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पुलिसिया एनकाउंटर है या किसी फिल्म की पटकथा?
मंगलवार शाम को दिल्ली के प्रेस क्लब में ‘काउंटरिंग द साइलेंस’ (चुप्पी तोड़ो) कार्यकर्म के तहत उत्तर प्रदेश और हरियाणा के मेवात में हुई गैर-न्यायिक हत्याओं पर अंतरिम रिपोर्ट जारी की गई. यह रिपोर्ट ‘सीटीजंस अगेंस्ट हेट’ नाम की संस्था द्वारा तैयार किया गया है.
दरअसल इस रिपोर्ट में वर्ष 2017-18 में हुए कुल 28 गैर न्यायिक हत्याओं (16 उत्तर प्रदेश और 12 हरियाणा) का विवरण दर्ज है. रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर पीड़ितों के परिजन भी मौजूद थे.
कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे गए शमशाद के भाई, महताब अहमद ने बताया कि उनके भाई दो साल से जेल में बंद थे. “पुलिस ने हमें बताया कि पेशी से वापस लौटते वक्त शमशाद फरार हो गया है. इसके दो दिन बाद पुलिस ने हमें शमशाद की एनकाउंटर की खबर दी,” महताब ने न्यूज़लॉन्ड्री से कहा.
गौरतलब हो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार एनकाउंटर को अपराध में कमी से जोड़कर देखती है. मुख्यमंत्री एनकाउंटर को सरकार की उपलब्धि के तौर पर पेश करते हैं. उन्होंने मीडिया को अपने एक बयान में कहा था , “जिन लोगों को बन्दूक की नोक पर विश्वास है, उन्हें बन्दूक की ही भाषा में जबाव देना चाहिए.”
पीड़ित मंसूर के भाई बताते हैं कि, “उनके भाई पिछले ढ़ाई साल से मानसिक रूप से विक्षिप्त थे. एक दिन पुलिस हमारे घर आई और उन्हें ले गई. अगले दिन मालूम चला कि मंसूर एनकाउंटर में मारा गया.”
सिटीजंस अगेंस्ट हेट की रिपोर्ट यूपी और हरियाणा में हुए इन कथित एनकाउंटर्स का जातीय, धार्मिक और आर्थिक पक्ष भी उजागर करती है. एनकाउंटर के ज्यादातर पीड़ित मुसलमान, दलित या बहुजन समुदाय से संबंध रखते हैं. ये सभी वंचित सामाजिक-आर्थिक तबके से आते हैं.
रिहाई मंच के राजीव यादव ने न्यूज़लॉन्ड्री से बातचीत में कहा, “एनकाउंटर पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा है. आप एनकाउंटर में मारे गए लोगों की जाति देखिए- पासी, खटीक, सोनकर, यादव. यह सुनियोजित तरीके से दलित और ओबीसी जातियों को बदनाम करने की कोशिश है.”
राजीव ने बताया कि एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को सरकार प्रोमोशन और सम्मान से नवाज़ रही है. उन्होंने रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के दुरुपयोग की भी बात कही. उन्होंने कहा कि रासुका लगाने का भी एक ट्रेंड है जिसमें दलित, ओबीसी और मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है. राजीव बताते हैं कि जब राज्य में राजनाथ सिंह की सरकार थी तब भी इस तरह के फर्ज़ी एनकाउंटर होते थे.
अधिवक्ता मंगला वर्मा ने इन गैर-न्यायिक हत्याओं के पीछे एक खास पैटर्न होने की बात कही. वह कहती हैं, “हर मृतक के शरीर पर जख्म के निशान मिलते हैं. पुलिस द्वारा प्रताड़ित किए जाने के स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं. कई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता चलता है पुलिस ने बहुत नज़दीक से गोली चलाई है.”
“सभी मामलों में पुलिस पीड़ितों को घर से उठाती है और उन्हें प्रताड़ित किया जाता है. हर केस में एक शख्स मारा जाता है और दूसरा भाग जाता है. दूसरे के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं होती. यह किसी फिल्म की स्क्रीनप्ले जैसा लगता है,” मंगला ने कहा.
पीड़ित परिवारों ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया कि उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी नहीं दी गई हैं. परिवार के लोगों को पुलिस परेशान कर रही है. कई मामलों में पुलिस ने पीड़ितों के परिजनों पर बलात्कार का केस दर्ज़ कर दिया है. पुलिस ने पीड़ित परिवारों का बयान भी दर्ज नहीं किया है.
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कई मामलों में पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन का पालन नहीं किया है. उन्होंने पीयूसीएल बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र का संदर्भ देते हुए कहा कि मृतकों के परिजनों के बयान दर्ज किया जाना चाहिए. परिजनों को तुरंत एफआईआर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने का प्रावधान है. प्रशांत भूषण के मुताबिक ये एनकाउंटर नहीं बल्कि सुनियोजित हत्याएं हैं.
इस बाबत प्रशांत भूषण के नेतृत्व में सिटीजंस अगेंस्ट हेट की टीम ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को ज्ञापन सौंपा है. एनकाउंटर्स पर विस्तृत रिपोर्ट मई के अंत तक आने की उम्मीद है.
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