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विस्थापन: किसका विकास? किसलिए और किस कीमत पर?
बिहार के गया जिले में स्थित चमंडीह गांव के लिए मानसून दोहरी मार लेकर आया है. न रहने को छत बची है, न ही खाने को अनाज.
आज दोपहर के दो बजे हैं और मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी है. गांव के पचास से अधिक लोग एक अस्थायी टेंट के नीचे बारिश से बचने के लिए जमे हुए हैं.
गया से पंद्रह किलोमीटर दूर चाकन्द के चमंडीह गांव में बारा पंचायत का महादलित समुदाय विकास और जाति के गठजोड़ का दंश झेल रहा है. भारत के प्रधानमंत्री ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देते हैं लेकिन उन्हीं की सरकार का रेल मंत्रालय उनके नारे की हवा निकालने में लगा है. सुनने में यह अजीब लग सकता है कि विकास का जाति से क्या लेना देना है पर चमंडीह गांव के नट, कुम्हार, भुइंया और दुसाध जातियों के पास इसके अंतहीन अनुभव मौजूद हैं.
चूंकि ये जातियां दलित समुदाय के भीतर भी सबसे शोषित रही हैं इसलिए नीतीश कुमार के नेतृत्व में वर्ष 2007 में इन्हें महादलित घोषित किया गया. सरकार का दावा था कि दलितों के भीतर महादलित कैटेगरी बनाने से उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बेहतरी में सहायता मिलेगी.
लगभग चालीस सालों से ये महादलित जातियां चमंडीह गांव में रह रही हैं. काम की तालाश में इनके बाप-दादा गया जाया करते थे. गया से थोड़ी ही दूर चमंडीह में बसने का कारण यही रहा. आज भी मूलत: यहां के मर्द मजदूरी करते हैं. औरतें सवर्ण जातियों के खेतों में मूंग तोड़ने का काम करती हैं जिसके एवज में उन्हें दिनभर के काम का दसवां हिस्सा मजदूरी के रूप में दिया जाता है. उन्हें कोई पैसे नहीं मिलते.
बीती 22 मई को इस महादलित टोले पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है. पूर्व मध्य रेलवे की ओर से जमीन खाली करने का नोटिस आया है. नोटिस में लिखा है, “आपने रेलवे जमीन चाकन्द को अनाधिकृत रूप से अपने कब्जा में की हुई हैं. आपको सूचित किया जाता है कि पत्र प्राप्ति के 05 दिनों के अंदर अवैध निर्माण को हटा लें अन्यथा उक्त तिथि के बाद किसी भी दिन बिना अग्रिम सूचना के रेल प्रशासन द्वारा अनाधिकृत निर्माण को हटा दिया जाएगा और जो सामान बरामद होगा उसे रेल प्रशासन द्वारा जब्त कर लिया जाएगा एवं अनाधिकृत कब्जा हटाने के क्रम में किसी भी प्रकार की क्षति होने पर रेल प्रशासन उत्तरदायी नहीं होगा. साथ ही साथ अनाधिकृत कब्जा हटाने में जो खर्च होगा उसे भी आप से वसूल किया जायेगा.”
नोटिस में पांच दिन को मोहलत देने के बावजूद पत्र प्राप्ति के तीसरे दिन ही रेलवे के अधिकारियों ने घरों पर बुलडोज़र चलवा दिए. कई मकान ढहा दिए गए और कई चाहरदिवारियों की हालत रहने लायक नहीं बची. रेलवे द्वारा घर तोड़े जाने के बाद इससे करीब 33 परिवारों के कुल 350 सदस्य प्रभावित हुए हैं. लिहाजा घर के मर्द चाकन्द रेलवे स्टेशन पर और महिलाएं टूटे घरों में रात गुजारने को मजबूर हैं.
पूर्व मध्य रेलवे, जहानाबाद के सीनियर सेक्शन इंजीनियर अम्बुज कुमार सिन्हा ने बताया कि चमंडीह गांव की जमीन जहां पर यह महादलित टोला बसा हुआ है, वहां रेलवे का बूथ टर्मिनल बना है. अभी यह टर्मिनल गया में है जिसे चाकन्द शिफ्ट किया जाना है. रेलवे की ओर से मिले नोटिस पर अम्बुज का ही हस्ताक्षर है.
निर्माण गिराए जाने के बाद गिरिधर सपेरा (37) गांव के कुछ लोगों के साथ चंदौती प्रखंड के अंचलाधिकारी, अशोक कुमार और बीडीओ अमित कुमार से मिलने गए. गिरिधर ने बताया, “अंचलाधिकारी (सीओ) की व्यस्तता का हवाला देकर उनके दफ्तर के कर्मचारी ने पत्र ले लिया. वहीं प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) बार-बार कहते रहे कि पुनर्वास का जिम्मा अंचलाधिकारी का होता है. दोनों में से किसी की ओर से भी पत्र की पावती (रिसिविंग) नहीं दी गई. पंद्रह दिन बीत जाने के बाद भी अंचलाधिकारी और बीडीओ के द्वारा पुर्नवास के कदम नहीं उठाए गए.”
प्रशासन के उदासीन रवैये को देखते हुए गांव के लोग बेलागंज विधानसभा क्षेत्र से आरजेडी विधायक सुरेन्द्र यादव से मिलने गए. विधायक ने अंचलाधिकारी को तलब किया और तब जाकर अंचलाधिकारी पहली बार चमंडीह गांव पहुंचे. गांव आकर उन्होंने दस मिनट में जमीनों की नाप ली और चले गए. उसके बाद तकरीबन एक महीना बीत गया लेकिन न अंचलाधिकारी आए और न ही कोई प्रशासकीय मदद लोगों तक पहुंची.
मुन्नी देवी ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “हम लोग यहां चालीस साल से रह रहे हैं. यह जमीन रेलवे की है, यह हमें मालूम भी नहीं था. हमारे बाप-दादा ने यहां घर मकान बना लिए, यहीं शादी-ब्याह, मरना-जीना हुआ है, अब कहां जाएंगें?”
रेलवे द्वारा ढहाए गए मकान
गया के जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने न्यूज़ल़ॉन्ड्री से बातचीत में मामले पर अनभिज्ञता जाहिर की. “हमें इस मामले की जानकारी नहीं है. चूंकि आपके जरिये ही यह मामला मेरे संज्ञान आ रहा है, मैं एसडीएम को इस मामले में देखने कहूंगा,” जिलाधिकारी अभिषेक सिंह ने कहा.
उर्मिला देवी (51) डीएम की बात से रत्ती भर भी इत्तेफाक नहीं रखती. वह कहती हैं, “हम अपने हाथ से डीएम साहब को पत्र दिए हैं. हाथ जोड़कर कहें हैं कि सर, हम लोगों को छत दिलाइए नहीं तो हम लोगों के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.”
इस बीच मानसून की बारिश दक्षिण बिहार में अपने चरम पर है. लोगों ने टूटी हुई छतों को किसी तरह प्लास्टिक से ढका है. रेलवे ने शौचालय में भी कबाड़ फेंक दिया है, लोग अब खुले में शौच करने को मजबूर हैं. रेलवे द्वारा अतिक्रमण ढहाये जाने को दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है और सीओ, बीडीओ और डीएम की ओर से जबावदेही टालने का सिलसिला जारी है. हैरत की बात है कि कोई भी अधिकारी पत्रों की पावती नहीं देता.
पावती क्या होती है टोले के ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम है. प्रशासन के संबद्ध अधिकारी का पत्र पर हस्ताक्षर का मतलब होता है कि मामला प्रशासन की संज्ञान में आ चुका है. लेकिन यहां प्रशासकीय अधिकारियों को मामले की जानकारी होने के बावजूद औपचारिक रूप से अनभिज्ञ रहने का कुशल प्रक्षेपण किया जा रहा है.
सीओ अशोक कुमार ने पुनर्वास का सारा दोष महादलित टोला के लोगों पर डाल दिया. “हमने कई बार अपने अधिकारियों को पुनर्वास की जमीन का मुआयना करने के लिए भेजा है. उक्त पंचायत में जमीन नहीं है इसलिए हमने पुनर्वास के लिए कोरमा पंचायत की जमीन तय की है,” सीओ ने कहा.
पुनर्वास में कितना वक्त लगेगा यह पूछने पर सीओ ने फोन काट दिया. उसने दोबारा बात करने की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं. वहीं बीडीओ अमित कुमार ने कहा, “अगर चमंडीह गांव के प्रभावित परिवार पुनर्वास के दायरे में आएंगे तो नियमानुसार उन्हें अंचल कार्यालय से इसका लाभ प्राप्त होगा.” स्पष्ट था कि बीडीओ अपनी जबावदेही अंचलाधिकारी के माथे पर डाल रहे थे.
चमंडीह महादलित टोला के निवासी सीओ की बात को सिरे से खारिज करते हैं. वह इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि चमंडीह गांव में परती जमीन है.
रेलवे के सेक्शन अफसर, अम्बुज कुमार सिन्हा ने भी पल्ला झाड़ने वाला बयान दिया. “रेलवे की जमीन पर कब्जा भी कर लीजिए और फिर रेलवे को ही बोलिए कि पुनर्वास करवाइए.”
रूणा देवी हाथों से इशारे करते हुए पोखर और कब्रिस्तान की जमीन दिखाती हैं. कहती हैं, “ये सब सरकारी जमीन है. दबंग जाति के लोग इस पर खेती कर रहे हैं. वो नहीं चाहते कि महादलितों को यहां बसाया जाए.”
रूणा देवी की बात से सहमति जताते हुए गिरधर सपेरा नक्शा दिखाते हैं. वह बताते हैं, “चाकन्द स्टेशन के पूर्व में मुर्दाघाटी के अलावा पोखर की 5 एकड़ 37 डिसमिल जमीन है. पश्चिम में भी पोखर की तीन एकड़ जमीन है. यह सब सरकारी जमीन है. यादव जाति के लोग पोखर की जमीन में खेती कर रहे हैं. लेकिन हम भूमिहीनों को कोई एक इंच भी जमीन देने को तैयार नहीं है.”
चमंडीह में महादलित समुदाय के लोग
महादलित समुदाय के लोगों के दबंग जातियां कहने का तात्पर्य सिर्फ सवर्ण जातियों से नहीं है. वे गांव में रहने वाले ओबीसी यादव, कुर्मी जातियों को भी दबंग जातियों में शामिल करते हैं. उनके अनुसार चूंकि महादलित समुदाय के लोगों का रहन सहन अलग हैं, खान पान अलग है और समाज में निम्न काम करते हैं इसलिए ओबीसी जातियां भी उनसे भेदभाव करती हैं.
बहरहाल, जून मध्य में गांव के लोगों ने एक बार फिर से अंचलाधिकारी से गुहार लगाई. इस बार उन्होंने गिरधर को फटकारते हुए कहा कि, “अगर पुनर्वास की ज्यादा जल्दबाजी है तो खुद ही पुनर्वास के लिए कोई जमीन ढूंढ़ लाओ.” मरता क्या न करता, गिरधर ने अंचलाधिकारी की बात मानते हुए अपने गांव के साथ-साथ कई और गांवों में परती जमीन की जानकारी दी. यह मेहनत भी बेकार गई और अंचलाधिकारी ने कोई ध्यान नहीं दिया.
उर्मिला देवी के अनुसार, अंचलाधिकारी इस बात से बिफरे हुए हैं कि गिरधर सपेरा क्यों बार-बार पत्राचार करके मामले तूल देने की कोशिश कर रहा है. “चूंकि गिरधर ही हमारे बीच इकलौता बीए पास लड़का है. वहीं हमें सही-गलत बताता है. यह बात गांव की दबंग जातियों को खलती है कि कैसे सांप पकड़ने वाले नट समुदाय का लड़का पढ़ लिख गया. कैसे उसे इतनी अक्ल आ गई है कि प्रशासकीय पत्राचार को पावती की जरूरत होती है. वह चमंडीह गांव के महादलितों को संगठित रखने की कोशिश करता है, यह बात दबंग जातियों को तनिक भी अच्छी नहीं लगती,” उर्मिला ने कहा.
प्रशासकीय उदासीनता की संभवत: सबसे बड़ी वजह है चमंडीह गांव में इंदिरा आवास योजना के तहत बने घर. कुल 33 घरों में से 10 घरों को केन्द्र सरकार की महत्वकांक्षी इंदिरा आवास योजना के तहत पक्का बनाया गया था.
इंदिरा आवास योजना के तहत मीना देवी (50) को घर बनाने के लिए 48,500 रुपये मिले थे. पहले उनका भी घर बाकियों की तरह ही मिट्टी का था. “कुछ वर्ष पहले ही सरकार की योजना की वजह से उनका परिवार धीरे-धीरे जीवन स्तर को बेहतर करने का प्रयास कर रहा था. हमें क्या मालूम था जिस छप्पर के लिए खेतों में पसीना बहाया था, वह सपना पूरा होगा टूटने के लिए.” 2017 में भी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भी दो घर बनाये गए हैं.
बड़ा प्रश्न यह उठता है कि सरकारी जमीन पर जब ये मकान अनाधिकृत थे फिर इन्हें सरकार की ही इंदिरा आवास योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ कैसे मिला? तब क्यों प्रशासन ने इसकी जांच नहीं की थी? पुनर्वास की जिम्मेदारी किसकी है- रेलवे या बिहार सरकार की?
बहरहाल इन सवालों पर लंबी बहस तलब हो सकती है लेकिन हकीकत यह है कि समाज का सबसे शोषित महादलित वर्ग विकास तले ही रौंदा जा रहा है. रेलवे द्वारा अतिक्रमण हटाने की कोशिश के बाद गांव के महादलितों को जन वितरण प्रणाली के तहत राशन और किरासन तेल मिलना बंद हो गया है. घर के चूल्हे बमुश्किल एक बार जल रहे हैं. चमंडीह गांव के महादलितों ने संघर्ष करने की जगह सामूहिक आत्महत्या का प्रण ले रहे हैं. “ऊंची जाति के नेता, ऊंची जाति के अफसर, कोई नहीं है हमारा सुनने वाला,” कहते हुए रूणा देवी की आंखें भर आती हैं. रूणा की बेटी की शादी 8 जुलाई को तय है और यह सोचकर गश खाती हैं कि बारात कहां ठहरेगी और बेटी की शादी कैसे होगी.
चमंडीह के महादलितों को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी से बहुत उम्मीदें थी. गिरधर बताते हैं, “जब जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया गया था हमें लगा अब हमारे समुदाय का उत्थान होगा. लेकिन उन्होंने भी हमारी कोई मदद नहीं की.”
गिरधर से लेकर मुन्नी देवी तक और रितु पासवान से उर्मिला देवी तक सबने न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में आत्महत्या को ही विकल्प बताया. जहां फौरी मदद की जरूरत है वहां प्रशासन मृत्युशैय्या की नींव तैयार करवाने में जुटा है. विकास के इस मनमतंगी चाल को देखकर हमें निश्चित ही प्रश्न करना चाहिए- किसका विकास? किसलिए और किस कीमत पर?
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