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गंगा-पुत्रों का बलिदान एक दिन सरकारों को भारी पड़ जाएगा
स्वामी सानंद पूर्व नाम प्रोफेसर जेडी अग्रवाल, गंगा की रक्षा के लिए एक अदद क़ानूनी ‘सुरक्षा कवच’ का सपना लिए ही संसार से विदा हो गए. जब ‘मुद्दे’ सिर्फ वोटबैंक के चश्मे से देखे जा रहे हों तो स्वामी सानंद का सपना आखिर पूरा होता भी कैसे? क्योंकि जिस गंगा के वह ‘भगीरथ’ थे वह कोई ‘वोटबैंक’ नहीं थी. गंगा वोटबैंक होती तो स्वामी सानंद की सरकार की नजर में अहमियत होती, यहां उल्टा वह सरकारों को खटक रहे थे. प्रकृति की कीमत पर बड़े बांध, चौड़ी सड़कें और विकास के ठेकेदारों की नजर में तो वह विकास की राह में एक बड़ा रोड़ा थे.
गंगा को लेकर उनके अनशन से केंद्र और राज्य की सरकारें तो असहज थीं ही, बांध और बड़े निर्माण कार्य करने वाली कंपनियां और खनन के कारोबारी भी परेशान थे. हालांकि सरकारें उनके सत्याग्रह की अनेदखी करती रही, उनकी आवाज अनसुनी की जाती रही. फिर भी यह उनके ‘समर्पण’ और ‘प्रण’ की ताकत थी कि सरकारों पर उनके आंदोलन का गहरा दबाव था. यही कारण था कि गंगा पर विशेष कानून की उनकी प्रमुख मांग को सरकार न खारिज कर पा रही थी, न उन्हें इस पर कोई ठोस आश्वासन दिया जा रहा था.
यूं तो स्वामी सानंद पहले भी चार बार गंगा के मुद्दे पर अनशन पर रहे. हर बार सरकारें अपनी तमाम योजनाओं का हवाला देती रही और गंगा की रक्षा का भरोसा दिलाती रहीं. सरकार ने उनके आंदोलन के चलते गंगा पर निर्माणाधीन कई परियोजनाओं को बंद किया तो बड़ी संख्या में प्रस्तावित परियोजनाओं को निरस्त भी किया, लेकिन गंगा संरक्षण को कानून बनाने की उनकी प्रमुख मांग पूरी नही हो पायी.
उत्तराखंड में तो कई मौकों पर उन्हें ‘खलनायक’ भी घोषित किया गया, उन्हें जन विरोध का सामना भी करना पड़ा. इस सबके बावजूद वह डिगे नहीं, उनका आत्मबल कम नहीं हुआ. और इस बार तो मानो स्वामी सानंद अंतिम सांस तक संघर्ष के लिए संकल्पबद्ध थे. उनका स्पष्ट मत था कि गंगा की रक्षा के लिए अविरलता और निर्मलता जरूरी है और यह तभी संभव है जब इसके लिए विशेष कानून बनाया जाए.
गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए मुखर यह आवाज ऐसे समय में मौन हुई है, जब देश में नमामी गंगे जैसी हजारों करोड़ की परियोजना और स्वच्छ गंगा मिशन जैसे कार्यक्रम संचालित हो रहे हैं. सानंद की मौत से साबित होता है कि सरकार की योजनाओं और कार्यक्रमों में बड़ा ‘झोल’ है. वाकई सरकार की मंशा सही होती तो लगभग 85 वर्ष की उम्र में स्वामी सानंद की 112 दिन तक अनशन पर रहते हुए मौत नहीं होती.
स्वामी सानंद की मौत पर केंद्र और राज्य की सरकारें आज ‘कटघरे’ में हैं. अब सिर्फ उनकी मौत पर ही नहीं बल्कि गंगा के उद्धार के लिए चलायी जा रही नमामी गंगे जैसी परियोजनाओं पर भी सवाल उठने लगे हैं. सवाल इसलिए, क्योंकि हजारों करोड़ के बजट वाली नमानी गंगे परियोजना में गंगा की अविरलता और निर्मलता की नहीं बल्कि सिर्फ सफाई और स्वच्छता की बात हो रही है.
पर्यावरणविदों की मानें तो गंगा की अविरलता और निर्मलता हिमालय क्षेत्र में होने वाले अनियोजित विकास के चलते संभव नहीं है. दुर्भाग्यवश आज हो क्या रहा है? गंगा के संरक्षण को लेकर बड़े दावे और वायदे किये जा रहे हैं. एक ओर हजारों करोड़ रुपया पानी की तरह गंगा की सफाई के नाम पर खर्च हो रहा है, जबकि दूसरी ओर हिमालय क्षेत्र में व्यापक स्तर पर अनियोजित निर्माण कार्य चल रहे हैं. यह जानने के बावजूद भी कि नदियों को बांधने से वह एक दिन उग्र रूप धारण कर लेंगी. पहाड़ों के कटान से वह कमजोर पड़ जाएंगे. फिर भी नदियों पर बड़े बांध प्रस्तावित किये जा रहे हैं, आल वेदर रोड के नाम पर हजारों पेड़ों की बलि दी जा रही है.
एक गौर करने लायक पहलू यह भी है कि सरकार की योजनाओं और हकीकत में जबरदस्त विरोधाभास है. एक और नमामी गंगे परियोजना में गंगा के कैचमेंट इलाके में सघन वृक्षारोपण की बात कही जाती है तो दूसरी ओर आल वेदर रोड के नाम पर संरक्षित प्रजाति के हजारों पेड़ों की बलि दे दी जाती है. पर्यावरण व पारिस्थतिकी संरक्षण के लिए संवदेनशील क्षेत्र घोषित किये जाते हैं, लेकिन वहां के विकास का मास्टर प्लान तैयार नहीं किया जाता. संवेदनशील इलाकों में भी सरकारी विकास का माडल यह है कि पहाड़ों को काट कर सड़कें बनायी जा रही हैं, सीमेंट और कंक्रीट से निर्माण कार्य हो रहे हैं. पेड़ों की कटान चल रही है और पंचेश्वर जैसी बड़ी बांध परियोजनाओं में नदियों को बांधने की तैयारी है.
दरअसल विकास का यही सरकारी मॉडल स्वामी सानंद की चिंता का विषय था. स्वामी सानंद इसी माडल का विरोध करते रहे, उनके मुताबिक हिमालय क्षेत्र में हो रहे अनियोजित विकास से गंगा के मैदानी इलाके भी प्रभावित होंगे. स्वामी सानंद का मानना था कि हिमालय संरक्षण के लिए गंगा को बचाना जरूरी है, उसे निर्मल रखना जरूरी है. वह सिर्फ गेरुआ धारण करने वाले या किसी विचारधारा विशेष से जुड़े संत नहीं थे. वह गंगा और पर्यावरण का सिर्फ राग नहीं अलापते थे. गंगा की रक्षा उनके लिए एक अभियान था जिससे वह आत्मा से जुड़े हुए थे. एक इंजीनियर और पर्यावरण विज्ञानी होने के कारण तकनीकी पहलुओं के जानकार थे और उसी आधार पर गंगा की अविरलता के पैरोकार थे.
गंगा की निर्मलता के लिए स्वामी सांनद की सोच का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि वह पहले ही एम्स ऋषिकेश को अपनी देह दान कर चुके थे. गंगा पर बांध बनाए जाने के वह विरोधी थे, उनके मुताबिक बांधों के निर्माण से अविरलता खत्म होती है. उनकी यह भी मांग थी कि गंगा पर जितने भी बांध बन रहे हैं उनका निर्माण रोका जाए.
बीते एक दशक में उन्होंने गंगा को लेकर पांच उपवास किये. गंगा और इससे जुड़े क्षेत्रों के संरक्षण के लिए उनके चलाए आंदोलन का ही प्रभाव रहा कि उत्तराखंड में तकरीबन 7000 करोड़ की परियोजनाएं बंद करने का फैसला लेना पड़ा. लोहारी नागपाला, भैरोघाटी और पाला मनेरी परियोजना लगभग 1000 करोड़ रुपया खर्च होने के बावजूद बंद करनी पड़ी. इतना ही नहीं गंगोत्री से उत्तरकाशी तक का क्षेत्र इको सेंसटिव ज़ोन भी घोषित किया गया. स्वामी सानंद उर्फ प्रो जीडी अग्रवाल को इस कारण भारी विरोध का सामना भी करना पड़ा, लेकिन गंगा रक्षा के लिए शुरू किये गए अभियान पर वह अडिग रहे.
सरकारों का रवैया
अब कुछ बात सरकारों की भी. सरकारें अगर स्वामी सानंद के तर्क पर तमाम परियोजनाएं बंद करने का फैसला ले सकती हैं तो फिर स्थायी तौर गंगा की रक्षा के लिए कानून क्यों नहीं बना सकती? दरअसल सरकार की मंशा इस मुद्दे पर हमेशा संदिग्ध ही रही है, स्वामी सानंद भी 112 दिन से सरकार की मंशा पर ही सवाल खड़ा कर रहे थे. सरकार की मंशा पर आखिर संदेह क्यों न हो?
सरकार गंगा संरक्षण का नारा तो दे रही है लेकिन यह सफाई अभियान से अधिक कुछ नजर नहीं आता. सरकार हिमालय से लेकर मैदान तक गंगा को एक ही नजरिये से देख रही है. सवाल वाकई अगर गंगा की अविरलता और निर्मलता का है तो गंगा का संरक्षण उसके उद्गम क्षेत्र से किया जाना जरूरी है. और यह सिर्फ तभी संभव है जब गंगा और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए कोई कानून लाया जाय. अब सवाल यह है कि सरकार गंगा एक्ट को लेकर संवेदनहीन क्यों है? ऐसा नहीं है कि सरकार इसकी जरूरत नहीं समझती, अब तो न्यायालय भी कई बार गंगा की अवरलता और रक्षा के लिए तमाम आदेश जारी कर चुका है. लेकिन सरकारें न कानून बनाती हैं और न न्यायालय के आदेशों पर अमल करती हैं.
दरअसल सरकारों पर दबाव है, यह दबाव राजस्व के लिए संसाधनों के उपयोग और विकास परियोजनाओं का तो है ही. इसके अलावा बड़े कारपोरेट घरानों और निर्माण कंपनियों के हितों का सवाल भी है. संभवत: इसी दबाव में सरकार स्वामी सानंद की अनदेखी करती रही, उन्हें अनसुना करती रही. अब सवाल यह है कि क्या स्वामी सानंद का सपना अधूरा रह जाएगा?
स्वामी सानंद की मौत के बाद जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उससे यह साफ है कि गंगा एक्ट के संघर्ष को और मजबूती मिली है. पर्यावरणविदों में सानंद की मौत पर गहरी प्रतिक्रिया है, सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल उठ रहे हैं. सरकारों को अगर यह लगता है कि स्वामी सानंद की मौत के साथ ही गंगा एक्ट की मांग समाप्त हो चुकी है तो सरकारें गलतफहमी में हैं. गंगा के लिए बलिदानों का सिलसिला शुरू हो गया है, पहले निगमानंद और अब स्वामी सानंद. गंगा का ‘वोटबैंक’ न होने के कारण सरकारें बेपरवाह हैं, लेकिन यह तय है कि गंगा पुत्रों का यह बलिदान एक दिन अपना रंग जरूर दिखाएंगा.
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