Newslaundry Hindi
नागपुर के कारखाने में बनती भविष्य की कुछ आकृतियां
आरएसएस की अपनी नब्बे साल पुरानी साख है. उसे गांव देहात में मुस्लिम विरोधी कनफुंकवा संगठन कहा जाता है. उसे पुराने कांग्रेसी प्रणब मुखर्जी या किसी और सेकुलर से सामाजिक वैधता लेने की जरुरत क्यों होनी चाहिए. जबकि उसने खुद के बनाए लोकप्रिय हिंदू नेता, नरेंद्र मोदी की एकाधिकारी सत्ता के संरक्षण में पिछले चार साल के दौरान अपने पुरातन स्वप्न, भारत को लुंजपुंज लोकतंत्र से हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में लंबी दूरी तय की है.
इस दौरान आरएसएस से जुड़े आनुषांगिक संगठनों ने लाखों नए बेरोजगार युवाओं के दिमागों का भगवाकरण करके उन्हें मुसलमानों और दलितों का आखेट करने के लिए सड़कों पर उतारा, अल्पसंख्यकों के मन में उग्र हिंदुत्व का भय पैदा किया, सेकुलरों का गालियों से मनोबल तोड़ने वाले ट्रोल्स की सेना खड़ी की, गौमूत्र-सेना-वंदेमातरम को विकास और रोजगार से महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में स्थापित किया. इन सबसे उत्साहित संघ ने संविधान को बदलकर और आरक्षण की समीक्षा कर अपने अनुकूल बनाने का उद्घोष करने का आत्मविश्वास अर्जित किया है.
भ्रम का ऐसा अखिल भारतीय वातावरण रचने में सफलता मिली है जिसमें न्यायपालिका समेत हर संस्था, हर मीडिया हाउस, हर व्यक्तित्व, हर वीडियो, हर सूचना इस तरह संदिग्ध है कि एक बड़ी अफवाह मनचाहा नतीजा दे सकती है.
लगातार सबल और विशाल होता आरएसएस दो दिन भी न टिकने वाली तथाकथित वैधता के लिए अपनी ही उपलब्धियों पर पानी क्यों फेर देगा?
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संवैधानिक राष्ट्रवाद और सहिष्णुता का जो कर्णप्रिय राग गाया उसे झुठलाने के लिए वे नौ शब्द (माय रेस्पेक्टेड होमेज टू ए ग्रेट सन आफ मदर इंडिया) ही काफी हैं जो उन्होंने आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार के लिए उनके घर पर रखी विजिटर्स बुक में लिखे. यह उनके और आरएसएस-भाजपा के बीच नयी बनी समझदारी का घोषणापत्र है जिसका निहितार्थ यह है कि वे प्रधानमंत्री बनने के अपने पुराने टूटे सपने को पूरा करने के लिए गैर कांग्रेसवाद की राजनीति करने के लिए तैयार हैं. इस अवसर को कांग्रेस के अपरिपक्व नेतृत्व की बेकली और आशंकाओं ने भव्य बना दिया. इसके कारण प्रणब मुखर्जी का भाषण उतनी दूर तक गया जितनी दूर तक राष्ट्रपति रहते उनका राष्ट्र के नाम कोई संबोधन भी कभी नहीं पहुंच पाया था.
बोनस के रूप में आरएसएस की बदलती भूमिका और तैयारियों का विज्ञापन भी इस तरह हुआ जिसकी खुद उसे उम्मीद नहीं थी. आरएसएस को अपने उग्र हिंदुत्व से भभकते चेहरे पर धैर्य, संवाद और अनेकता में एकता का चंदन भाजपा सरकार की बुरी तरह विफलता, मोदी-शाह की तेजी से अलोकप्रिय होती जोड़ी और अगले अगले आम चुनाव में फिर से सत्ता पाने की धुंधली पड़ती उम्मीद के कारण लेपना पड़ा है.
आरएसएस मोदी-शाह की जोड़ी को वापस गुजरात भेज देगा लेकिन अगली सरकार पर नियंत्रण रखने के विचार को आजमाना चाहता है. हो सकता है कि अगले आम चुनाव में भाजपा अपने उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस, जद (यू), बीजू जनता दल, शिवसेना, तेलुगु देशम पार्टी, टीआरएस, अन्नाडीएमके के साथ गठबंधन करते हुए इस समझदारी के साथ उतारे कि परिणाम आने के बाद जरूरी बहुमत का जुगाड़ कर, सरकार बनाने का मौका प्रणब मुखर्जी को नेता मानने वाले क्षेत्रीय दलों के गठबंधन को दिया जाएगा और भाजपा बाहर से समर्थन करेगी.
यहां प्रणब मुखर्जी को बिना पार्टी का नेता समझने की गलती करने के बजाय उन्हें ममता बनर्जी से संबंधों के कारण तृणमूल का नेता समझा जाना चाहिए. ऐसी स्थिति में कांग्रेस के कल ही सहयोगी क्षेत्रीय दलों में से भी कुछ को अपने साथ खींचने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
उस समय प्रणब मुखर्जी का सेकुलर और उग्र हिंदुत्व दोनों को एक सांस में साधने का दुर्लभ कौशल काम आएगा जो कल नागपुर में दिखाई दिया.
चोला बदलने का दूसरा मकसद कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के गठबंधन की सरकार बनने की स्थिति में अपना बचाव करने का है. बीते चार सालों में आरएसएस ने अपने आनुषांगिक और मौके के हिसाब से बनने-बिगड़ने वाले संगठनों के जरिए जितना उत्पात मचाया है उतना पहले की किसी भाजपा सरकार में संभव नहीं हो पाया था. भीड़ द्वारा हत्याएं कराने से लेकर अपने विरोधियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर सरकारी एजेंसियों का शिकार बनाने और अंधभक्ति के अभियान बेरोक-टोक संचालित किए गए हैं. स्वाभाविक है कि इसकी प्रतिक्रिया हो और कांग्रेस इन सांसत भरे चार सालों के अनुभव से सबक लेकर मोदी सरकार की ही तरह अपने विरोधियों के आर्थिक स्रोतों को बंद करे, आईबी, सीबीआई, इनकम टैक्स, ईडी, पुलिस के जरिए पुराने मामलों को खोल कर सबक सिखाए.
आरएसएस ने उस संभावना के मद्देनजर अभी से एक निर्णायक कदम उठा लिया है जिसके जरिये तब जोर-शोर से आलाप लिया जा सकता है कि आरएसएस तो भारतवासियों की सेवा करने वाला एक सांस्कृतिक संगठन है, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है और यकीन विभिन्न विचारधाराओं के बीच टकराव नहीं संवाद में है.
अगर किसी चमत्कार से मोदी ही सत्ता में वापस आते हैं तो आरएसएस को पल्टी मारने में बहुत कम समय लगेगा. प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न देकर धन्यवाद ज्ञापित कर दिया जाएगा और हिंदुत्व की परियोजना का रुका काम फिर से चालू हो जाएगा. संघ के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी खास परिस्थिती में मंच से क्या कहा गया, महत्वपूर्ण अपने लक्ष्यों के लिए उसकी व्याख्या और उस व्याख्या को तार्किक ढंग से जनता के मन में बिठाना है जिसमें उसकी दक्षता का कोई मुकाबला नहीं है. उसके लिए नरेंद्र मोदी हों या प्रणब मुखर्जी, दोनों मोहरे हैं.
Also Read
-
Awadh ground report: UP’s swing voters speak, from Mohanlalganj to Ayodhya
-
What this Diwali should teach the Indian retail investor
-
From Sittilingi to Sijimali: The doctor Odisha police arrested over anti-mining agitation
-
How a trust close to BJP got five elephants from Assam for Tamil Nadu temples
-
After Uttarakhand, it’s MP: CM Yadav spent Rs 230 cr to sell a Rs 30 lakh cr ‘MoU’ mirage