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‘तब मुझे अटलजी ने पत्रकारिता की बुनियादी सीख दी’
अटल बिहारी वाजपेयी बहुमत नहीं बल्कि आम सहमति वाले व्यक्ति थे. कहा जा सकता है कि भारत की राजनीति में सहमति बनाने वाले वह पहले राजनेता थे. यह अटल बिहारी वाजपेयी की सहमति बना पाने का अद्भुत कौशल और उनके भीतर मौजूद एक कुशल राजनीतिज्ञ ही था जिसने एक साथ तीन ध्रुवों (जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी) को साध कर अपनी राजनीति को शिखर पर पहुंचाया.
अटलजी के व्यक्तित्व में एक चुंबकीय आकर्षण था. उनके भीतर सहजता और चिंतन था जिसके चलते हमने बार-बार पाया कि लोग अनायास उनकी तरफ खिंचे चले आते थे. भारत में गठबंधन राजनीति को जिस सफलता और सहजता से उन्होंने साधा वह उनके कद के नेता के बूते की ही बात थी.
अगर मैं उनकी तमाम ख़ासियतों में किसी एक पर विशेष रूप से बात करूं तो वह होगा उनका अजातशत्रु भाव. वे किसी से शत्रुता का भाव का नहीं रखते थे. लंबे समय तक उनके निर्वाचन क्षेत्र में काम करते हुए मैंने पाया कि राजनीति में उनके शत्रु नहीं के बराबर थे. लगभग छह दशक लंबे राजनीतिक जीवन के लिए यह विरल उपलब्धि है. आप वैचारिक प्रतिद्वंद्वी हो सकते हैं, दुश्मन नहीं. उनका यही गुण उन्हें इस देश में गठबंधन राजनीति का चैम्पियन बनाता था.
मुझे उनके पाकिस्तान दौरे का एक वाकया याद आता है. वे प्रधानमंत्री थे. जनवरी 2004 में सार्क सब्मिट इस्लामाबाद पाकिस्तान में हुआ था. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुसर्रफ थे. जब हम वहां पहुंचे थे तो पाया कि सड़क के दोनों ओर लोगों की भारी हुजूम मौजूद था. किसी भारतीय राष्ट्राध्यक्ष का पाकिस्तान में ऐसे स्वागत शायद ही कभी हुआ होगा. मैंने मज़ाक में ही अटलजी से कहा, “अगर आप पाकिस्तान से चुनाव लड़े तो भी जीत जाएंगे.” जैसी लोकप्रियता उनकी भारत में थी, उतने ही लोकप्रिय वो पाकिस्तान में भी थे.
उसी पाकिस्तान दौरे पर अटलजी के सामने एक प्रस्ताव आया कि कश्मीर की आंतकवादी गतिविधियों को वे आंतकवाद कहकर संबोधित न करें. आंतकवाद शब्द को हटा दिया जाए. चूंकि पाकिस्तान कश्मीर विवाद को ‘आजादी की लड़ाई’ कहकर संबोधित करता है. तो अटलजी ने आजादी की लड़ाई कहने को लेकर पाकिस्तान दौरे पर प्रश्न उठाया. पाकिस्तान के अधिकारियों की ओर से कहा गया कि वे आजादी की लड़ाई कहकर संबोधित नहीं करेंगे. पर वाजपेयीजी इतने ढृढ़ व्यक्ति थे कि उन्होंने दो टूक कहा, “कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है, हम उसे आंतकवाद ही कहेंगे.”
आज की भाजपा हो या फिर कॉन्ग्रेस दोनों ही पार्टियां सहिष्णुता के पायदान पर बहुत नीचे खड़ी हैं. आप किसी के भी खिलाफ, कुछ भी विपरीत लिख दीजिए तो ये दल शत्रुता पाल लेते हैं. अटलजी की राजनीतिक संस्कृति एकदम ही भिन्न थी. अगर किसी ने उनके खिलाफ कुछ लिखा तो कहते थे, “वाह भई, आज तो ग़ज़ब लिख दिया.”
उन्होंने मुझे भी एक बार पत्रकारिता की सीख दी थी. वह वाकया कुछ इस तरह से मुझे याद आता है. मैं उस समय लखनऊ में जनसत्ता का स्टेट ब्यूरो चीफ था. अटलजी लखनऊ से ही चुनाव लड़ा करते थे. उन दिनों टीवी था नहीं, अखबार ही चलते थे. अटलजी दिल्ली से जो कुछ भी इनपुट दिया करते थे वो अगले दिन उन्हें अखबार में छपा मिला करता था. इसीलिए भी वह मुझे सबसे ज्यादा स्नेह करते थे. उन दिनों मैंने उनके पक्ष में दो-तीन रिपोर्टें लिखीं. पहले और दूसरे पर उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा लिखा.” इससे मुझे काफी हिम्मत मिली. लेकिन तीसरे लेख पर उन्होंने अपने अंदाज में कहा, “भई, दिल्ली में आपका बड़ा रसूख है. आपकी विश्वसनीयता बहुत है. आप पत्रकारिता में अपने विश्वास को बनाये रखिए. हमारे बारे में ज्यादा लिखेंगे तो दूसरा पक्ष आपके प्रति अलग भाव रखेगा.”
लखनऊ प्रवास के दौरान उनकी दिनचर्या बिल्कुल तय होती थी. वह दो बजे खाना खाकर सोते थे. पौने चार बजे के आसपास उठते थे. मैं अक्सर सीधे उनके गेस्ट हाउस ही चला जाता था. बातचीत की उनकी एक दिलचस्प शैली थी, जिसमें वे हमेशा कुछ बातें गूढ़ अंदाज में, इशारों में कहते थे. उन इशारों से ही ख़बर बन जाती थी.
अटल और आडवाणी की दोस्ती भारतीय की राजनीति में किसी दुर्लभ किंवदंति की तरह है. राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में दोनों के रिश्ते उस तरह से गर्मजोशी भरे नहीं रह गए थे. बहुत सारे सवालों पर दोनों के बीच असहमतियां होती थीं. गोधरा दंगों, अयोध्या आंदोलन को लेकर दोनों में गहरी असहमतियां थीं. अटल बिहारी वाजपेयी मंदिर के समर्थक थे लेकिन उस तरह के आंदोलन के पक्ष में नहीं थे.
आडवाणी और अटल के बीच का रिश्ता इस लिहाज से खास था कि दोनों को अपनी मर्यादाओं का अंदाजा था. दोनों ने कभी भी एक दूसरे के प्रति कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की. कोई भी फैसला बिना एक दूसरे की सहमति लिए नहीं होता था.
वह दौर आज की भाजपा के जैसा नहीं था, जिसमें नेता एक दूसरे के खिलाफ अखबारों में लीक करने के खेल में लगे रहते हैं. अटल और आडवाणी एकदम अलग पंरपरा के लोग थे. असहमतियों को पी लेते थे.
वर्तमान भाजपा, अटल-आडवाणी की भाजपा से कई रूप में अलग हो चुकी है. वर्तमान भाजपा में अटल और आडवाणी का कोई योगदान नहीं है. 2009 के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से विदा हो गए थे. आडवाणी अंतिम वक्त तक प्रधानमंत्री बनने को संघर्षरत थे. उन्हें जब नहीं बनाया गया, तो वे दुखी भी हुए. बार-बार अपने गुस्से को प्रकट भी किया. आज के दिन में वे खुद ही अलग-थलग पड़ चुके हैं.
वह युग बदल गया है. दुनिया बदल गई है. तब भाजपा इतनी बड़ी पार्टी नहीं हुआ करती थी. आज वह अपने दम पर लोकसभा में बहुमत वाली पार्टी है. तब भाजपा के 1-1.5 करोड़ सदस्य होते थे. आज भाजपा के 10 करोड़ से ज्यादा सदस्य हैं. पार्टी का पूरा कायांतरण हो चुका है. जब भी पार्टी का नेतृत्व बदलता है, पुरानी पीढ़ी अप्रासंगिक हो जाती है.
अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु को लेकर पिछले दो दिनों से अटकलें लगाई जा रही थीं. इस मौके पर मुझे यह चर्चा गैरजरूरी लगती है. उनकी मृत्यु के समय को किसी तरह छिपाने या देर से बताने की वजह मुझे नहीं दिखती है.
मूल बात यह है कि जिस तरह की लोकप्रियता और लोकसंपर्क अटल बिहारी वाजपेयी का था, वह आज की पीढ़ी में किसी राजनेता के लिए दुर्लभ है.
(रोहिण कुमार से हेमन्त शर्मा की बातचीत पर आधारित)
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