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कैराना: धुंधली पड़ती जा रही लकीर को फिर से खींचकर गाढ़ा कर दिया है जयंत ने
कैराना उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव रिलैक्स हुए और आनन-फानन में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. लेकिन पहला ही सवाल जो उनसे किया गया वो था- “क्या कैराना में जीत को ‘जाम‘ (जाट और मुसलमान) की जीत बोल सकते हैं?”
अखिलेश भले ही इस सवाल को टाल गए और बताया कि इसे हिन्दू मुस्लिम में न बांटो क्योंकि किसान, मजदूर और गरीब हर धर्म में होते हैं, इसीलिए ये जीत उनकी हैं न कि किसी धर्म की.
लेकिन उसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया चौधरी अजीत सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी अच्छी तरह से जानते और मानते भी हैं कि ये जीत वास्तव में जाट और मुसलमानों के पास आने से मिली हैं.
पश्चिमी उत्त्तर प्रदेश में के जाट वोटरों के बारे में एक कहावत है. हर चुनाव से पहले रात को स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जाटों के सपने में आते हैं. एक ही बात होती है- क्या छोटे चौधरी को हरा दोगे. उसके बाद अगले दिन जाट लाइन लगा कर चौधरी अजित सिंह को वोट दे देते थे, और वो जीत जाते थे.
धीरे-धीरे ये बात कम होने लगी. चौधरी चरण सिंह के ज़माने के जाट या तो बूढ़े हो गए या फिर उनकी पकड़ अपनी युवा पीढ़ी पर कम होती गयी. नतीजा सामने था- चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोक दल पार्टी इस समय प्रदेश की विधानसभा और लोकसभा या यूं कहें हर सदन से गायब हो गयी.
हालात साल 2013 के बाद से ज्यादा बिगड़े. मुज़फ्फरनगर में जाट-मुस्लिम संघर्ष हुआ और एक ऐसी खाई बन गयी जिसे पाट पाना नामुमकिन सा दिखने लगा. इसका फायदा बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी को मिला. 2017 में एक तरफ से भाजपा पश्चिम की 36 में से 24 विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब हुई.
लेकिन कैराना में हुए उपचुनाव में रालोद और चौधरी चरण सिंह की विरासत को एक बार फिर संजीवनी मिल गयी हैं. रालोद की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने भारतीय जनता पार्टी की मृगांका सिंह को 44,618 वोट से हरा दिया. ये उपचुनाव मृगांका सिंह के पिता स्वर्गीय हुकुम सिंह के देहांत के बाद हुआ हैं.
मुज़फ्फरनगर दंगो में सबमे अधिक नुकसान रालोद को उठाना पड़ा था. उसका जाट-मुस्लिम समीकरण ध्वस्त हो गया था. कहीं से वो जीतने की स्थिति में नहीं था. राजनितिक महत्त्व कम होने से चौधरी अजीत सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी भी हाशिये पर पहुंच गए थे.
फिर कैराना उपचुनाव ने जैसे चौधरी अजित सिंह को डूबते को तिनके का सहारा दे दिया. उन्होंने हालात को समझ लिया था. इसीलिए उन्होंने कोशिश कई महीने पहले शुरू कर दी थी. गांव-गांव जाकर जाटों के बीच सुलह-सफाई का दौर शुरू किया. जाट-मुस्लिम एकता सम्मलेन किये. दोनों को गले लगवाया. दंगो के ज़ख्म भरने की कोशिश शुरू की.
ये काम देखने में भले ही छोटा लगे लेकिन जो दो समुदाय एक दुसरे से दूर चले गए थे वो एक बार फिर से पास आने लगे. ऐसा नहीं हैं कि ये आसान था. बल्कि कई जगह जाटो ने चौधरी अजीत सिंह को खूब खरी-खोटी भी सुनाई और दिल का गुबार निकाला. लेकिन बर्फ पिघली.
जयंत चौधरी की मौजूदगी ने भी असर डाला. जाट युवकों का वो तबका जो मॉडर्न और दंगो की वजह से दूसरे खेमे में चला गया था वो भी उनसे जुडा. कुलदीप उज्ज्वल, सपा के जाट नेता जो 2017 का चुनाव भी लड़े हैं, बताते हैं, “देखिये वोट देना दूर की बात हैं. उस समय जाट और मुस्लिम एक दुसरे की तरफ देखना भी नहीं पसंद करते थे. लेकिन चौधरी अजीत सिंह की एकता बैठकों ने बखूबी काम किया.”
अजीत सिंह दंगा प्रभावित गांव भी गए. कोई बड़ी रैली नहीं की, बल्कि लोगों से सीधे संवाद किया. अपने रूठों को मनाया और बिखरे हुए वोटबैंक को समेटा. अपनी बैठकों में चौधरी अजीत सिंह कहते थे- “जहां से भाजपा को बढ़त मिली है, मैं वहीँ उसे ध्वस्त कर दूंगा.”
उम्र के इस पड़ाव पर चौधरी अजीत सिंह को सहारा उनके पुत्र जयंत चौधरी ने दिया. उन्होंने जाट और मुसलमानों की बैठके कीं. हर जगह सुनने को मिला-“चौधरी, तुमने आने में देर कर दी.” लेकिन अजीत सिंह ने दोनों खेमों को मनाया, चौधरी चरण सिंह की विरासत समझाई, खेती किसानी से जुड़े मुद्दे उठाये जैसे गन्ने की फसल का भुगतान इत्यादि.
नीरज बालियान, युवा जाट हैं और अपने समाज में काफी काम कर रहे हैं. उनका मानना हैं, “ये वोट चौधरी अजीत सिंह को देख कर दिया गया. जाटों का 80% वोट मुस्लिम कैंडिडेट को गया. कई ऐसे गांव हैं जहां 500 वोट थे और सब के सब मिले. लेकिन ये कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जाट-मुस्लिम एकता हो गयी हैं. जाटों ने वोट दे दिया हैं, अब मुसलमानों को दिल बड़ा करना होगा और कोई जाट कैंडिडेट आता हैं तो उसे वोट देना होगा.”
एक स्थानीय सपा नेता के मुताबिक ये बात जाटो को समझाई गयी कि अपना राजनीतिक वजूद न ख़त्म करो. जो जाट नेता भाजपा के सहयोग से संसद, विधायक और मंत्री तक बन गए हैं वो भाजपा के एजेंडे पर काम करेंगे, जाट समुदाय के लिए नहीं. मुसलमान के छिटकने से अब खुद जिताने और हराने वाली स्थिति में जाट भी न रह पाएंगे. कहां नेता आप खुद होते थे अपनी पार्टी से और अब नेता हो लेकिन दूसरी पार्टी से. ये बात जाटों को समझ में आने लगी. इसी बीच तबस्सुम हसन के बेटे नाहिद हसन जो कि कैराना से सपा विधायक हैं, उन्होंने अपना एक वीडियो बयान जारी किया. उन्होंने कहा- “कुछ लोग कह रहे हैं कि तबस्सुम हसन के जीतने से दिवाली पाकिस्तान में मनेंगी, लेकिन मैं कह रहा हूं, उनके जीतने से दिवाली चौधरियों के घर मनेगी, चौधरी अजीत सिंह की मनेगी.”
राजनीतिक कौशल
इस उपचुनाव को चौधरी अजीत सिंह और जयंत चौधरी ने अपने अस्तित्व का सवाल बना लिया. जहां शुरू में गठबंधन (सपा-बसपा) भी उनकी तरफ बहुत लालायित नहीं था लेकिन उन्होंने रालोद की स्थिति को मजबूती से रखा. कमान अब जयंत के हाथों में थी. उन्होंने सबसे पहले अखिलेश यादव से मुलाकात की. इस मुलाकात में जयंत ने कहा- कैंडिडेट तुम्हारा, सिंबल हमारा. दोनों पक्ष इस बात पर राज़ी हो गए.
इस तरह तबस्सुम हसन रातो-रात रालोद कैंडिडेट बन गईं. एक मुसलमान को लड़ाना बहुत मुश्किल था क्योंकि जाटों से मांग थी कि जयंत को लड़ाया जाय. लेकिन चौधरी अजीत सिंह टिके रहे क्योंकि इस बार उनको दो समुदाय को जोड़ना था न कि परिवार में सांसदी लाना.
बात यहीं पर ख़त्म नहीं हुई. तबस्सुम हसन की उम्मीदवारी का विरोध उनके देवर कंवर हसन ने ही कर दिया. उन्होंने चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. भाजपा के लिए यह खुशी का मौका था. एक बार फिर से जयंत चौधरी ने मोर्चा संभाला और खुद कंवर हसन के घर गए. उनको मनाया ही नहीं बल्कि रालोद में शामिल करवा लिया.
दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता इमरान मसूद की अदावत हसन परिवार से छुपी नहीं थी. यहां भी दोनों के बीच जयंत एक बार फिर चुंबक बने और दोनों को गले मिलवाया. इसे मास्टर स्ट्रोक इस वजह से कह सकते हैं क्योंकि शामली जिले की तीन विधानसभा सीटें शामली, कैराना और थानाभवन को मिलाकर भाजपा 424 वोटों से बढ़त बनाने में कामयाब रही. उसकी हार सहारनपुर की दोनों असेंबली सीट गंगोह और नकुड से हुई जहां इमरान का प्रभाव माना जाता है. आंकड़ो में देखा जाये तो 2017 के चुनाव में गंगोह और नकुड में रालोद को क्रमशः 1054 और 783 वोट मिले थे जो इस बार 1,08,411 और 1,14,341 हो गए.
इस चुनाव में गठबंधन के लोगों ने किसी भी ऐसे तरीके से परहेज़ किया जिससे ध्रुवीकरण हो. बल्कि जयंत ने योगी आदित्यनाथ के उस बयान को भी लपक लिया कि कुछ लोग अपने अस्तित्व के लिए वोट की भीख मांग रहे हैं.
कुलदीप उज्ज्वल बताते हैं कि जयंत ने हर गांव में लोगों को बताते रहे कि- हां हम गांव-गांव जा रहे हैं. पहले नहीं गए, इसका खामियाजा भुगता. अब गांव नहीं छोड़ेंगे. सपा के एमएलसी सुनील सिंह साजन जो चुनाव के दौरान वहां थे, बताते हैं कि गांव में माहौल ऐसा बन गया था कि गांव वाले जयंत को सभा के बाद चुपके से पैसो से भरा लिफाफा देते थे कि जाओ कमज़ोर न पड़ना. जयंत उसको माथे से लगा लेते. जयंत ऐसे लगे जैसे खुद चुनाव लड़ रहे हो. कुल 152 गांव में मीटिंग की. इइस तरह से उन्होंने कैराना की सियासत जो हिंदुओं के कथित पलायन पर सिमट गयी थी उसे वापस किसानों के मुद्दे पर पंहुचा दिया.
जाट राजनीति का केंद्र हमेशा से चौधरी चरण सिंह का क्षेत्र छपरौली रहा है. पिछले 81 साल से यहां से चौधरी परिवार जीतता रहा हैं. इस बार प्रदेश में हुए राज्यसभा चुनाव में रालोद के एकलौते विधायक सहेंद्र सिंह रमाला को भाजपा ने अपने साथ मिला लिया और राज्यसभा सीट जीत ली. लेकिन जाटों का दिल हार गई क्योंकि रालोद का अस्तित्व ही ख़त्म हो गया था.
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को मात
जिन्ना प्रकरण के बाद ध्रुवीकरण की तरफ इस चुनाव का रुख किया गया लेकिन जयंत ने नारा दे कर इसको जिन्ना बनाम गन्ना कर दिया. गन्ना किसानों की हालत ठीक नहीं थी. जानकारी के अनुसार अभी भी मंडल के किसानों का 2,02,989 लाख रुपया चीनी मिलों पर बकाया है.
एक-एक बारीक घटनाक्रम पर जयंत खुद नज़र रखते थे. स्थानीय पत्रकार आस मोहम्मद कैफ बताते हैं कि उनकी एक ख़बर जिसमे रालोद और सपा के कार्यकर्ताओ के बीच सामंजस्य न होने की बात छपी थी, उसे पढ़ कर जयंत ने उनसे खुद बात की और इनपुट्स लिए. इसके बात जयंत ने ये बात अखिलेश तक पहुंचाई. तत्काल कार्वाई हुई. इसके बाद सपा संसद धर्मेन्द्र यादव कैराना पहुंचे और सपा कार्यकर्ताओं को तेज़ किया.
जाट और मुसलमान कितनी दूर तक साथ चलेंगे अभी ये कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन पश्चिम की इस जीत ने चौधरी अजीत सिंह को एक बार फिर से किसी भी संभावित महागठबंधन के लिए अनिवार्य तत्व बना दिया हैं. दूसरी तरफ सर्वशक्तिमान भाजपा है जिसे सोचने पर मजबूर होना पड़ा है कि उसकी ये हार क्यों हुई जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद वहां कैंप करके रैलियां कर रहे थे.
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