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उपेंद्र कुशवाहा खीर क्यों और कहां पकाना चाहते हैं?
उपेंद्र कुशवाहा केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं. राज्य मंत्री के नाते उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अपने चुनाव क्षेत्र में उन्होंने दो सेंट्रल स्कूल खुलवाए हैं. सेंट्रल स्कूलों में दाखिले में मंत्री को कुछ विशेषाधिकार होते हैं, इस नाते कुशवाहा ने स्कूलों में कुछ बच्चों-बच्चियों के एडमिशन आदि भी कराए होंगे. बीजेपी ने उन्हें इससे ज्यादा कुछ करने नहीं दिया. शिक्षा नीति और शिक्षा संस्थानों की नियुक्तियों में आरएसएस किसी को हस्तक्षेप करने की इजाजत दे भी नहीं सकती थी. केंद्र सरकार में उपेंद्र कुशवाहा के साढ़े चार साल ऐसे ही कटे हैं. कुशवाहा यह दावा नहीं कर सकते कि मंत्रालय की किसी भी एक नीति या किसी महत्वपूर्ण नियुक्ति पर उनकी छाप है. कुशवाहा जैसे सक्षम और सचेत नेता के लिए यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है.
उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) ने पिछला लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिल कर लड़ा था. पार्टी ने तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और तीनों सीटों पर उसे जीत मिली थी. सवा चार साल से वे केंद्र में सत्ता में हैं, लेकिन अब वे खीर पकाने की बात कर रहे हैं. खीर बनाने के लिए वे जो फार्मूला दे रहे हैं, उसमें यादव का दूध, अपनी जाति यानी कुशवाहा का चावल और अतिपिछड़ी जातियों का पंचमेवा शामिल है. दस्तरखान तो मुसलमान ही बिछाएंगे. बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इस खीर का स्वागत करते हुए ट्वीट भी किया है.
स्वाभाविक है, इस खीर ने बीजेपी और एनडीए की नींद उड़ा दी है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि तीन सांसदों वाली पार्टी अलग चूल्हा-चौका सजाने की बात इशारों में कर रही है. इससे पहले पीडीपी के साथ बीजेपी का कश्मीर में गठबंधन टूट चुका है. बीजेपी की सहयोगी रही, आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी तेलुगु देशम पार्टी ने तो लोकसभा में केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था. महाराष्ट्र में शिव सेना क्या करेगी, इसे लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है. अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान नें शिव सेना ने सरकार के समर्थन में वोट नहीं डाला था. केंद्र सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव में जबरदस्त जीत हासिल की, इसके बावजूद बीजेपी यह कतई नहीं चाहेगी कि उसका कोई सहयोगी और वह भी उत्तर भारत का कोई सहयोगी दल, उसे छोड़कर जाए. बीजेपी जानती है कि उसकी सरकार विंध्य पर्वत के ऊपरी इलाकों के वोटों से बनी है. वैसे भी उपेंद्र कुशवाहा जिस कुशवाहा यानी कोइरी जाति से आते हैं, वह उत्तरी भारत में अच्छी संख्या में है.
लेकिन सवाल उठता है कि उपेंद्र कुशवाहा अलग खीर पकाने की बात क्यों कर रहे हैं?
उपेंद्र कुशवाहा तीन सांसदों के साथ केंद्र सरकार में राज्य मंत्री ही बन सकते थे. वह तो वे बन चुके हैं. कामकाज के बंटवारे को लेकर उनका बीजेपी से कोई झगड़ा सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आया है. बीजेपी के साथ नीतियों के आधार पर उनका कौन सा मतभेद है, यह हम नहीं जानते. यह सच है कि उपेंद्र कुशवाहा की छवि सामाजिक न्याय वाले नेता के तौर पर है और पिछड़ी जातियों के वे हितैषी माने जाते हैं. वे महात्मा फुले समता परिषद से भी जुड़े रहे हैं. उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता के वे समर्थक हैं और कोलेजियम सिस्टम के खिलाफ उनके आंदोलन की राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा है. वे चाहते हैं कि जजों की नियुक्ति मेरिट के आधार राष्ट्रीय परीक्षा के जरिए हो और उसमें आरक्षण लागू हो. लेकिन यह मामला ऐसा नहीं है कि जिसके लिए वे बीजेपी का साथ छोड़ दें.
उपेंद्र कुशवाहा की समस्या कुछ और है
समस्या यह है कि उपेंद्र कुशवाहा की जाति उनको बिहार का मुख्यमंत्री देखना चाहती है. बिहार में कुशवाहा वोट छह फीसदी से ज्यादा है. कुर्मियों की तुलना में कुशवाहा दो गुने से ज्यादा है. बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति के दौर में यादव और कुर्मी मुख्यमंत्री बन चुके हैं और कुशवाहा जाति को लगता है कि अब उनकी जाति के मुख्यमंत्री की बारी है. उपेंद्र कुशवाहा अपनी जाति के सबसे बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं और उनकी जाति को उनमें अगला मुख्यमंत्री दिखने लगा है. उपेंद्र कुशवाहा की छवि साफ-सुथरी है और वे सबको साथ लेकर चलने वाले नेता माने जाते हैं. वे अपनी जाति में उम्मीद जगा रहे हैं.
ऐसे समय में उपेंद्र कुशवाहा बेशक यह फल इसी चुनाव में न तोड़ पाएं, लेकिन उनके लिए आवश्यक है कि वे अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए दिखें. क्या बीजेपी या एनडीए में उतनी जगह है कि वे अपने पैर पसार पाएं? अभी स्थिति यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बिहार में एनडीए को 40 में से 31 सीटें मिली थीं. इनमें से तीन सीटें कुशवाहा की पार्टी को और छह सीटें रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी को मिली थीं. 22 सीटें बीजेपी के हिस्से आई थीं.
अगर अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी और लोक जनशक्ति पार्टी सिर्फ जीती हुई सीटों पर लड़ती है और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू एनडीए में शामिल हो जाती है, जो लगभग तय है, तो कुशवाहा की पार्टी के लिए अपनी जीती हुई तीन टिकट को बचा पाना भी मुश्किल होगा. सबसे अच्छी स्थिति में भी कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के एनडीए में रहते हुए, तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारने का मौका मिलेगा. बीजेपी यह जरूर चाहेगी कि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी एनडीए में रहे. लेकिन वह रालोसपा को तीन से ज्यादा सीटें नहीं दे पाएगी क्योंकि देने के लिए उसके पास ज्यादा सीटें हैं ही नहीं. नीतीश कुमार को एडजस्ट करना अपने आप में काफी बड़ी चुनौती है क्योंकि नीतीश कुमार अब तक ऐसे किसी गठबंधन में शामिल नहीं हुए हैं, जहां वे बड़े या बराबर के पार्टनर न हों. भविष्य में बिहार का मुख्यमंत्री बने रहने के लिए यह जरूरी है कि वे किसी गठबंधन में जूनियर पार्टनर न बनें.
जाहिर है कि एनडीए में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की हैसियत चौथे नंबर की होगी. एनडीए में चौथे नंबर पर होने का मतलब है कि बिहार की राजनीति में वह पांचवें या छठे नंबर की ताकत बन कर रह जाएगी.
यह रास्ता उपेंद्र कुशवाहा को मुख्यमंत्री की कुर्सी की ओर नहीं ले जाता. पांचवे या छठे नंबर की पार्टी यह नारा नहीं लगा पाएगी कि ‘बिहार का नेता कैसा हो, उपेंद्र कुशवाहा जैसा हो.’
ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा अगर एनडीए के बाहर, महागठबंधन में अपना विकल्प देख रहे हैं तो यह तर्कसंगत दिखता है. उपेंद्र कुशवाहा अगर शरद यादव के साथ मिलकर एक पार्टी बना लेते हैं तो महागठबंधन में वे 10 से 12 सीटों तक की मांग कर सकते हैं और मुमकिन है कि आरजेडी इसके लिए या थोड़ा कम-ज्यादा पर तैयार भी हो जाए. तेजस्वी यादव जानते हैं कि कम से कम एक और चुनाव तक आरजेडी या तो सत्ता में होगी या विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी और इस बार नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए अगर वे उपेंद्र कुशवाहा को गठबंधन में एडजस्ट कर भी लें तो उनकी स्थिति पर खास फर्क नहीं पड़ेगा. अगर ऐसा गठबंधन हुआ तो उपेंद्र कुशवाहा की ताकत बढ़ेगी और भविष्य में उनके मुख्यमंत्री बनने की संभावना जिंदा रहेगी. महागठबंधन में वे बढ़ती हुई पार्टी के तौर पर नजर आएंगे.
हालांकि यह नहीं भूलना चाहिए कि ये सारी पैंतरेबाजी लोकसभा चुनाव के लिए हो रही है. इस चुनाव के दौरान, आगे की राजनीति के लिए समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे. इन चुनावों का असर विधानसभा चुनावों पर भी होगा, जिसके लिए बिहार की तमाम पार्टियां दावेदारी कर रही हैं. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बीजेपी अगर यह सोच लेगी कि उसे रालोसपा को साथ रखना है तो इसके लिए किसी भी हद तक जाएगी और राजनीति में आखिरी हद तक जाने के कई मायने होते हैं.
कुल मिलाकर उपेंद्र कुशवाहा ने लोकसभा चुनाव से पहले बिहार की राजनीति को दिलचस्प बना दिया है जहां हर तरह की संभावना के दरवाजे खुल गए हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने अपने घोड़े खोल दिए हैं. अब दारोमदार भाव लगाने वालों पर है. उपेंद्र कुशवाहा फिलहाल यही चाहते हैं.
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