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जॉर्ज फर्नांडिज़: कौन सितारे छू सकता है, राह में सांस उखड़ जाती है
जितना त्रासद, मार्मिक एवं दुखद जॉर्ज़ फर्नांडिज़ का जीवन के उत्तरार्ध में अवाक और अचेत हो जाना है, उतना ही उनके द्वारा संघियों से समझौता करना भी पीड़ादायक है. फौलाद से बना वह श्रमजीवी हाथ आडवाणी के रक्तरंजित हाथों से कैसे मिलता होगा, यह मेरे लिए रहस्य है. इंदिरा गांधी जैसी लौह महिला को भी कंपकंपी छुड़ा देने वाले जॉर्ज़ में ही वह इच्छा और शक्ति थी कि इस कठिन समय मे वह उद्दण्ड हो चुके संघियों की ताड़ना कर सकते थे.
जब पहली बार, लगभग 25 साल पहले वह अपने मस्तिष्क का ऑपरेशन कराने लन्दन अथवा अमेरिका गए थे, उसी दौरान मेरे साथ देहरादून से लखनऊ तक की रेल यात्रा में रेलवे का एक जूनियर अफसर यात्रा कर रहा था. वह भी कभी रेल श्रमिक रह चुका था. उसने बताया- रेलवे की कांग्रेसी तथा संघी मज़दूर यूनियनों के गुंडों ने जॉर्ज़ के सर पर कई बार लोहे की छड़ों से प्रहार किया है. इन यूनियनों के गुंडे उन्हें मृत मान कर, पीटपाट कर भाग जाते थे. जॉर्ज़ को मस्तिष्क आघात इन्हीं चोटों के कारण हुआ है.
जॉर्ज़ को मैंने निकट से तब देखा, जब वह टिहरी बांध विरोधी आंदोलन में मेरे पिता को समर्थन देने ठेठ टिहरी आये थे. एक अम्बेसडर कार में लगभग 7 लोग ठुंसे थे, और एक के ऊपर एक बैठे थे. इनमें सभी संसद अथवा पूर्व सांसद थे. जॉर्ज़ का कुर्ता पसीने से तर था. उनकी तांबे जैसी देह से धान को पकाने वाली जून की गर्मी के जैसा भभका उठता था.
जॉर्ज़ टिहरी बांध विरोधी आंदोलन को समर्थन देने टिहरी आए तो हमारे टिन शेड के झोंपड़े में नींबू पानी पिया, और भोजन के लिए मना कर दिया. वापसी में चम्बा नामक एक कस्बे में उन्हें बांध समर्थक ठेकेदार के गुंडों ने घेर लिया. इन भाड़े के गुंडों की धमकी से डर कर विश्व हिंदु परिषद के नेता अशोक सिंघल ने अपना रास्ता बदल लिया था, और वे 100 किलोमीटर से अधिक का चक्कर लगा कर देवप्रयाग के रस्ते टिहरी पंहुचे.
इधर बांध समर्थक हिंसक गुंडों से घिरे जॉर्ज़ ने कहा- “तुम मेरे पुतले तो क्या, खुद मुझे ही जला लो, पर मैं टिहरी बांध जैसी मनुष्य एवं प्रकृति विरोधी परियोजनाओं का विरोध करता रहूंगा.”
जॉर्ज़ की पत्नी लैला कबीर का जिक्र यहां जरूरी है, जो उनका शंकर जैसा फटेहाल रूप देख वर्षों पहले उन्हें छोड़ कर विदेश चली गयी थी. वो वापस चार-पांच साल पहले ही लौटी हैं. जीवन भर अपना कुर्ता साबुन से खुद धोने वाले जॉर्ज़ के आखिरी चुनावी घोषणा के मुताबिक उनके एकाउंट में 17 करोड़ थे. यह संपत्ति कहां से आई, यह रोचक कथा आगे आएगी.
जॉर्ज़ के पिता उन्हें पादरी बनाना चाहते थे, पर होश संभालने के बाद जॉर्ज़ शायद एक ही बार चर्च गए. हुआ यूं कि कुछ वर्ष पहले उनकी पत्नी उन्हें ‘इलाज़’ के लिए रामदेव के ठिकाने यानी हरिद्वार ले आईं. जॉर्ज़ अपनी सुध-बुध में होते तो किसी की ऐसा करने की हिम्मत कभी न होती, पर नियति की मार.
इसी मौके पर वहां उत्तराखण्ड की तत्कालीन गवर्नर मार्गरेट अल्वा जा पंहुची. अल्वा ने अपने समधर्मी (ईसाई) जॉर्ज़ को सुझाव दिया- आपकी सेहत के लिए गॉड से प्रार्थना करने चर्च चलते हैं. बदहवास जॉर्ज़ ने मासूमियत से कहा- लेकिन यह मेरा पार्लियामेंट जाने का वक़्त है. तब उनके ड्राइवर ने उनकी संसद के कागजात वाला ब्रीफ केस ला कर उन्हें कार में बिठाया और एक चक्कर काटकर कार का दरवाज़ा खोलकर बोला- उतरिये, हम पार्लियामेंट से हो आये हैं. तब जॉर्ज़, अल्वा के साथ चुपचाप चर्च चले गए. यह सब देख मेरी आंखों मे आंसू आ गए.
पादरी अर्थात धर्मगुरु की ट्रेनिंग छोड़ जॉर्ज फर्नांडिज़ ने मुंबई में एक श्रमिक और फिर श्रमिक नेता के रूप में अपनी स्वतंत्र राह चुन ली. उनके असामान्य भाव को देख उनकी मां ने सोचा, मेरे अन्य पुत्र तो कहीं न कहीं मेहनत मजदूरी कर अपना पेट पाल रहे हैं, लेकिन इस बेटे (जॉर्ज़) ने नौकरी भी छोड़ दी है, और इसके शादी करने के भी आसार नहीं दिख रहे. इसका बुढ़ापे में फजीता न हो, यह सोच जॉर्ज़ की मां ने उनके लिए बंगलुरू में कुछ हज़ार रुपये की अपनी बचत से उनके नाम एक छोटा सा भूखण्ड खरीद लिया.
21वीं शताब्दी के प्रारम्भ में जब बंगलुरू एक अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी शहर के रूप में विस्तार लेने लगा, तो सरकार ने बाजार भाव से कई गुना अधिक मूल्य देकर निजी भूमि की खरीद-फरोख्त शुरू की. काफी मशक्कत के बाद भी प्रशासनिक अमले को उक्त लघु भूखण्ड का कोई दावेदार नहीं मिल रहा था. तब दस्तावेज खंगाले गए. यह भूमि जॉर्ज फर्नांडिज़ के नाम निकली. उन्हें सूचित किया गया, और उनके खाते में इसका मूल्य 17 करोड़ रुपए जमा करा दिया गया. इसी संपत्ति का जिक्र ऊपर आया है.
अगले चुनावों में उनके दलगत साथियों, नीतीश और शरद यादव, ने जॉर्ज़ का टिकट काटा, तो वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में खम ठोंक गए. पर्चा भरते समय उन्होंने अपनी जमा सम्पति 17 करोड़ दर्शायी. सब ओर से उन पर बौछारें होने लगीं. लेकिन तब तक जॉर्ज़ आलोचनाओं का उत्तर देने लायक नहीं बचे थे.
उपसंहार एक प्रकरण से करना चाहूंगा. नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल में एसवी चव्हाण उनके गृहमंत्री थे. उनका बंगला दिल्ली में जॉर्ज के बंगले के ठीक सामने पड़ता था. जब भी गृहमंत्री आते जाते, तो उनके सुरक्षाकर्मी जॉर्ज के बंगले का गेट बाहर से बन्द कर जाते, क्योंकि जॉर्ज़ के घर कई तरह के कथित हाली-मवालियों का आना जाना था. इनमें कश्मीर, पंजाब और उत्तर पूर्व के ‘उग्रवादी’ भी होते थे, और नक्सली भी.
ये सब अपनी समस्याएं लेकर जॉर्ज़ के पास आते-जाते थे. गृहमंत्री की सुरक्षा की चौकसी से जॉर्ज और उनके साथियों को दिन में बार-बार अपने ही घर मे क़ैद कर दिया जाता था. इससे अघा कर एक दोपहरी में जॉर्ज ने गैंती, सबल और हथौड़ा मंगाया और अपना गेट उखाड़ फेंका. लोहा काटने में वह सिद्ध थे ही.
बंगले का गेट उखाड़ फेंकने के बाद वह सीधे संसद भवन गए. लोकसभा में उन्होंने कहा, “आखिर यह गृहमंत्री देश की आंतरिक सुरक्षा कैसे करेगा जो अपने पड़ोसी सांसद से इतना डरता है कि घर आते जाते उसे बाहर से कैद करवा देता है.”
इस घटना के कुछ साल बाद जॉर्ज खुद केंद्रीय मंत्री बने, पर उनके बंगले पर फिर कोई गेट नहीं लगा. सुरक्षाकर्मी तो उन्होंने कभी रखे ही नहीं. आज वही मुक्तिकामी कहां और किस हाल में है, कोई नहीं जानता.
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