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राजकिशोर: हिंदी पत्रकारिता के विचारपुरुष का जाना
आप पिछले 20-25 सालों में हिंदी का कोई भी अख़बार पलट कर देखते तो आपको राजकिशोर अमूमन संपादकीय और ऑप-एड पेज पर कहीं न कहीं अपने नाम और बॉक्स में स्टाम्प साइज तस्वीर के साथ दिखाई पड़ जाते. फिर ये अखबार पश्चिम बंगाल या फिर राजस्थान से ही क्यों न निकलता हो. इतना नियमित तौर पर लिखने के लिए जो अनुशासन और प्रतिबद्धता थी वो राजकिशोर सरीखे में ही हो सकती थी.
मेरी और मेरी आस-पास की पीढ़ी उनका लिखा हुआ पढ़ते हुए बड़ी हुई है. वो एक तरह से हमारे जैसे छोटे शहर के लोगों के लिए दूरस्थ शिक्षा केंद्र जैसे थे. जो डेढ़ से दो रुपये में हिंदी का अख़बार खरीद कर दुनिया भर के मसलों पर उनकी दृष्टि से लाभान्वित होती थी. मुझे यकीन है कि अभी भी हिंदी क्षेत्र के किशोर-युवा वर्ग के सुधी पाठक उन्हें पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव करते होते होंगे.
राजकिशोर पत्रकारिता की उस दुनिया का हिस्सा थे जिसे विचारों की पत्रकारिता कहते हैं. उनके दौर में मीडिया का काम सिर्फ ख़बर देना नहीं होता था बल्कि वैचारिक पक्ष पर भी खासा जोर होता था. वो हर दौर में एक प्रतिबद्ध समाजवादी चेतना के पत्रकार बने रहे. बेशक बोलने, लिखने और सुनने के इस मौजूदा असहिष्णु दौर में भी. लेखनी में तार्किक संतुलन के साथ विचारों के प्रति इतना आग्रह विरले ही पत्रकारों में बचा रह गया था. उन्होंने कलकत्ता से निकलने वाले साप्ताहिक रविवार से अपने करियर की शुरुआत की थी. इसके बाद वो दिल्ली में नवभारत टाइम्स की संपादकीय टीम के हिस्सा रहे. ‘दूसरा शनिवार’ नाम की पत्रिका का भी संपादन किया.
वर्तमान में महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की ई-पत्रिका हिंदी समय डॉट कॉम का संपादन करने से ठीक पहले वो इंदौर से निकलने वाली पत्रिका रविवार डाइजेस्ट का संपादन भी कर चुके थे. राजकिशोर के व्यक्तित्व का साहित्यिक पक्ष भी था. वो एक संपादक के साथ-साथ बेहतरीन साहित्यकार भी थे. उन्होंने साहित्य की तमाम विधाओं में लिखा है फिर चाहे वो गद्य, कविता या व्यंग्य ही क्यों न हो. उन्होंने तुम्हारा सुख और सुनंदा की डायरी जैसे दो उपन्यास लिखे तो पाप के दिन शीर्षक से एक कविता संग्रह भी लिखा था.
उन्हें उनके वैचारिक लेखन, पत्रकारिय लेखन और साहित्यिक लेखन के लिए लोहिया सम्मान, साहित्यिकार सम्मान और राजेंद्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार से नवाजा गया था. उन्होंने कभी भी पत्रकारिता में निष्पक्षता के नाम पर वैचारिक पैनेपन से समझौता नहीं किया. उनकी पक्षधरता खुल कर थी. इसे वो छुपाने की कोशिश नहीं करते थे. इसीलिए वो खुलकर बेबाक लिखते थे. इसके बावजूद उनकी गद्य शैली में एक लय थी जो उनके लेखन के दार्शनिक पक्ष को भी बड़ी सरलता से सामने लाने में मदद करती थी.
शायद ये बात कम लोगों को पता हो कि ओमप्रकाश वाल्मीकि के उल्लेखनीय उपन्यास जूठन के प्रेरक राजकिशोर ही थे. गांधी और लोहिया के दर्शन का उन पर व्यापक प्रभाव था. इसके बावजूद वो ताउम्र मार्क्सवाद के प्रशंसक बने रहे लेकिन मार्क्सवादियों के आलोचक. हाल ही में उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था, “कुछ घरों की मोमबत्तियां बुझ जाएं, इससे अग्नि का आविष्कार व्यर्थ नहीं हो जाता. मार्क्सवाद में आग है. इसलिए यह आज भी रोशनी दे रहा है और आगे भी देता रहेगा. दरअसल मार्क्सवाद सिद्धांत से आगे बढ़कर व्यवहार में भी सिद्ध हो, इसके लिए एक सर्वथा नई किस्म का आदमी चाहिए. दो-चार या दस-बीस नहीं, लाखों, करोड़ों लोग. यह एक वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण का सपना है. वर्तमान सभ्यता की उम्र तीन से चार हजार साल है. मार्क्सवाद को तीन से चार सौ साल भी नहीं दिए जा सकते?”
जाति, सांप्रदायिकता और स्त्री सवाल पर वो काफी मुखर थे. उनके कुछ प्रमुख वैचारिक लेखन मसलन एक अहिंदू का घोषणापत्र, जाति कौन तोड़ेगा, गांधी बनाम गांधी, गांधी मेरे भीतर, गांधी की भूमि से, धर्म, संप्रदाय और राजनीति और स्त्रीत्व का उत्सव पर नजर डाले तो इसे आसानी से समझा जा सकता है.
वो जाति, सांप्रदायिकता और स्त्री के सवालों पर कई बार बहुत मौलिक तरीके से सोचते थे. जाति कौन तोड़ेगा में वो एक जगह लिखते हैं, “अब ब्राह्मणवाद और मनुवाद की निंदा की जाती है, सामाजिक न्याय की बात की जाती है, आरक्षण की बात की जाती है, लेकिन जातिविहीन समाज की बात नहीं की जाती. दिलचस्प यह है कि यह बात न तो साम्यवादी करते हैं, जो सिद्धांतत: सभी प्रकार के सामाजिक और आर्थिक वर्गों के विरुद्ध हैं और न भाजपा के नेता, जो हिंदू एकता की कामना करते हैं. अगर जातियां जड़ीभूत वर्ग हैं, तो फिर वर्ग संघर्ष का एक रूप जाति व्यवस्था के विरुद्ध निरंतर संघर्ष क्यों नहीं होना चाहिए?”
स्त्रियों के सवाल पर उन्होंने एक बार लिखा था, “स्त्री-पुरुष का जोड़ा स्वाभाविक जोड़ा नहीं है. यह मेटिंग के लिए है. मेटिंग को केंद्र बनाकर जो समाज बनेगा वह स्वस्थ नहीं हो सकता.”
एक बार लोकतंत्र, क्रांति का नारा और व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पर उनसे बात करते हुए मैंने पाया कि वो कितनी गहराई से चीजें को देखते हैं और सबसे खास बात उनकी इस दृष्टि में एक ताजगी थी. वो कहीं से उठाई हुई नहीं लगती थी. उनकी बातें मुझे उस वक्त थोड़ी कम समझ में आईं. वक्त के साथ ज्यादा समझ में आई. वो असहमति को लेकर पूरी तरह से लोकतांत्रिक प्रवृति के थे. असहमति के लिए हमेशा उनके पास जगह होती थी. किसी भी तरह की असहमति पर वो तेज प्रतिवाद करते हुए नजर नहीं आते थे.
वो मानते थे कि वो मूलत: राजनीतिक मिजाज के हैं. उन्होंने अपने बारे में एक जगह परिचय में लिखा था कि राजनीति में जाना था. आ गया पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में. अब फिर राजनीति में लौटना चाहता हूं लेकिन परंपरागत राजनीति में नहीं.
ऐसा लगता था जैसे उन्हें अपने आखिरी वक्त की आहट सुनाई पड़ गई हो. कुछ दिनों से वो नई राजनीति शुरू करने की बात करने लगे थे और लगता है उसके अंदर ही अपनी अधूरी ख्वाहिश को पूरा करने का सपना देख रहे थे. अब राजकिशोर नहीं हैं. हिंदी पत्रकारिता में वैचारिक लेखन ऐसे ही कमजोर हो चला है और कुछ गिने-चुने ही पत्रकार-लेखक ऐसे बचे रह गए हैं जो वैचारिक लेखन को भी तरजीह देते हो. अब उनके नहीं रहने से रही-सही कसर भी पूरी हो जाएगी. राजकिशोर जैसों के नहीं रहने से हिंदी पत्रकारिता सिर्फ ख़बरों का ढेर ही बनकर रह जाने वाली है.
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