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यूपी में बुआ-बबुआ, भाजपा को सिर्फ भभुआ
ये हार कभी नहीं भूल पाएंगे ठाकुर…
यूपी में उपचुनाव से ठीक पहले बने समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बीच बने नए समीकरण ने आखिरकार इतिहास रच दिया. फूलपुर की सीट सपा ने बीजेपी को 59,613 वोटों से हराकर जीत ली है. गोरखपुर में भी वोटों के फासले को देखकर माना जा सकता है कि मोदी-योगी की भाजपा यूपी की दोनों लोकसभा सीटों पर हार गई.
गोरखपुर पीठ के महंत और सूबे के सीएम बनने से पहले पांच बार सांसद रहे योगी आदित्यनाथ की सीट को सपा ने बीजेपी से छीन लिया है. सूबे के डिप्टी सीएम और यूपी बीजेपी के बड़े सिपहसालारों में एक केशव प्रसाद मौर्या की लोकसभा सीट फूलपुर भी बीजेपी के हाथ से निकल गई. दोनों सीटों पर अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने बुलंदी के साथ अपना झंडा गाड़ दिया है.
योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या के संसद से इस्तीफे के बाद ये सीटें खाली हुई थी. बीजेपी मानकर चल रही थी कि हर हाल में जीत तो उसकी ही होगी. 2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों सीटों पर करीब तीन लाख वोटों से बीजेपी की जीत हुई थी.
गोरखपुर में ध्वस्त हुआ योगी का किला
गोरखपुर बीजेपी की परंपरागत सीट है. योगी आदित्यनाथ 1998 से लगातार पांच बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते हैं. उससे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ 1989 से लगातार तीन बार इसी सीट से सांसद रहे. पहली बार हिन्दू महासभा के टिकट पर, बाकी दो बार बीजेपी के टिकट पर.
उनसे भी पहले अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ साठ के दशक में दो बार निर्दलीय जीतकर गोरखपुर से सांसद बने थे. कहने का मतलब ये कि गोरखपुर महंत आदित्यनाथ और उनके गुरुओं की अजेय सीट रही है. इलाके में उनका दशकों से दबदबा रहा है. ऐसी सीट से बीजेपी का हारना, वो भी तब जब योगी आदित्यनाथ सूबे के सीएम की कुर्सी पर बैठे हों, बीजेपी के लिए चार सौ चालीस वोल्ट का करंट लगने की तरह है.
जनता ने बीजेपी को दिया करंट
जनता ने करंट की नंगी तार बीजेपी नेताओं को छुआ दिया है. बीजेपी नेताओं की रैलियों में भले ही मोदी… मोदी… और योगी… योगी… के नारे हवा में गूंजते रहे हों, जनता ने जीत के उन दावों को भी उसी हवा में उड़ा दिया है. योगी का अभेद्य किला ऐसे समय ढहा है, जब वो खुद सीएम की कुर्सी पर काबिज हैं. जिस गोरखपुर सीट पर योगी को 2014 में करीब साढ़े पांच लाख वोट मिले थे, तीन लाख के फासले से जीत हुई थी, वहां से बीजेपी उम्मीदवार का हारना ख़तरे की घंटी है.
डिप्टी सीएम की सीट पर बीजेपी हुई साफ
2014 चुनाव के पहले लगातार चार बार फूलपुर को फतह कर चुकी समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर इस सीट पर कब्जा कर लिया है. 2014 में फूलपुर में बीजेपी भले ही पहली बार जीती थी लेकिन डिप्टी सीएम की सीट होने की वजह से तीन लाख के भारी अंतर से जीती हुई सीट पर यूं लुढ़क जाना भी बहुत मायने रखता है. जैसे ही फूलपुर में बीजेपी के पिछड़ने की खबर आई, वहां बुआ-भतीजा जिंदाबाद के नारे लगने लगे. नारे लगाने वाले सपा-बसपा के वो कार्यकर्ता थे, जो अब तक एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे हैं. दो सीटों में एक पर भी बीजेपी जीतती तो थोड़ी लाज बच जाती लेकिन ऐसा हो न सका.
योगी और उनके गुरुओं की सीट पर हारी बीजेपी?
एक-दो महीने पहले तक ये कयास लगाना भी मुश्किल था कि गोरखपुर में बीजेपी का कभी ये हाल हो सकता है. उस गोरखपुर में, जिसके बारे में योगी आदित्यनाथ के समर्थक कहते रहे हैं कि महंतजी अपना खड़ाऊं भी रख दें तो जनता उनके खड़ाऊं को वोट देकर चुन लेगी. इस बार उस खड़ाऊं का इम्तिहान हो गया. जनता ने सपा उम्मीदवार को चुना लिया.
योगी की ताकत और हनक को ऐसा झटका लगा कि उन्हें उबरने में तो वक्त लगेगा ही, बीजेपी के सिपहसालारों और उनके रणनीतिकारों के होश उड़े होंगे. हर बार दो से तीन लाख के अंतर से जीतने वाले योगी के इकबाल को समाजवादी पार्टी और बीएसपी के गठबंधन ने पलीता लगा दिया है.
सपा-बसपा का वो गठबंधन, जिसके लिए औपचारिक तौर पर न तो बैठकें हुईं, न ही साझा संवाददाता सम्मेलन हुआ, न ही सपा-बसपा के बड़े नेताओं की साझा रैलियां हुईं, न ऐसी कोई चुनावी तैयारियां हुईं, फिर भी बीजेपी के पैरों तले जमीन खिसक गई.
सपा-बसपा के साथ आते ही हो गया खेल
उपचुनाव जब सिर पर आ गया, तब बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने सिर्फ इतना कहा था कि बीजेपी को हराने के लिए हम सपा को समर्थन का ऐलान कर रहे हैं. साथ ही मायावती ने ये भी साफ कर दिया था कि ये कोई गठबंधन नहीं है, ना ही आगे के लिए ऐसा कुछ तय हुआ है. बिना किसी ठोस गठबंधन के, सिर्फ सपा को समर्थन के ऐलान से अगर ये नतीजा हो सकता है तो कल्पना की जा सकती है कि अगर दोनों पुख्ता रणनीति और साझा कार्यक्रम के साथ हो जाएं तो बीजेपी के लिए मुसीबत की कहां-कहां और कितनी होगी.
अजेय मानी जाने वाली गोरखपुर सीट पर बीजेपी की पराजय मोदी विरोधी एक नए मोर्चे की बुनियाद भी रख सकता है. विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा की बुरी तरह हार के बाद से ये कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी की विराट छवि के सामने अपने को टिकाए रखने और यूपी की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर संभावनाएं तलाशने के लिए क्या अखिलेश और मायावती का गठबंधन हो सकता है?
राजनीतिक दलों के लिए 2019 का लिटमस टेस्ट है
माना जा रहा था कि दोनों दल इस उपचुनाव में अपने गठबंधन की वाटर टेस्टिंग करेंगे. लिटमस टेस्ट करेंगे. अगर ‘ये साथ’ क्लिक कर गया तो हो सकता है दोनों दल साथ आने की दिशा में सोचने लगें. बीएसपी और सपा का टकराव और दोनों दलों के शीर्ष नेताओं की दुश्मनी का पच्चीस साल पुराना इतिहास है. तो सवाल यही उठ रहे थे कि क्या मायावती और अखिलेश 2019 के चुनाव में मोदी का मुकाबला करने के लिए एक मंच पर आएंगे? ये दोनों साथ आए तो कांग्रेस की क्या भूमिका होगी? ऐसे कई सवालों का जवाब राजनीतिक चिंतक तलाशते रहे हैं. उनके सवालों का जवाब हो सकता है आने वाले कुछ दिनों में मिलने लगें.
2014 में अगर सपा-बसपा साथ लड़े होते तो?
पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की बीजेपी के सामने तीन विपक्ष था. कांग्रेस, सपा और बसपा. एनडीए को 80 में से 73 सीटें मिल गई. बसपा तो साफ हो गई. कांग्रेस से सिर्फ पार्टी हाईकमान सोनिया गांधी और राहुल गांधी जीते. सपा से भी सिर्फ परिवार के चार लोग जीत पाए, जिसमें मुलायम सिंह खुद दो सीटों पर जीते. बाकी सब मोदी की लहर में हवा हो गए.
वोट प्रतिशत के हिसाब से देखें तो उस चुनाव में गैर भाजपा वोटों का बंटवारा न हुआ होता तो बीजेपी के लिए इतनी सीटें जीतना नामुमकिन होता, शायद पचास सीटें पार करना भी आसान नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक सपा-बसपा अगर साथ लड़ी होती तो गठबंधन को करीब 41 सीटें मिलती. बीजेपी को करीब 37 सीटें. अगर बसपा, सपा और कांग्रेस साथ लड़तीं तो इन्हें पचास से ज्यादा सीटें मिल सकती थी.
ये अनुमान हर पार्टी को मिले वोटों के प्रतिशत और गठबंधन की हालत में वोट ट्रांसफर की आदर्श स्थिति की बुनियाद पर टिका है. हो सकता है कि दलों के साथ आने के बाद वोटरों के दिल न मिल पाते तो भी बीजेपी की तीस सीटें कम हो जाती. अब उपचुनाव के इन नतीजों के बाद एक बार फिर 2019 के चुनाव की पूर्वपीठिका पर चर्चाएं तेज हो गई हैं. मोदी बनाम अदर्स का परिदृश्य दिखने लगा है.
बीजेपी के चाणक्य अब चलेंगे कौन सी चाल?
यूपी के इन नतीजों के कई अर्थ हैं. यूपी की दोनों सीटों पर उस बीजेपी की हार हुई है, जिसकी पताका 21 राज्यों में फहरा रही है. राजस्थान की दो लोकसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में कांग्रेस से मात खा चुकी बीजेपी के जख्म पर मरहम पूर्वोत्तर की जीत ने लगा दिया था. उस ग़म को भुला कर विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत जश्न मनाते हुए अमित शाह ने ऐलान कर दिया था कि इस साल होने वाले बाकी राज्यों के चुनाव में भी बीजेपी जीतेगी. फिर बंगाल और उड़ीसा भी जीतेंगे.
2019 में जीत के अश्वमेध का घोड़ा छोड़ने से पहले यूपी से मिले झटके बीजेपी के चाणक्य अमित शाह और स्टार प्रचारक पीएम मोदी को अपनी चुनावी रणनीति पर नए सिरे से सोचने को बाध्य करेगा.
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