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नए शेखर की जीवनी: अवसाद, जीवन और संधियों के बीच बेसुध समयालाप
किसी रचनात्मक कृति को देखने की कई दृष्टियां संभव हैं, और यही बात हम घटनाओं के बारे में भी कहते रहे हैं. यदि किसी देश में किसी क़िस्म के कट्टरपंथ की बढ़त है, तो उसे आंकने और उस पर बात करने के बहुत सारे आयाम हैं. एक पत्रकार जिस दृष्टि से उसे देखेगा, संभव है कि एक कवि-आलोचक की दृष्टि भिन्न हो.
लेकिन एक कवि की निगाह क्या होती है और हमारे भूगोल-समय और उससे जुड़े दर्शन की काव्य काया कैसी है, इसका पता, फिर से, ‘नए शेखर की जीवनी’ देती है. युवा आलोचक, कवि और साहित्यिक पत्रकार अविनाश मिश्र की वाणी प्रकाशन से छपकर आयी किताब का नाम है “नए शेखर की जीवनी”. इस किताब को साधने और कैटेगराइज़ करने के बेहद और वाजिब बहाने हो सकते होंगे, लेकिन ऐसी कोई बाध्यता मेरे सामने है नहीं.
“नए शेखर की जीवनी” एक ऐसी किताब है जो गद्य के कई बंधों से एकसाथ संवाद करती है. लिखी तो गयी है डायरी की शक्ल में, लेकिन अपने वजूद में यह गद्य का ऐसा काम है, जो मूलतः समयालोचना है. और शायद इसी वजह से आप इसमें गल्प का भी एक विस्तार पा सकते हैं. लेकिन अपने सबसे जघन्य और अश्लील वक़्त पर बात करते हुए भी काव्यदृष्टि संभव है- भले ही उसका परसेप्शन जो हो- इसका पता अविनाश मिश्र की ये किताब देती है.
लम्बे समय तक हिन्दी लेखकों में राजनीतिक शार्पनेस ढूंढते मुझे केवल राजनीतिक करेक्टनेस के अध्याय दिखे. शार्पनेस के बहुधा उदाहरण उनमें ही मिले, जिनका कलाओं-कहानियों-कविताओं या आलोचनात्मक निबंधों की रचना से कोई लेना-देना नहीं था. ऐसे में इस प्रश्न का निर्माण होना कि “क्या खांटी साहित्यिकों के पास राजनीतिक रूप से करेक्ट होने की कोशिश है, शार्प होने की नहीं?” और इसके साथ इसे जानने की कोशिश भी है कि शार्पनेस आती होगी तो कैसी आती होगी? “नए शेखर की जीवनी” इस बात का जवाब परिवेश से थोड़ा और दूर ले जाकर देती है.
शेखर, जो “इंदिरा गांधी की हत्या के बाद और राजीव गांधी की हत्या के पहले पैदा हुआ”, एक ऐसा व्यक्ति है, जो कई मोर्चों पर एकसाथ जीवन को बचाने और अव्वल तो उसका एसेसमेंट करने की कोशिश कर रहा है. और इन कोशिशों में शेखर के उपक्रम भौंडे, अश्लील और खांटी साहित्यिक नहीं हैं. भाषा की विराट सत्ता के बीचोंबीच रहते हुए भी शेखर यह इसरार करने से नहीं चूकता कि उसे जीवन के लिए छोटे वाक्यों की ज़रूरत है क्योंकि “छोटे मुंह से निकले बड़े वाक्यों की असावधानी पकड़ में आ जाती है.” और इसे ज़ाहिर करते हुए अपनी किताब में अविनाश मिश्र बेहद सटीक और मारक आलोचनात्मक क़दम उठाते हैं.
“हिन्दी की एक कवियित्री ने अपनी एक कविता में जामुन के पेड़ की डाल पर झूला डालने की बात की है. वह इसका नतीजा नहीं जानती थी. नतीजतन उसके झूले और उसकी कविता दोनों की ही रीढ़ टूट गयी.”
और, इससे थोड़ी दूरी पर जुड़ते हुए:
“शेखर को दे दी गयी भाषा ‘टाइटैनिक’ की तरह डूबने वाली थी. चूहे और घुसपैठिए सबसे पहले इसे छोड़कर भाग रहे थे और शेखर डूब-मरकर भी बचाना चाहता था इसमें उपस्थित सौंदर्य.”
अविनाश की इस किताब को पढ़ते वक़्त आपको ये यदि न लगे कि असल कवि एक बदहवास प्राणी होता है, तो मेरे हिसाब से पूरे पाठ में आपसे कोई भारी चूक हो गयी है. इस किताब को लिखते हुए विष्णु खरे से गुज़रकर असद ज़ैदी तक पहुंचने के किस्से हैं. वह कभी समाचार नहीं देखता, कभी वोट करने नहीं जाता लेकिन यह जानता है कि उसके वोट के बग़ैर भी पूर्ण बहुमत से ऐसी सरकारें चुनी जाएंगी, जिनके वजूद में नहीं होने से भी मॉब कुछ भी लिंच कर सकती है.
कई मौक़ों पर आपको लगता है कि अविनाश मिश्र से पूछा जाए कि क्या आप ही वह शेखर हैं? लेकिन ऐसी बचकानी और किंचित मूर्ख कोशिश करने से पहले हम यह सोच सकते हैं कि शेखर नाम का प्राणी कभी भी कपड़े, शहर, देह या प्रेमिका बदलते मिल सकता है.
हिन्दी में बेहद लाउड होकर बात करने की कोशिशें हैं, इस लाउडनेस में वाक्य नारों की तरह दिखने लगते हैं और पंक्तियां किसी थके हुए जनगीत की तरह. और ऐसे में, भाषा और पाठक दोनों ही ख़ुद को भ्रष्ट स्वीकार करने से बाज़ आते रहते हैं. इस लाउडनेस को साधने और उस पर बात करने के लिए बिंबों और उनकी परिभाषाओं के ज़रिए “नए शेखर की जीवनी” कोशिश करती है. फरवरी 2002 में गोधरा से बात करते हुए शेखर कहता है:
“उन दिनों खेलों में इतना दुर्निवार आकर्षण था कि उनके लिए भविष्य तक ले जाने वाली कक्षाएँ तक भंग की जा सकती थीं.”
और फिर इस किताब का संभवतः सबसे महान पैराग्राफ़ सामने आता है:
“चाकू, ब्लेड या फुटा दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं. रस्सी, सीढ़ी, कुदाल, फावड़ा, कुल्हाड़ी, करनी, बल्लम, बसुला दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं. नाव, नदियों का पानी, धर्मस्थलों की सीढ़ियाँ और मशाल दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं. जहालत और मुशायरे, फ़तवे और वुजू, फटी हुई टोपियाँ, छोटे पायजामे, काले बुर्क़े, मोहम्मद रफ़ी के नगमे और तंग, अंधेरी, बदाबूदर गलियाँ, ख़त और ख़ुदा हाफ़िज़ दैनिक प्रयोग की वस्तुएं थीं.”
ये तमाम चीज़ें “दैनिक प्रयोग” में तो रही ही आई थीं, लेकिन फरवरी 2002 में सभी इन चीज़ों का “दैनिक प्रयोग” कर रहे थे.
जनवरी 1996 में कानपुर में खड़ा होकर शेखर एक बेजा और व्यर्थ मांग उठाता है और कहता है कि वह पोरबंदर में ख़त्म होना चाहता है. फिर वह कहता है, “शेखर क्रांतिकारी नहीं है, लेकिन उसे यह खुशफहमी है कि एक क्रांतिकारी के रूप में उसकी प्रतिभा वैसे ही असंदिग्ध है- जैसे पूर्णकालिक न होने पर भी नेपोलियन की आकृति-विज्ञान में, मेजाफेंटी की भाषाओं में, लॉस्कर की शतरंज में और बुसोनी की संगीत में थी.”
लेखक से ऐसी अभिलाषा रखना कि वह झंडा उठाए फिरता रहे, एक क़िस्म का आरोप और उसकी संपदा के साथ ट्रोलिंग है. लेखक, किसी नैतिक रूप में तो नहीं, लेकिन परिस्थितियों को अपनी ही एक निगाह से देखता है. एकदम संभव है कि आपका उस निगाह से कोई राब्ता न हो, या कोई ऐसा राब्ता हो कि आप उस निगाह से दूरी बनाते हों, लेकिन “नए शेखर की जीवनी” से यह मालूम होता है कि लेखक की पूरी राजनीतिक स्थापना बेहद लोकल, चश्मदीद और सरल उपक्रमों से उपजती है, उसे ड्राइंग रूम में बैठकर नहीं साध सकते.
“इस वक़्त तक ‘जय श्री राम’ बहुत बार बोला जा चुका था. विध्वंस और विस्फोट बहुत बार हो चुके थे. समाज सारे हादसों की गर्द झाड़कर बाज़ार के पीछे-पीछे चलने लगा था और इस असर में एक नयी चाल के युवा उभर रहे थे – विचारधारा से अलग, करियरवादी, सुविधाभोगी, लचीले, लम्पट और अगंभीर.”
कानपुर, जनवरी 1996 की ही सतरें लिखते हुए ये ख़ुलासा होता है. शेखर का पूरा हिसाब—जो हममें से किसी का भी कभी भी हो सकता है- इन्हीं उदाहरणों से भरा हुआ है, उनमें विराट ज़ाहिर होने की न कोई ख़्वाहिश है, न कोई गुंज़ाइश.
“अविवेक की भाषा में मुन्नी बदनाम होती नहीं थी होता था.
अमित शाह बिहार जाता नहीं था जाती थी.
धर्मनिरपेक्षता रोती नहीं थी रोता था.
फ़ासिज़्म आता नहीं था आती थी और मौत भी आती नहीं थी आता था.”
एक संपादक की नौकरी करना और भाषा को दुरुस्त करते समय यह बात करना- होना लाजिम है, लेकिन यहां ध्यान देने के लिए वह “अविवेक” है, जो नौकरियों के साथ-साथ जीवन में संभव है. इस अविवेक की जीवन में इतनी आवाजाही है कि शेखर की नौकरी और उसका जीवन दोनों ही भ्रष्ट हो चुके हैं. इस अविवेक की “छांव तले” बदनाम मुन्नी और अमित शाह दो वाक्यों में एक के बाद एक आते हैं. और एक लाजिम बात आती है, “अयोग्यता और कर भी क्या सकती है?”
एक सीमित संसाधनों और ज़रूरतों के बीच रहे व्यक्ति के सामाजिक सरोकार और कैसे हो सकते हैं? क्या वे इतने नैतिक हो सकते हैं कि आगे का रास्ता बना सकें? संभवतः नहीं. याद रखिए कि हम उस शेखर के बारे में बात कर रहे हैं जो जब कानपुर से दिल्ली आया तो उसे “कमरे को कभी अंदर से बंद करने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई. उस कमरे में उसे कभी बंदूक़ की, गर्लफ़्रेंड की और हिन्दी के एक वरिष्ठ कवि की ज़रूरत महसूस नहीं हुई.” क्योंकि “उस कमरे में उसे दिल्ली कभी महसूस नहीं हुई.”
मैं दिल्ली में रहता नहीं हूं, लेकिन दिल्ली हर महीने जाने पर भी दिल्ली को हिक़ारत से देखता हूं और चाहता हूं कि सब मेरे लिए नया रहे, केंद्रीय सचिवालय का गेट नम्बर भी- वह जो प्रेस क्लब के सामने खुलता है- और उस ढोंगी व्यक्ति का चरित्र भी जो मेट्रो में सवारी कभी नहीं करता है. मैं इन स्थापनाओं से अनभिज्ञ रहना चाहता हूं. लेकिन ‘नए शेखर की जीवनी’ पढ़ते वक़्त इतना ज़रूर लगता है कि इतनी हिम्मत बस मैं ही नहीं करता. उत्तर प्रदेश के किसी शहर से भी आकर दिल्ली में कुछ दिन बिताने वाला इस महानगर, जो राजधानी होने से भी ग्रस्त है, को भी वैसे ही देखता है. उस व्यक्ति, यानी शेखर, के लिए भी दिल्ली मक्कारों से भरी हुई है.
अक्टूबर 2015 में वह दिल्ली के नाम दर्ज करता है:
“संसार की सबसे महानतम क्रांति के गवाह रहे इस अक्टूबर में शेखर सोचता है भारतीय लोकतंत्र की निरीहता के बारे में कि कैसे-कैसे मक्कारों को सत्ता सौंपी है इस मुल्क ने कि उनकी जगह दूसरे मक्कारों को लाना भी चाहें तो सालों लग जाते हैं.”
तो दिल्ली के असल मक्कार कौन हैं? ये टूटपुंजिए विशेषण किन्हें संबोधित हैं? इसके बड़े अर्थ हैं तो बेहद छोटे भी, क्योंकि अगले ही पल वह कानपुर में अप्रैल 2017 में दर्ज करता है:
“जिन्होंने सरकारी नौकरियां चाही थीं, उन्हें सरकारी नौकरियां मिल गयी हैं. जिन्होंने क्रांतिकारी प्रेमिकाएँ चाही थीं, उन्हें क्रांतिकारी प्रेमिकाएँ मिल गयी हैं. जिन्होंने सीधी-सादी बीवियाँ चाही थीं, उन्हें सीधी-सादी बीवियाँ मिल गयी हैं. जिन्होंने बाप बनना चाहा था, वे बाप बन गए हैं और जिन्होंने लेखक बनना चाहा था, वे लेखक.
जो जिस चीज़ के पीछे भागा, उसकी साँस उखड़ने से पहले वह उसे मिल गयी—जैसे शेखर को उसका अध्ययन-कक्ष और जनता को उसका हिन्दू-राष्ट्र.”
रोचक बात है कि ये किताब अज्ञेय के उपन्यास “शेखर: एक जीवनी” पर अपने केंद्र को रखती है, लेकिन विस्तार इतना लेती है कि बात अज्ञेय के बिना भी की जा सकती है. लेकिन “नए शेखर की जीवनी” की कुछ समीक्षाओं में किस प्रेजुडिस से “शेखर: एक जीवनी” की समीक्षा भी कर दी गयी है, यह समझ से परे है.
दरअसल, अविनाश मिश्र की किताब- साल 2027 तक की डायरी लिए हुए भी- हिन्दी के कवि मुक्तिबोध की लम्बी कविता “अंधेरे में” की याद दिलाती है. मैं इन दो रचनाओं में संतुलन का कोई बिंदु पैदा करने की कोशिश नहीं कर रहा हूं, लेकिन नायक दोनों ही स्थितियों में, कम से कम मेरे लिए, अपने समय, अपने अवसाद और उन सभी के बीच मौजूद तमाम अश्लीलताओं को एक ही बदहवासी में सम्बोधित करने की कोशिश कर रहा है. ये बात अलग है कि मुक्तिबोध भय और संभावनाओं का सामना करते हैं, लेकिन “नया शेखर” बेख़ुदी-टाइप मैटेरीयल है. उसे स्थापनाओं-सम्भावनाओं का क्या करना है, शायद वही जो मूर्खताओं का करना है, शायद वही जो तमाम संदिग्ध संधियों का करना है जो समाज और साहित्य में किसी भी हस्तक्षेप को हीन बना दे रही हैं.
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