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क्या दलित-भाजपा रिश्ते की डोर एससी-एसटी क़ानून से बंधी है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम-1989 के दुरुपयोग की बातें इस कानून के अस्तित्व में आने के साथ से ही की जाती रही हैं. ऐसा तब है जब इस कानून के बनने के तीस साल के बाद भी हर साल औसतन करीब चालीस हजार दलित विरोधी उत्पीड़न के मामले दर्ज होते हैं.
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश के जरिए इसमें कुछ अहम बदलाव लाते हुए इस कानून को अपेक्षाकृत कमजोर कर दिया है. जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने इस कानून के दुरूपयोग का हवाला देकर यह फैसला सुनाया है.
जब से यह फैसला आया है तब से इसका मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों की ओर से जमकर विरोध किया जा रहा है. एनडीए के सहयोगियों में रामविलास पासवान और रामदास अठावले ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए हैं. लेकिन हैरानी की बात है कि अब तक सरकार ने इसपर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है. हां थावरचंद गहलोत जैसे बीजेपी के कुछ सांसदों ने जरूर सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है.
इस फैसले से एक राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा होता है कि दलितों को अपने साथ लेने की बीजेपी की रणनीति इससे किस हद तक प्रभावित हो सकती है, खासतौर पर जब बमुश्किल एक साल का वक्त ही रह गया हो आगामी लोकसभा चुनाव में.
दलित राजनीति के साथ बीजेपी के संबंधों के संदर्भ में यह फैसला क्या रंग लाने वाला है, यह अटकलों का विषय हो सकता है, लेकिन बीजेपी के ‘एक हिंदू पहचान’ की अवधारणा में दलित कैसे और कितना फिट हो पाए हैं, इसका मूल्यांकन तो साफ तौर पर किया ही जा सकता है.
दलित और बीजेपी
सैद्धांतिक तौर पर दलित हित जितने बीजेपी की हिंदूवादी राजनीति के खिलाफ नजर आते हैं, दलित राजनीति और बीजेपी में व्यवहारिक स्तर पर उतनी दूरी देखने को नहीं मिलती है.
दलित-मुसलमान एकता की बात करने वाले आंदोलनकारियों के जेहन में यह बात जरूर खटकनी चाहिए. अगर नहीं खटकती है तो यह साफ तौर पर विचारधारा के स्तर पर आंदोलन के साथ बेईमानी है और इसके बिना व्यापक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन की जगह चुनावी नफा-नुकसान वाला आंदोलन ही खड़ा हो पाएगा.
मोदी सरकार के कार्यकाल में मुसलमानों की मॉब लिंचिंग और दलितों के साथ संगठित हिंसा की शुरुआत साथ-साथ शुरू हुई. गुजरात के उना में गाय का चमड़ा उतारने वाले दलित नौजवानों को बेरहमी से मारा गया था. दलितों की ओर से इसका मज़बूत विरोध भी हुआ था. इसके बाद राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ को बैकफुट पर जाना पड़ा था.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक पिछले 10 सालों में दलित उत्पीड़न के मामलों में 66 फीसदी इजाफा हुआ है और 2014 से लेकर 2016 तक जिन राज्यों में दलित उत्पीड़न के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं उनमें या तो बीजेपी या फिर उसके सहयोगियों की सरकार रही है. लेकिन इसके बावजूद दलितों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ बना रहा.
गैर यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों की गोलबंदी ही तो उत्तर प्रदेश में बीजेपी की योगी सरकार को सत्ता में ले आई. एक तरफ हिंदूवादी राजनीति के ख़िलाफ़ दलित राजनीति आक्रामक है तो दूसरी ओर हिंदूवादी राजनीति की एक हद तक पालनहार भी बनी हुई है.
क्या यह महज इत्तेफाक हो सकता है कि समय-समय पर मायावती, रामदास अठावले, रामविलास पासवान और उदित राज जैसे दलित नेता बीजेपी की राजनीति के साथ इतने सहज ढंग से तालमेल बिठा लेते हैं. मायावती तो तीन बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ही बीजेपी की मदद से बनीं.
अगर दलित राजनीति के नए युवा चेहरे जिग्नेश मेवाणी को छोड़ दे तो आज की तारीख में दलित राजनीति का कोई भी बड़ा चेहरा ऐसा नहीं है जिसने किसी न किसी रूप में बीजेपी के साथ तालमेल ना बिठाया हो.
अगर बीजेपी हिन्दुत्व की राजनीति को साधते हुए भी दलितों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हो पा रही है तो क्यों और कैसे? एक हद तक यह बीजेपी की रणनीतिक सफलता लगती है लेकिन इसके कुछ सैद्धांतिक और ऐतिहासिक पहलू भी हैं.
दलित राजनीति का वैचारिक आधार आंबेडकरवाद से जुड़ा हुआ है. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने हिंदू धर्म और हिंदू राष्ट्र की आलोचना करते हुए तो बहुत कुछ कहा है लेकिन बीजेपी की मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) को लेकर उनके विचार उतने स्पष्ट नहीं दिखते.
इसके विपरीत वो कांग्रेस का विरोध ज्यादा मुखर होकर करते हैं. शायद इसकी वजह यह थी कि उस वक्त कांग्रेस ही बड़ी ताकत थी और ब्राह्मणवादियों की बड़ी गोलबंदी उसके अंदर थी.
आरएसएस उस वक्त अपनी मजबूत जमीन तलाश करने में लगा हुआ था. पिछले कुछ सालों से आरएसएस के लोग आंबेडकर के 1939 में लिखे एक उद्धरण का इस्तेमाल दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में बखूबी करते हैं.
इस उद्धरण के हवाले से संघ के लोग दावा करते हैं कि पुणे में संघ के एक शिक्षण कैंप में जब आंबेडकर पहली बार पहुंचे तो वहां जाति का भेद नहीं देखकर वो अचरज में थे और इसकी तारीफ की थी. हालांकि यह भी जानना दिलचस्प है कि इसकी पुष्टि के लिए वो किसी संदर्भ लेख या ग्रंथ का हवाला नहीं देते हैं.
लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि कानून मंत्री के तौर पर आंबेडकर ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का समर्थन और जम्मू-कश्मीर में धारा 370 लगाने का विरोध किया था. इन दोनों ही मसलों पर संघ का रुख भी यही है.
मुसलमानों और पाकिस्तान को लेकर आंबेडकर के दृष्टिकोण दो किताबों थॉट्स ऑन पाकिस्तान (1941) और पाकिस्तान एंड पार्टिसन ऑफ इंडिया (1945) में साफ तौर पर नज़र आए हैं. इसमें वो मुस्लिम समाज को लेकर उतनी ही तल्ख टिप्पणियां करते हैं जितनी हिंदू धर्म पर बात करते हुए करते हैं.
शायद यही वजह रही हो कि आखिरकार उन्होंने इस्लाम अपनाने की जगह बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. बीजेपी जिस हद तक दलितों के हिंदूकरण में कामयाब हो पाई है उससे एक बात तो स्पष्ट है कि दलित अपनी हिंदू पहचान की बड़ी कीमत चुकाने जा रहे हैं.
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