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कौन हैं रवीश कुमार को मां-बहन की गालियां देने वाले?

कुछ दिन पहले एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार और एंकर रवीश कुमार ने अपनी फेसबुक वॉल पर कुछ स्क्रीनशॉट शेयर किया. यह जल्द ही सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया. स्क्रीनशॉट की विषयवस्तु किसी भी सभ्य समाज में रहने वाले, सुचिंतित व्यक्ति को सुन्न कर देने वाली है. रवीश की मां-बहन को लक्षित गालियां खुलेआम दी गई थीं. जान से मारने की धमकियां भी दी गईं. रवीश ने जो स्क्रीनशॉट शेयर किया उनमें कुछ गाली देने वालों के मोबाइल नंबर भी सामने आए.

न्यूज़लॉन्ड्री ने उन नंबरों के जरिए ऐसे हिंसक गालीबाजों की जानकारी हासिल करने की कोशिश की. उनके बारे में जानने से पहले एक बार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए जो बताया उसे जान लें.

29 अप्रैल, 2018 को रवीश ने फेसबुक पर लिखा, “गाजीपुर रेप केस में मुझे लेकर कई तरह की अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं. भद्दी गालियां दी जा रही हैं और धमकी भी. नरेंद्र मोदी ने इसी गाली संस्कृति से राजनीति को भर दिया है. गाली देने वाले उन्हीं के समर्थक हैं. वे बड़ी चालाकी से कह भी जाते हैं कि उन्हें पांच किलो, आठ किलो गालियां पड़ती हैं. मगर वे ख़ुद गाली देने वालों (ट्रोल) और फेक न्यूज़ वालों को फॉलो करते हैं. वे ख़ुद नहीं कहते मगर उनके नेतृत्व में जो राजनीतिक संस्कृति फैली है उसका चेहरा यही है. इसके जवाब में दूसरी तरफ़ भी ऐसी भद्दी संस्कृति पनप रही है. सवाल करने वालों को विरोधी, ग़द्दार, कम्युनिस्ट घोषित कर गाली देने की संस्कृति को संगठित करने का काम किसने किया है? ये लोग किसकी तरफ़ से गालियां देते हैं? जवाब साफ़ है.”

इसके बाद रवीश ने साफ किया कि उन्हें सैकड़ों नंबरों से गालियां दी जा रही हैं जिसमें कुछ नंबर विदेशों के भी हैं. पुलिस के लचर रवैये के संदर्भ में रवीश ने लिखा, “पुलिस में शिकायत करो तो कुछ होता नहीं.” दरअसल अचानक से रवीश के ऊपर गालीबाज ट्रोल्स के टूट पड़ने के पीछे एक तात्कालिक अवसर है. भाजपा समर्थक ये ट्रोल्स मानते हैं कि रवीश कुमार ने गाजीपुर में बलात्कार की घटना पर चुप्पी साध ली जबकि कठुआ मामले में वो बहुत मुखर थे.

हालांकि रवीश ने इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से लिखा है, “मेरा चुप रहने का सवाल ही नहीं. बोलें न बोलें, बलात्कार के मामले में बात एक ही है. जांच हो, जल्दी जांच हो और सज़ा भी जल्दी हो. मैं फांसी की बात कभी नहीं करता. न संत के लिए और न मौलवी के लिए.”

जाहिर है ट्रोल्स को गाजीपुर में हुए बलात्कार से कम रवीश कुमार के बारे में फैलाई गई गलत जानकारियों से खुन्नस है.

2014 के बाद से आपने तब ‘क्यों नहीं बोला, अब क्यों बोला’ का एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है. यह भाजपा आईटी सेल की ‘रचनात्मकता’ है जिसका प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और भाजपाई नेता धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. ऐसा कर वे चाहते हैं कि भाजपा के दामन पर सवाल न उठाये जाए. सवाल कांग्रेस और पूर्ववर्ती सरकारों से किया जाए. मीडिया का एक धड़ा इस प्रक्रिया को विस्तार देने में लगा है. सरकार के प्रति प्रतिबद्ध मीडिया को रवीश कुमार ने ‘गोदी मीडिया’ का नाम दे रखा है. यही कारण है कि सोशल मीडिया के ‘पॉपुलर कल्चर’ में प्रचलित शब्दावली का इस्तेमाल टीवी एंकर भी करते हैं. रवीश कुमार को अप्रत्यक्ष रूप से ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग,’ ‘डिजाइनर पत्रकार’, ‘वामपंथी ब्रिगेड’ आदि कहकर संबोधित किया जाता है. कहने का आशय है कि मीडिया की भाषा व तर्कों में ट्रोल जैसी समानताएं दिखने लगी हैं.

टेलीविज़न के वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने रवीश को दी जा रही गालियों और धमकियों पर उनसे सहानुभूति जताते हुए अपना समर्थन दिया, “बहुत खतरनाक दौर में आ गए हैं हम. सनातन धर्म, संस्कृति और देश की बात करने वाले ये धर्म ध्वजाधारी किसी भी स्तर तक जा सकते हैं. गालियां और अश्लीलता की सारी सीमाएं तोड़ना इनके चरित्र की बुनियादी बनावट है. चिंता मत करो. झेलना तो होगा ये सब. तुम असरदार ढंग से अपनी बातें रखते हो तो तुमसे ये सब ज्यादा चिढ़ते हैं. चिंता की बात ये है कि उनकी आबादी और तादाद महज सैकड़ों या हजारों ट्रोल तक सीमित नही हैं. उनके भीतर ऐसा जहर भर गया है या भरा जा रहा है कि नफरत के चलते फिरते पुतले बन चुके हैं वो सब के सब.”

अजीत अंजुम ने बताया कि उन्हें भी गालियां दी जा रही हैं. वो कहते हैं, “मैं कुछ भी लिखता हूं तो गीता के सवाल पर थेथरई करने वाले लफंगे आ जाते हैं. मुझे मां-बहन की गालियों से नवाजकर खुद को सनातनी साबित करने लगते हैं, मैं तुरंत उन्हें ब्लॉक करता हूं. जाओ, अपने संस्कार लेकर अपनी गली में घूमो. मेरा कमेंट बॉक्स गंदा मत करो. जिन लोगों ने कभी बलात्कार की घटनाओं पर कुछ नहीं लिखा, कुछ नहीं बोला. हर रोज देश में मासूमों से होने वाली बलात्कार की घटना पर लिखने-बोलने की बजाय नफरत के बीज छिड़कते रहे, वो आज डंडा लेकर उन सबके पीछे पड़े हैं, जो उनका ऐजेंडा अपनी पीठ पर नहीं ढोते हैं. ऐसे ही कट्टर लोग दूसरी तरफ भी हैं. बीच में हम फंसे हैं. उस नाबालिग लड़की को भाभी बनाकर शर्मनाक मुहिम चला रहे लोग भी कम नहीं. जहर उनके भीतर भी भरा है. जहर की दो धाराओं के बीच की पगडंडी कई बार पतली लगने लगती है.”

रवीश कुमार ने फेसबुक पर जिन ट्रॉल्स का नंबर साझा किया है, न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे बात करने की कोशिश की. शेयर किए गए कई नंबर फिलहाल के लिए स्विच ऑफ यानी बंद पड़े हैं. उनमें से एक नंबर पर इस रिपोर्टर की बात संतोष सिन्हा नामक शख्स से हुई.

संतोष को रवीश कुमार को गालियां देने के सवाल पर रत्ती भर भी शर्मिंदगी नहीं थी. उल्टा उसने एक रोचक बात बताई, “रवीश कुमार ने एफबी पर हमारे एक हिंदू भाई को गाली दी. उसके बाद मैंने उन्हें गाली दी.”

इस पर न्यूज़लॉन्ड्री ने उससे इसका सबूत या स्क्रीनशॉट साझा करने को कहा तो संतोष ने मना कर दिया. शायद उसके पास साझा करने के लिए कुछ नहीं रहा हो.

संतोष कठुआ में नाबालिग बच्ची से बलात्कार के बाद हो रही मोदी सरकार की किरकिरी से खफा नजर आया. “अगर रवीश कुमार आसिफ़ा के लिए जस्टिस कर सकते हैं तो गीता के लिए क्यों नहीं कर सकते हैं. क्या गीता किसी की बेटी नहीं है?”, बोलते हुए संतोष उग्र हो गया.

इस रिपोर्टर ने संतोष से कहा कि न्याय करने की जिम्मेदारी तो न्यायपालिका की है. यह रवीश कुमार का काम तो है नहीं. वे पत्रकार हैं और सवाल उठा सकते हैं. पर उसने टाल दिया.

संतोष से हमने जानना चाहा कि दिल्ली के गाजीपुर और कठुआ में बच्ची से बलात्कार की घटना में उसे क्या फर्क़ दिखता है? संतोष ने कहा, “बिल्कुल फर्क है. हिंदू बेटी के साथ अत्याचार होता है तो मीडिया चुप हो जाती है.”

संतोष के ऊपर सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर फैलाए जा रहे अधकचरा जानकारियों का साफ प्रभाव देखने को मिला. मसलन उसे कठुआ में बलात्कारियों के समर्थन में भाजपा समर्थकों और नेताओं द्वारा निकाली गई रैली के बारे में कोई जानकारी नहीं है. उसे सिर्फ पीड़िता का धर्म मालूम है.

जब उससे पूछा गया कि, आप रवीश से उम्मीद क्यों करते हैं कि वे हर बात पर बोलेंगे? “जब आप न्याय मांग रहे हो तो सबके लिए मांगो. नहीं तो किसी के लिए मत मांगो”, संतोष ने जबाव दिया. “हमें भी अभिव्यक्ति की आज़ादी है. सिर्फ रवीश कुमार को नहीं है अभिव्यक्ति की आज़ादी.” संतोष ने जोड़ा. अपनी गालियों को वाजिब ठहराने का उसे यही जवाब सूझा.

संतोष की पढ़ाई-लिखाई सिर्फ बारहवीं कक्षा तक हुई है. वे कोई छोटी-मोटी जॉब करते हैं. कुछ साल पहले वे सीएनईबी मीडिया ग्रुप के साथ काम करते थे. संतोष को मीडिया से बहुत सारी शिकायतें हैं. उनके मुताबिक मीडिया उनके बुनियादी सवाल नहीं उठाता है.

संतोष ने बताया, “पिछले साल हादसे में उनकी मां की मृत्यु हो गई. दिल्ली पुलिस ने कोई कारवाई नहीं की. मीडिया से मदद मांगी, मीडियावालों ने साथ नहीं दिया.” इससे वे निष्कर्ष पर पहुंचे कि मीडिया ‘बिकाऊ’ है.

एक अन्य नंबर पर प्रशांत (बदला हुआ नाम) से बात हुई. प्रशांत ने आग्रह किया कि उनका नाम उजागर न किया जाए. नंबर सार्वजनिक किए जाने से लोग उन्हें गालियां पड़ रही है. लोग उन्हें फोन करके गालियां दे रहे हैं.

“आधार कार्ड में प्राइवेसी का प्रश्न उठाने वाला व्यक्ति नंबर पब्लिक में बांट रहा है, यही तो आज़ादी है,” प्रशांत ने कहा. फोन पर गालियां मिलने की शिकायत संतोष ने भी की थी. प्रशांत ने भी कुबूला कि गालियां उसने दी हैं और इसका उसे कोई अफसोस नहीं है. उन्होंने कहा, “मुस्लिम लड़की से साथ बलात्कार की ख़बर दिन-रात दिखाई जाती है. लेकिन एक मौलवी मस्जिद में हिंदू लड़की से बलात्कार करेगा, मीडिया में सन्नाटा छा जाता है. जबकि बाद में पता चला कि कठुआ में रेप हुआ ही नहीं था.”

जाहिर है प्रशांत ने भी आधी-अधूरी जानकारियों के आधार पर अपनी सोच बना ली है मसलन बच्ची के साथ बलात्कार मस्जिद नहीं बल्कि मदरसे में हुआ, और बलात्कारी मौलवी नहीं बल्कि एक युवक है. मौलवी ने युवक के कृत्य को शह दिया. पुलिस और क्राइम ब्रांच मामले की जांच कर रही है. किसी नेता ने या राजनीतिक पार्टी ने आरोपियों का समर्थन नहीं किया है. न ही समर्थन में कोई रैली निकाली गई है.

जब प्रशांत से पूछा गया, आपको कैसे मालूम हुआ कि कठुआ में रेप नहीं हुआ था, उन्होंने बताया कि इंटरनेट पर पढ़ा है. इस व्यक्ति ने भी गालियों के समर्थन में अभिव्यक्ति की आजादी के तर्क दिए. दोनों ने ही किसी भी हिंदुवादी संगठन का हिस्सा होने से इनकार किया.

गालियां देने वालों से बात करते हुए एक बात स्पष्ट होती है कि ये पूरी तरह से मौजूदा माहौल में फैलाई जा रही बेबुनियाद बातों से प्रभावित होकर ऐसा कर रहे हैं. इनका घोर साम्प्रदायीकरण हो चुका है. इनकी सूचना का स्रोत इंटरनेट है और उन्हें इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज़ पर भरोसा है. घटनाओं की सही जानकारी और संदर्भ से न तो इन्हें खास मतलब है न ही उसमें इनकी रुचि होती है. अधूरी जानकारी के बावजूद हर मसले पर इनकी राय पूरी होती है. ऐसे में ये अभिव्यक्ति की आज़ादी और हेट स्पीच में अंतर कर पाएंगें, दूर दूर तक उम्मीद नहीं दिखती.

मीडिया साक्षरता का भी लोगों में घोर अभाव है. ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि एक पत्रकार अगर आलोचनात्मक सवाल उठाने को आज़ाद नहीं है, तो लोगों को लोकतंत्र और प्रधानमंत्री के दावों पर भरोसा कैसे हो?

बताते चलें कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर (आरडब्लूओ) नाम की संस्था दुनिया भर के मीडिया गतिविधियों पर नजर रखती हैं. हाल ही में इसके द्वारा जारी की गई प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत दो स्थान और नीचे खिसककर 138वें स्थान पर पहुंच गया है. यह संस्था प्रेस और पत्रकारों पर हो रहे हमलों, उनकी कामकाजी परिस्थितियों और मीडिया स्वतंत्रता का आकलन करती है.

आरडब्लूओ ने अपनी रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में जो सबसे अहम बात बताई वह है पत्रकारों पर हमला करने वाले ज्यादातर लोग मौजूदा सरकार के द्वारा समर्थित ट्रोल्स हैं. “2014 में जब से नरेंद्र मोदी सत्ता पर काबिज़ हुए हैं, कट्टर हिंदुवादी सदस्यों ने पत्रकारों को हिंसक शब्दों से संबोधित कर दिया है. कोई भी खोज़ी पत्रकारिता या रिपोर्ट जो सत्ताधारी पार्टी और हिंदुत्व की आलोचना करता है, पत्रकारों या लेखकों को इंटरनेट पर अपमानित करने और जान से मारने की धमकी मिलने लगती है, धमकी देने वालों में से ज्यादातर प्रधानमंत्री के ट्रोल आर्मी के सदस्य हैं,” रिपोर्ट ने कहा.