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असम पार्ट-1: नागरिकता की नजरबंदी में मुसलमान
असम के बोगईं गांव जिले में स्थित पटकट्टा गांव के रहने वाले बकरअली भागते-भागते थक चुके हैं. एक स्थानीय संपर्क के ज़रिये उन्हें पता लगा कि मैं उनके ज़िला बरपेटा से गुज़र रही हूं और नेशनल रजिस्टर सिटिज़न (एनआरसी) की ज़मीनी हक़ीकत जानने के लिए उनके जिलले में हूं.
किसी तरह छिपते-छिपाते बकर अली रात में हमसे मिलने पहुंचे. कहीं बैठना मुमकिन नहीं था इसलिए गाड़ी में ही बातचीत शुरू हुई. वह बताते हैं, “साल2015 में मुझे, मेरे भाई और मेरी वालिदा के नाम बॉर्डर पुलिस से नोटिस आया कि हम तीनों बोगईं पुलिस स्टेशन जाकर भारतीय नागरिकता से संबंधित तमाम दस्तावेज जमा करवाएं. जमा करवाने के एक साल बाद फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने ऑर्डर दिया कि मेरा भाई और मां भारतीय नागरिक हैं लेकिन मैं नहीं हूं और दस साल के लिए मेरा नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया.”
फॉरनर्स ट्रिब्यूनल के इस फैसले के बाद उसने गुवाहाटी हाइकोर्ट में अपील की. उसका कहना है कि जब मेरा बड़ा भाई और वालिदा भारतीय हैं तो मैं कैसे भारतीय नागरिक नहीं हूं. गुवाहाटी हाईकोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल का ऑर्डर खारिज करते हुए दोबारा विचार के लिए केस को निचली अदालत में भेज दिया. इस बार बकर अली के परिवार पर और बड़ा वज्रपात हुआ. दोबारा छानबीन के बाद तीनों को ही विदेशी करार दे दिया गया. वजह बताई गई कि वर्ष 1966 की मतदाता सूची में बकरअली अपने दादा का सीरियल नंबर नहीं बता सके.
मतदाता सूची में से नाम कटने के बाद जिले पुलिस अधीक्षक (एसपी) के ऑफिस में एक फॉर्म भरना होता है. उसमें बकरअली को बांग्लादेश का पता लिखने के लिए कहा गया. उसने कहा कि उसे बांग्लादेश के बारे में कुछ नहीं पता है. तब वहां के स्टाफ ने फॉर्म में खुद बांग्लादेश का पता लिख दिया और बकरअली से उस पर ज़बरदस्ती हस्ताक्षर करवाए. यही नहीं फॉर्म में उसकी जन्म तिथि 1985 से बदलकर 1970 कर दी गई ताकि साबित किया जा सके कि वह बांग्लादेशी है.
अब मौजूदा भारतीय नागरिकता कानून के अनुसार बकरअली का सारा परिवार बांग्लादेशी है. उसने अपने भाई, मां, बीवी और दो बच्चों के साथ किसी अनजान गांव में शरण ले रखी है. जमा पूंजी और ज़मीन वकीलों के ऊपर खर्च हो चुकी है. बकरअली बताते हैं कि उनके वकील को कोई जानकारी नहीं कि अदालत, फॉरनर्स ट्रिब्यूनल, पुलिस स्टेशन में कौन सा कागज़ देना है. इन दिनों गिरफ्तारी के डर से बकरअली जगह बदल-बदल कर रह रहे हैं.
बकरअली का मामला असम में इस वक़्त नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न (एनआरसी) के चल रहे काम की ज़मीनी हक़ीक़त है. यहां ऐसे कई लाख बांग्लाभाषी मुसलमान और हिंदु हैं जो दस्तावेज लिए यहां-वहां मारे-मारे फिर रहे हैं. यह साबित करने के लिए कि ये भारतीय नागरिक हैं और हर सूरत में इनका नाम एनआरसी में शामिल हो जाए लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है.
बरपेटा ज़िले के 56 वर्षीय होरी दास को वर्ष 1997 में पता लगा कि मतदाता सूची में उनके नाम के आगे ‘डी’ लगा दिया गया है यानी ‘डाउटफुल’. डाउटफुल होने से मतदान अधिकार छीन लिया जाता है और मतदाता को साबित करना होता है कि वह भारत का नागरिक है. यह साबित होने तक भारतीय नागरिक होने के नाते उसके तमाम अधिकार भी छीन लिए जाते हैं. वह वर्ष 1994-95 में बरपेटा के सोरासर पथार गांव में रहते थे. उसके बाद वह रहने के लिए बालाबिट्टा गांव आ गए. गांव बदलने की वजह से ही उनके नाम के आगे ‘डी’ लगा दिया गया.
नौ महीने के बाद उनके छोटे भाई बुद्धेश्वर दास को भी ‘डी’ वोटर का नोटिस आ गया. दोनों भाई मछली पकड़कर दिन भर में लगभग 300 रुपये कमाते हैं. अभी तक 25,000 रुपया वकीलों को दे चुके हैं. इनका कहना है कि अब या तो हम वकीलों को पैसे देने के लिए कमाएं या परिवार का पेट भरने के लिए. गरीबी और अशिक्षा के चलने दोनों को पता भी नहीं है कि उन्हें कहां जाना है, कैसे जाना है, क्या दस्तावेज देने हैं, दस्तावेज में गड़बड़ी हो तो कौन सही करेगा आदि. स्थानीय पुलिस थाने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट तक जाने की इन लोगों की हैसियत नहीं है. लेकिन रोज़गार, घर, परिवार छोड़कर बांग्लाभाषी लोग इसी में लगे हैं कि इनका नाम एनआरसी में छूट न जाए.
राज्य में अवैध तरीके से रहने वाले लोगों की पहचान कर उनको वापस भेजने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एनआरसी- 1951 को अपडेट करने का काम चल रहा है. इसके तहत 24 मार्च,1971 से पहले बांग्लादेश से यहां आए लोगों को स्थानीय नागरिक माना जाएगा.
बांग्लाभाषी मुसलमानों और हिंदुओं के लिए खासतौर पर भारतीय नागरिकता साबित करनी ज़रूरी है. लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय का आरोप है कि मुसलमानों के साथ और बंगाली भाषी हिंदुओं के साथ जानबूझकर भेदभाव के चलते उन्हें बांग्लादेशी करार दिया जा रहा है. इसके तहत 30 लाख लोगों पर नागरिकता की तलवार लटक रही है.
इस विषय पर फील्ड में काम कर रही जमियत उल्मा ए हिंद (अरशद मदनी) के असम के सदर मुश्ताक अनफर का कहना है कि असमी लोगों को लगता है कि बंगालीभाषी मुसलमानों और हिंदुओं से उनकी अस्मिता को खतरा है. इनकी वजह से कभी न कभी वे लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे.
मुश्ताक अनफर बताते हैं, ‘बिना जांच किए, सोचे समझे मुसलमानों को डी वोटर किया जा रहा है. बड़ी तादाद में मुसलमानों का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए बड़ी साज़िश रची जा रही है. असम में इतनी बड़ी तादाद में हो रहे मानवाधिकार हनन पर कोई मुंह नहीं खोल रहा है. हालांकि एनआरसी अपने आप में सही है, बल्कि इससे मुसलमानों को राहत मिलेगी क्योंकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा लेकिन ग्राउंड पर इस काम को अंजाम राजनीतिक दबाव में दिया जा रहा है.’
असम समेत पूरे भारत में फॉरनर्स एक्ट-1946 लागू है लेकिन सिटिज़नशिप संशोधित एक्ट-1955 का सेक्शन 6-ए, सिर्फ असम के लिए है. इसके तहत पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से 24 मार्च, 1971 के बाद से गैर कानूनी तरीक़े से आए लोगों को वापस जाना होगा. ट्रिब्यूनल ऑर्डर-1964 के तहत असम में फॉरनर्स ट्रिब्यूनल का गठन किया गया है. इस वक़्त यहां 100 फॉरनर्स ट्रिब्यूनल हैं. फॉरनर्स एक्ट के सेक्शन 9 के अनुसार असम में अगर किसी भी नागरिक की नागरिकता पर शक़ है तो उसे खुद साबित करना होगा कि वह भारत का नागरिक है. यह राज्य की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है.
गुवाहाटी हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील मोइज़ूद्दीन महमूद बताते हैं कि कानून ठीक है लेकिन केंद्र और राज्य सरकार की नीयत ठीक नहीं है. पूरी स्टेट मशीनरी असमी अस्मिता के नाम पर बंगाली भाषी मुसलमान और बंगाली भाषी हिंदुओं के खिलाफ काम कर रही है. अदालत में बड़ी तादाद में इस तरह के केस लड़ रहे मोइज़ूद्दीन महमूद बताते हैं कि मुसलमानों और बंगाली हिंदुओं के खिलाफ फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में झूठे सुबूत दिए जा रहे हैं. बॉर्डर पुलिस कहती है कि मैं इस आदमी के घर गया, नागरिकता संबंधी दस्तावेज मांगे लेकिन यह नहीं दे पाया.
पीड़ित कहता है कि मेरे घर पर तो कोई आया ही नहीं. पीड़ित के पास नोटिस जाता है. वह नोटिस के जवाब में नागरिकता संबंधी ज़मीन के, शिक्षा के, दस्तावेज देता है लेकिन तमाम दस्तावेज देने के बावजूद किसी छोटी से स्पेलिंग में गलती बताकर उसे बांग्लादेशी करार दे दिया जाता है. पीड़ित कहता है कि यह दस्तावेज मेरा ही है, संबंधित अधिकारी से बात कर लें, उसे नोटिस दें लेकिन ट्रिब्यूनल का कहना होता है कि यह पीड़ित की ज़िम्मेदारी है कि वह साबित करे कि वह दस्तावेज उसी का है. मामला हाईकोर्ट आता है लेकिन वहां केस डिसमिस कर दिया जाता है.
असम के जनांककीय आंकड़े
इस वक्त फॉरनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार असम में 34 फीसदी मुसलमान आबादी है और 1951 में यह 24 फीसदी थी. असमी भाषा बोलने वाले 48.3 फीसदी हैं और बांग्ला बोलने वाले 24 फीसदी हैं. असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर अब्दुल मन्नान कहते हैं असम में 57 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब हैं. वे लोग अशिक्षित और गरीब हैं इसलिए साल दर साल उनकी जनसंख्या बढ़ रही है न कि बांग्लादेश से मुसलमानों के आने की वजह से.
(इस ग्राउंड रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में पढ़िए एनआरसी के सर्वेक्षण की लचर प्रक्रिया और उसकी खामियां)
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