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एसएससी घोटाला और हिंदी के अख़बारों की कवरेज
आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर हालिया अन्ना के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन तक, युवाओं और छात्रों की बड़ी भूमिका रही. छात्रों के आंदोलनों ने देश की राजनीति को दिशा दी है.
समय-समय पर छात्र अपनी मांगों को लेकर सरकार और संस्थानों से टकराते रहते हैं. एक ऐसा ही आंदोलन एसएसएसी घोटाले को लेकर भी चल रहा है, जो अब अपने 18वें दिन में प्रवेश कर चुका है. नेताओं की आवाजाही बढ़ने से मीडिया का ध्यान भी इस ओर गया. लेकिन सीबीआई जांच की मांग (जिसे छात्रों ने मानने से इंकार कर दिया) के आश्वासन के बाद से मीडिया का ध्यान इस ओर से हट गया.
यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि जब आंदोलन की छिटपुट खबरें टीवी मीडिया और विभिन्न वेबसाइटों पर छप रहीं थी, हिंदी प्रिंट मीडिया का नजरिया अलग था. ऐसा लगता है जैसे हिंदी के अख़बारों ने छात्रों, किसानों (न्यूज़लॉन्ड्री की ताजा रिपोर्ट) और मजदूरों की ख़बरों से अपना पल्ला झाड़ लिया है.
ज्यादातर हिंदी अखबारों के रविवार के अंक में रिक्तियों के बारे में सूचना छपती है लेकिन अख़बार यह नहीं बताते कि रोजगार की स्थितियां कितनी दूभर हैं. सरकारी से प्राइवेट तक की वैकेंसियों की जानकारी छपती है, रोजगार संबंधी सप्लिमेंट भी ज्यादातार अख़बारों के होते हैं, लेकिन इन विषयों पर, इनसे जुड़ी समस्याओं पर विस्तृत स्टोरी शायद ही कभी देखने को मिलती है.
हमने पहले भी यह देखा है कि किसानों, मजदूरों, छात्रों की ख़बर तबतक नहीं बन पाती जबतक इसमें मीडिया को मसाला नहीं मिलता. दिल्ली में अनशन पर बैठे तामिलनाडु किसानों की अहमियत तब समझी गई जब उन्होंने नरमुंड और मूत्र पीने जैसे प्रयोग कर लिए. महाराष्ट्र किसानों की चर्चा तब हुई जब वे मुंबई पहुंच गए.
इसी संदर्भ में एसएसएसी सीजीओ कॉम्पलेक्स के बाहर बैठे छात्रों को भी मीडिया से शिकायतें हैं. उनके मुताबिक उनके आंदोलन को नेताओं के बयान और सीबीआई की मांग भर समझा जा रहा है. मीडिया उनके मुद्दे या तो समझ नहीं पा रही है या फिर जानबूझकर उनकी समस्या को लोगों तक नहीं पहुंचा रही है.
यहां हमने हिंदी के कुछ प्रमुख अखबारों के एक सप्ताह की रिपोर्टिंग का जायजा लिया है.
छात्रों का यह आंदोलन 27 फरवरी से शुरू हुआ था. हमने 28 फरवरी से 7 मार्च तक के अखबारों को सर्वेक्षण में शामिल किया है. होली के अवकाश की वजह से 3 फरवरी के अखबार शामिल नहीं किए जा सके हैं.
सबसे पहले नीचे तालिका में दिनांक के अनुसार अख़बारों के नाम, पृष्ठ संख्या और उसमें छपी ख़बर के कॉलम को सूचीबद्ध किया गया है. इससे विश्लेषण करने में आसानी होगी कि कौन सा अख़बार किस दिनांक को इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है या इसे उपेक्षित किया है.
28 फरवरी
27 फरवरी से ही एसएससी परीक्षार्थी अपनी मांगों को लेकर एसएससी दफ्तर के सामने डंटे हुए हैं. पर 28 फरवरी को किसी भी अख़बार ने इससे जुड़ी कोई ख़बर नहीं छापी है.
01 मार्च
1 मार्च को भी नवभारत टाइम्स को छोड़ किसी अख़बार ने इसकी सुध नहीं ली. नवभारत टाइम्स ने 1 मार्च को अपने तीन कॉलम की स्टोरी का शीर्षक लगाया है ‘SSC स्कैम- प्रोटेस्ट ने बंद करा दिया मेट्रो स्टेशन.’ शहरी क्षेत्रों में पाठकों का सबसे पसंदीदा अख़बार होने का दावा करने वाला नवभारत टाइम्स ख़बर का शीर्षक भी अपने पाठकों को ध्यान में रखकर लगाता है.
हालांकि संवाददाता एसएससी स्कैम मामले की जानकारी देता है, पर इस मुद्दे पर एक भी छात्र का बयान या विचार शामिल नहीं करता है. संवाददाता लिखता है कि एसएससी कार्यालय के बाहर बड़ी तादाद में कैंडिडेट्स ने अपनी आवाज़ उठाई, जिसमें आइसा, स्वराज इंडिया के मेंबर्स शामिल हुए. इसके साथ ही डीयू, जेएनयू, जामिया समेत कई संस्थानों के स्टूडेंट्स भी इसमें शामिल हुए.
संवाददाता इस बात का ज़िक्र करना भूल जाता है कि इस प्रोटेस्ट में अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग जगहों से छात्र हिस्सा ले रहे हैं. ख़बर को समग्र रूप से देखे तो मामले को जगह देने के लिए नवभारत टाइम्स बधाई का पात्र है.
2 मार्च
दैनिक जागरण के नई दिल्ली संस्करण ने इसे ‘होली आई रे’ जैसे विशेष पेज पर जगह दी है. अख़बार ने इसी पेज के मध्य में नेताओं और उनके विशेष दलों के द्वारा मनाई जा रही होली को प्रमुखता से छापा है. उसके नीचे दो कॉलम की एक छोटी सी स्टोरी है, जिसमें योगेन्द्र यादव और एनएसयूआइ के पक्ष का इनपुट लेकर ख़बर को तैयार किया गया है.
दैनिक भास्कर ने देर से ही सही पर इसपर छह कॉलम की विस्तृत स्टोरी की है. इसमें छात्रों के मुद्दे और मजबूरियों दोनों को जगह दिया गया है. छात्रों के आरोप के साथ आयोग के जवाब को भी संवाददाता ने अपनी स्टोरी में स्थान दिया है.
राष्ट्रीय सहारा ने स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेन्द्र यादव के बयान पर ही अपनी स्टोरी तैयार की है. दो कॉलम की स्टोरी में छात्रों का पक्ष गायब है.
4 मार्च
चार मार्च को सभी अख़बारों ने इसकी रिपोर्टिंग की है. स्टोरी को पर्याप्त जगह भी मिली है. दरअसल पांच दिनों से चल रहे धरना प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया पर छात्रों ने मुहिम छेड़ रखी थी. जिसके दबाव में कई नेताओं ने प्रदर्शन स्थल का दौरा किया. फलस्वरूप मीडिया ने भी इसकी कवरेज की.
उदाहरण के लिए अभी तक इस मामले में एक भी स्टोरी नहीं करने वाला अमर उजाला इस दिन लगभग आधे पेज में स्टोरी लगाता है. शीर्षक है ‘प्रदर्शन कर में रहे छात्रों के समर्थन पहुंचे नेता.’ इसमें आइसा, एबीवीपी और सांसद मनोज तिवारी का छात्रों को समर्थन की बात को प्रमुखता से छापा गया है.
राजस्थान पत्रिका भी इस संदर्भ में अपनी पहली दो कॉलम की स्टोरी में लिखता है कि छात्रों की बढ़ती तादाद और उग्र विरोध प्रदर्शन के बीच नेताओं की गहमागहमी भी शुरू हो गई है.
दैनिक जागरण के दिल्ली संस्करण के तीन कॉलम की स्टोरी में ख़बर कुछ इस प्रकार शुरू होती है कि एसएससी परीक्षा में प्रश्नपत्र-लीक होने के मामले में छात्रों का आंदोलन जारी है. छात्रों के उग्र आंदोलन के कारण होली के बाद भी जेएलएन मेट्रो स्टेशन को सुरक्षा कारणों से नहीं खोला गया. इस ख़बर के संदर्भ में पहली बात यह कि छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से ही चल रहा था. दूसरा ये कि ख़बर का इन्ट्रों जो ख़बर का सार होता है उसमें पांच दिनों से बैठे छात्रों के मुद्दे पर मेट्रो स्टेशन के बंद हो जाने को प्रमुखता दी गई है.
नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान ने इस मामले में अच्छी रिपोर्टिंग की है. जनसत्ता ने भी पर्याप्त रिपोर्टिंग की है. राष्ट्रीय सहारा ने मनोज तिवारी का आयोग से मिलने और मेट्रो स्टेशन के बंद हो जाने को प्रमुखता से जरूर छापा है पर किसी आंदोलनकारी की बाइट नहीं ली गई है.
5 मार्च
चार मार्च रविवार शाम कुछ प्रदर्शनकारी छात्र सांसद मनोज तिवारी के नेतृत्व में एसएससी आयोग के अध्यक्ष से मिलते हैं. आयोग 21 फरवरी को हुई परीक्षा के प्रश्नपत्र-1 होने से जुड़े आरोपों की सीबीआइ जांच की सिफारिश कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग से कराने पर सहमति जताता है.
इस ख़बर को अलग-अलग अख़बार अलग-अलग तरीके से पेश करते हैं. किसी ने अपनी स्टोरी का शीर्षक ‘सीबीआई जांच की तैयारी’ करके लगाई है तो किसी ने सीधे तौर पर ‘एसएससी पेपर लीक की होगी सीबीआई जांच’ लगाई है. किसी ने छात्रों का पक्ष जानने की कोशिश न की. जबकि छात्रों का दावा था कि उनकी आंशिक मांगें ही मानी गई हैं.
नवभारत टाइम्स ने शीर्षक लगाया है “SSC पेपर लीक की CBI जांच से भी स्टूडेंट्स नाखुश.” भास्कर ने भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी के वक्तव्य को ही हेडलाइन बना लिया है. शीर्षक है ‘छात्रों को सीबीआई नोटिस नहीं दिखा सकते, यह सरकारी प्रक्रिया है: लेखी’, इसके साथ उप-शीर्षक है- प्रदर्शन में कुछ ऐसे तत्व भी है जो छात्रों को गुमराह कर रहे हैं.
6 मार्च
दैनिक जागरण ने दिल्ली जागरण पेज पर एसएससी पेपर लीक को लेकर सात कॉलम की एक स्टोरी छापी है पर स्टोरी स्पेस के आधे में एक इनपुट स्टोरी लगाई गई है जिसका शीर्षक है- ‘सियासी रंगत लेने लगा है परीक्षार्थियों का आंदोलन.’
दैनिक भास्कर और जनसत्ता ने सीधे तौर पर सरकार के सीबीआई आदेश को ही ख़बर में स्थान दिया है. छात्रों का किसी प्रकार का पक्ष नहीं रखा गया है. हालांकि नवभारत टाइम्स और अमर उजाला ने इस मामले को स्पष्ट किया है कि छात्र सीबीआई जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चाहते हैं.
7 मार्च
सरकार द्वारा सीबीआई की जांच का आश्वासन भर बस दे देने छात्रों को भरोसा नहीं है. छात्रों की मांग है कि सरकार 2017-18 में हुए एसएससी परीक्षाओं पर सीबीआई जांच का लिखित आदेश दें. नवभारत टाइम्स और राजस्थान पत्रिका ने तो इस ख़बर को जगह ही नहीं दी. अख़बारों में छपी ख़बरों के कॉलम घटने लगे.
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