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नए स्कूल के साधुओं को सेक्स की प्रभुता स्वीकार कर लेना चाहिए
साधु को भी साधारणजनों या अपने भक्तों की तरह सेक्स चाहिए. भोजन, हवा, पानी जैसी प्राकृतिक जरूरत है लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करता. इसके बजाय वह भक्तों को स्खलन से होने वाले पतन और पाप का भय दिखाता है. वीर्य की बचत के साथ बढ़ने वाली चेहरे की चमक और मिलने वाली सिद्धियों, चमत्कारिक क्षमताओं का संगीतमय बखान करता है.
धर्म-अध्यात्म के इतिहास की बात ही क्या, पुराणों में भी निर्लिप्त स्वभाव के ब्रह्मा से लेकर मकरध्वज को पैदा करने वाले हनुमान तक एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसका ब्रह्मचर्य साबुत और अनिंदित रह पाया हो. खुद पर विचित्र, असंभव ढंग से अव्यावहारिक वर्जना लाद लेने के कारण सन्यास के पहले दिन से ही प्रकृति के आगे पराजित साधु साधना, दैवीय आदेश, लोककल्याण की आड़ में छिपकर बलात्कार करता है जैसा कि आसाराम ने किया और बहुतेरे रोज कर रहे हैं. बस फर्क यह है कि वे अक्सर कानून से बचने का प्रबंधन सफलतापूर्वक कर लेते हैं.
हिंदू ही नहीं मर्दों के चलाए सभी धर्म औरत को बराबरी का दर्जा देने से बचने और उसे कमतर प्राणी या कठपुतली की तरह नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मचर्य का अप्राकृतिक लक्ष्य पाने की कोशिश आदिकाल से करते रहे हैं और अब तक सेक्स के मामले में आत्मनिर्भर हो पाने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं. आदम और हव्वा भी सेक्स की कामना के कारण ही स्वर्ग से निकाले गए थे.
आश्चर्य तो यह है कि जो साधारण जन या आस्थावान देखते हैं कि माया से बचने का प्रवचन करता हुआ साधु एयरकंडीशन्ड महल में रह रहा है, सोने के सिंहासन पर बैठता है, सबसे स्वादिष्ट और पौष्टिक समझा जाने वाला तर माल उड़ाता है, मंहगी गाड़ियों से असलहों के घेरे में चलता है, आश्रम के नाम पर ज़मीनें हड़पता है, टीवी पर दिखने के लिए व्याकुल ही नहीं रहता, मीडिया मैनेज करता है, अपना चैनल खोल लेता है- वे समझ नहीं पाते कि ऐसा साधु सेक्स से कैसे बचा रहेगा? कंचन में लिपटा रहेगा लेकिन कामिनी से छूट जाएगा, यह चमत्कार कैसे होगा.
यह नकली, रचा हुआ आश्चर्य है क्योंकि जिसे आस्था कहा जाता है वह कोई और ही चीज है. वह चीज ओझल कर दी जाती है तो सबकुछ रहस्यमय हो जाता है. दरअसल साधारण जनता महाजनों का अनुसरण करती है क्योंकि उन्हीं की तरह कामयाब और शक्ति संपन्न होना चाहती है. संत आसाराम बापू के मामले में तो यह रास्ता नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अटल बिहारी बाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, दिग्विजय सिंह और उद्योग, संस्कृति, फिल्म, मीडिया के तमाम सफल महाजनों द्वारा दिखाया गया है.
मिसाल के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आसाराम के अनन्य भक्त हुआ करते थे. उनके गृह जनपद वाडनगर से नब्बे किलोमीटर दूर मोटेरा आश्रम में बनाए गए वीडियो मौजूद हैं जिनमें साष्टांग दंडवत के बाद वे गद्गद भाव से कह रहे हैं कि मुझे उनके सानिध्य में पवित्र प्यार और नई शक्ति मिलती है. अब इसे आस्था कहा जाएगा तो सच पर पर्दा खिंच जाएगा. वास्तव में उनकी नज़र आसाराम के लाखों भक्तों पर थी जो बाबा के एक इशारे पर उन्हें वोट देते थे. इसके बदले बाबा को ज़मीन कब्जा करने, औरतों का शोषण करने और तंत्र साधना के लिए बच्चों की बलि देने की छूट प्रशासन से मिली हुई थी.
यह उन दो बच्चों के (आसाराम के भक्त) पिताओं के इकबालिया बयानों में कहा गया है जिनके अधजले शव 2008 में मोटेरा आश्रम के बाहर साबरमती नदी में मिले थे. साधारण जन चुनाव नहीं लड़ते लेकिन वे भी किसी चमत्कार की आशा में नहीं बल्कि ऐसे ही व्याहारिक कारणों से बाबाओं के पास जाते हैं. किसी को मुकदमा जीतना होता है, किसी को धन संपदा चाहिए होती है, किसी को अपने शत्रु का नाश करना होता, गिरता व्यापार संभालना होता है, किसी को बेटी की शादी करनी होती है, किसी को बीमारी से छुटकारा पाना होता है.
वे किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं रखते. वे जानते हैं कि विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, अस्पताल, शेयर मार्केट के सभी दफ्तरों में बाबा के चेले मौजूद हैं. अगर उनकी कृपा हो गई तो काम बन जाएगा. यहां कोई धर्म नहीं है. यह शुद्ध लेन देन का मामला होता है जहां बाबा की भूमिका एक धार्मिक आभामंडल वाले आदरणीय दलाल की होती है. इस कारोबार के सबसे बुरे शिकार औरतें और बच्चे होते हैं जिनका इस्तेमाल मर्दों की दुनिया में चारे की तरह किया जाता है.
आसाराम केस में सबसे बड़ी भूमिका उस बच्ची के पिता की है जिसने गवाहों की ताबड़तोड़ हत्याओं के बीच भी सबकुछ दांव पर लगाकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी.
इस विशाल नेटवर्क के तारों को आस्था के प्लग से जुड़ा बताया जाता है लेकिन उसके मूल में आमतौर पर सरकारी और सामाजिक तंत्र की अक्षमता है. जो काम सहज होने चाहिए, नहीं होते. तब लोग बाबाओं के पास जाते हैं. यही कारण है कि बाबा धन-वैभव, निजी सेनाओं और संबंधों का खुलेआम प्रदर्शन करते हुए समानान्तर सत्ता की तरह व्यवहार करते हैं तो भक्तों को एतराज नहीं होता बल्कि संभावना दिखती है. जिस बाबा या धार्मिक जमींदार के पास नेता, उद्योगपति और माफिया नहीं जाते उसे सिद्धि से वंचित और बेकार समझा जाता है.
यह लोक की व्यावहारिकता है. ऐसा नहीं है कि अध्यात्म को तिकड़म, फरेब और धूर्तता ने पूरी तरह लील लिया है. साधुओं का एक पुराना स्कूल अब भी है जो एक बार साधना के रास्ते पर चल पड़ने के बाद लौटकर संसार में वापस नहीं आता. वह समाज से बाहर जंगल में जाता है फिर लुप्त हो जाता है. वह अपने एकांत का वासी होता है. उसकी किसी निर्जन में कोई समाधि मिलती है या उसकी भी नौबत नहीं आती.
नए स्कूल के साधु मोह-माया के त्याग और ब्रह्मचर्य का दावा करते हुए विशिष्ट होने का दर्जा पाते हैं और फिर भक्तों का मजमा लगते ही राजा बनने में लग जाते हैं. तब राजाओं वाली बुराईयां भी स्वाभाविक रूप से आती है.
इस बहुमत वाले नए स्कूल की शुरुआत विश्वामित्र से मानी जा सकती है जिन्होंने अपने तपोबल से ईश्वर की दुनिया के समानांतर एक नई दुनिया बनानी चाही थी लेकिन अप्सरा मेनका पर आसक्त होने के कारण त्रिशंकु बन कर बीच आकाश में लटक गए. लेकिन उन्होंने भी मेनका से प्रेम किया था बलात्कार नहीं. उन्होंने फरेब करने के बजाय सेक्स की सत्ता को स्वीकार किया था.
नए स्कूल के साधुओं को भी चाहिए कि वे सेक्स से लड़ने के बजाय उसकी अधीनता या साहचर्य को स्वीकार कर लें. मार्केटिंग और ब्रांड मैनेजमेंट के जरिए फैक्ट्री उत्पाद तो बेचे जा सकते हैं लेकिन सन्यासी होने का ढोंग नहीं चल सकता.
कुछ समय मैंने साधुओं की सोहबत में बिताया है इसलिए ऐसे एक साधु को जानता हूं जिसने आसाराम बापू को बहुत पहले पहचान लिया था. उसने उन्हें बाबा मानने से ही इनकार कर दिया था. 2011 में तमाम झंझटों से घिरे आसाराम, गढ़वाल के एक आश्रम में ध्यान करने के लिए आए थे जहां कई प्राकृतिक गुफाएं हैं जिनमें साधकों की जरूरत का सामान रख दिया जाता है.
यह आश्रम ऋषिकेश से चमोली जाने वाली सड़क के किनारे है जहां वह गूंगा साधु रहता था. वह सड़क से गैस सिलिंडर और दूर से पानी ढोकर लाने समेत कई काम करता था. दो दिन गुफा में रहने के बाद आसाराम ने आश्रम में पश्चिमी ढंग का एक कमोड लगवाने के लिए कहा क्योंकि वह देसी ढंग से निवृत्त नहीं हो पा रहे थे. गूंगे साधु ने एक थप्पड़ रसीद करते हुए संकेतों में जो कहा था, उसका मतलब था- जो अपने पैरों पर बैठ नहीं सकता वह साधना क्या करेगा?
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