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रुपया, सेंसेक्स और टाटा बाय-बाय
28 अगस्त, 2018, को बीएससी का सेंसेक्स सूचकांक अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 38,897 पर बंद हुआ था. तबसे अब के बीच ये सूचकांक तेज से कमज़ोर हुआ है. पांच अक्टूबर, 2018 को ये सूचकांक 34,377 पर बंद हुआ. 28 अगस्त से पांच अक्टूबर के बीच सेंसेक्स में करीब 11.6% की गिरावट हुई.
इन पांच से छह हफ़्तों की अवधि में ऐसा क्या बदल गया कि सेंसेक्स में इतनी भारी गिरावट हुई? इसका सीधा जवाब है, डॉलर के मुकाबले में रुपये की गिरावट.
28 अगस्त को एक डॉलर का मूल्य करीब 69.9 रुपए था. 5 अक्टूबर को एक डॉलर का मूल्य 74.2 रुपए पर बंद हुआ. इस समय में रुपया, डॉलर के मुकाबले 6.2% गिर गया. इस गिरावट का खामियाज़ा विदेशी संस्थागत निवेशकों को भी भुगतना पड़ा.
प्रश्न है कैसे? इसको समझने के लिए एक उदाहरण लेते हैं. मान लीजिये, एक विदेशी संस्थागत निवेशक भारत में 1,00,000 डॉलर का निवेश करना चाहता है. भारत में ये रकम निवेश करने के लिए उसे ये डॉलर रुपये में बदलने पड़ेंगे. मान लीजिये कि इस समय एक डॉलर 70 रुपए के बराबर है. डॉलर को रुपए में बदलने के बाद विदेशी निवेशक के पास आ जाते हैं 70 लाख रुपए.
इस पैसे को ये निवेशक शेयर बाज़ार में लगा देता है. कुछ समय बाद, किन्हीं कारणों से विदेशी निवेशक को बाज़ार से पैसा निकालना पड़ता है. तब तक रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले गिर 75 रुपए हो चुकी है (मिसाल के तौर पर).
इस गिरावट की वजह से अब उस विदेशी निवेशक को अपना 1,00,000 डॉलर निकालने के बदले में 75 लाख रुपए देना पड़ता है. इसका मतलब ये हुआ कि निवेशक को अपने निवेश पर कोई लाभ नहीं होता. फर्ज कीजिए कि एक डॉलर 80 रुपए पर चल रहा होता, तब क्या होता? विदेशी निवेशक को अपने एक लाख डॉलर के निवेश के बदले 93,750 डॉलर मिलते और उसे अपने निवेश पर 6.25% का नुकसान उठाना पड़ता.
इस उदाहरण से हमें ये पता लगता है कि अगर डॉलर के प्रति रुपये का मूल्य गिरता है, तब विदेशी निवेशकों का लाभ या तो कम हो जाता है या फिर उन्हें अपने निवेश पर नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.
जैसा कि मैंने शुरू में लिखा था, रुपये का मूल्य डॉलर के प्रति हाल फ़िलहाल में काफी गिरा है. और जैसी परिस्थिति चल रही है, उससे ऐसा लगता है कि, रुपये का मूल्य आगे भी गिरेगा. ऐसे में विदेशी निवेशक भारत से अपने पैसे निकाल रहे हैं. सितंबर से लेकर अब तक ये निवेशक शेयर बाजार से 17,919 करोड़ निकाल चुके हैं. जब विदेशी निवेशक शेयर बेचते हैं, तो शेयर के दाम गिरते हैं और फिर इससे बाज़ार भी गिरता है. जब विदेशी निवेशक शेयर बेच कर प्राप्त किए रुपयों को बेच कर डॉलर खरीदते हैं, तो इससे डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है और रुपए का मूल्य डॉलर के प्रति और भी गिर जाता है.
गिरते हुए रुपए से, उन विदेशी निवेशकों का भी नुकसान होता है जो कि भारतीय ऋण बाज़ार (debt market) में पैसा लगा कर बैठे हैं. इसलिए ये निवेशक भी अपना निवेश बेच कर देश से निकलने की ताक में बैठे हैं. सितंबर की शुरुआत से अब तक इन निवेशकों ने 12,458 करोड़ रुपए की बिकवाली ऋण बाजार से की है. जब ये निवेशक इन रुपयों को बेचकर डॉलर खरीदते हैं, तो रुपए पर दबाव और बढ़ जाता है.
यह ऐसा दुष्चक्र है कि एक बार रुपया गिरना शुरू हो जाय तो एक समय के बाद रुपया सिर्फ इसलिए गिर रहा होता है, क्योंकि रुपया गिर रहा होता है.
विदेशी निवेशकों ने पश्चिमी देशों से कम ब्याज पर पैसा उठा कर भारत में लगाया था. अब पश्चिमी देशों में ब्याज दर बढ़ रही है. इससे इस पंचायत (arbitrage) पर काफी असर पड़ा है. और उस पर से गिरता हुआ रुपया.
पिछले हफ्ते भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में ये साफ़ कर दिया कि गिरते हुए रुपए को बचाना उसका काम नहीं. इससे बाज़ारों में (शेयर बाजार, बाज़ार और ऋण बाज़ार) में खलबली और भी बढ़ गयी है.
इन्हीं वजहों से विदेशी निवेशक भारत को टाटा बाय-बाय कह रहे हैं, रुपया गिर रहा है और बाज़ार में बदहाली का मौसम छाया हुआ है.
(विवेक कौल इजी मनी ट्राइलॉजी के लेखक हैं).
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