारा प्रताड़ित किया जाता है. एक बार उन्हें चरित्रहीन घोषित करने पर जीवन भर उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं. समाज उनके पतियों से उनके बारे में आपत्तिजनक बात करता है, जिसके बदले में उनके पति उनके साथ मारपीट करते हैं. संवैधानिक या वैज्ञानिक तौर पर भी देखा जाए तो यह कुप्रथा पूरी तरह से गलत है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 (निजता के अधिकार) का भी उल्लंघन करता है. यह एक पितृसत्तात्मक सोच है जिसका अंत होना ही चाहिए.”
विवेक बताते हैं कि कौमार्य परीक्षा के दौरान ऐसे भी वाकये हुए हैं जब लड़का-लड़की को उत्तेजित करने के लिए न सिर्फ ब्लू फिल्म या शराब पिलाई जाती है बल्कि किसी अन्य जोड़े को उनके सामने प्रत्यक्ष रूप से सम्भोग करने कहा जाता है और उन्हें दिखाया जाता है.
कौमार्य परीक्षा के खिलाफ अपनी मुखालफत के चलते विवेक के परिवार वालों का भी बहिष्कार हो चुका है. मौजूदा हालत में ना तो कोई उनके घर आता-जाता है और ना उनके परिवार को समाज के लोग अपने घर पर बुलाते हैं.
गौरतलब है कि मंगलवार (23 अक्टूबर, 2018) के दिन उनके परिवार के सदस्यों को महाराष्ट्र स्थित अम्बरनाथ में अंतिम संस्कार की क्रिया में विरोध झेलना पड़ा था. वह कहते हैं, “मेरे परिवार के सदस्य हमारे एक निकटतम संबंधी के अंतिम संस्कार में गए थे और पंचायत के लोग उनका वहां विरोध करने लगे. कंजर-भाट समुदाय में अंतिम संस्कार के दौरान पंचायत के सदस्यों का होना अनिवार्य है और जब उन्होंने वहां मेरे परिवार को देखा तो वह वहां से उनको जाने के लिए बोलने लगे. इससे विवाद की स्थिति पैदा हो गयी थी.”
19 वर्षीय सौरभ मचले जो स्टॉप द वी रिचुअल की मुहिम से जुड़े हैं, उनके ऊपर एक जनवरी 2018 में 30-40 लोगों की भीड़ ने जानलेवा हमला कर दिया था. सौरभ कहते हैं, “हमें शादी में बुलाया गया था जहां जात पंचायत के हिसाब से सब हो रहा था, उन्हें ऐसा लगा कि हम उनका फोटो निकाल रहे हैं जिसके बाद हम पर हमला कर दिया गया.”
कौमार्य परीक्षा की खिलाफत करने वाले कंजर-भाट समुदाय के 25 वर्षीय युवक प्रशांत इन्द्रेकर कहते हैं, “इस कुप्रथा का तब तक कुछ नहीं हो सकता जब तक कुछ बड़ा सबूत जनता के सामने नहीं आ जाता. पहले भी मीडिया और पुलिस को इस बारे में सूचित किया गया था लेकिन कुछ नहीं हुआ. अभी भी शादियों के बाद लड़कियों की कौमार्य परीक्षा करवाई जा रही है. हम अपने समुदाय के लोगों को समझा-समझा कर थक गए हैं लेकिन नतीजा सिफर रहा क्योंकि समाज के ही लोग पंचायत का साथ देते हैं. लेकिन अब इस बारे में आम लोगों में जागरूकता बढ़ रही है. जल्द ही इस प्रथा का अंत होगा.”
हालांकि 50 वर्षीय भूपेंद्र उर्फ़ बब्लू तामचीकर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज हुई है. बब्लू कथित तौर पर कंजर-भाट समाज की जात पंचायत के सदस्य हैं. उनकी माने तो कौमार्य परीक्षा नाम की कोई प्रथा उनके समाज में होती ही नहीं हैं. वह कहते हैं, “ऐसी कोई भी प्रथा नहीं है और ना ही किसी ने युवक-युवतियों का बहिष्कार किया है. जात पंचायत नाम की भी कोई व्यवस्था नहीं है हमारे समाज में. कुछ लोग हैं जिनको शर्म आती है कि वह हमारे समाज में पैदा हुए और समाज की बदनामी का काम कर रहे हैं. यह दूल्हा-दुल्हन पर निर्भर करता है कि वह अपनी वैवाहिक जीवन की शुरूआत कैसे करने चाहते हैं. समाज की तरफ से किसी भी तरह कि कोई ज़बर्दस्ती उनके साथ नहीं की जाती और यह गलत भी है.”
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