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प्रोफ़ेसर लिंडा हेज़ का कबीरमयी हो जाना
पीछे देवास की टेकडी का दृश्य है जिस पर ईएम फास्टर ने ‘द हिल ऑफ देवी‘ जैसा उपन्यास लिखा था और आगे बैंक नोट प्रेस को जाने वाली सड़क है जहां भारत भर के लिए नोट छपते हैं बीच में मित्र अनु और अरविन्द का घर है.
यह सर्दियों की हल्की सी एक दोपहर है और पेड़ों के झुरमुट के बीच हम तीन लोग बैठे हैं और गप लगा रहे हैं. जब कल अरविन्द ने बताया था कि लिंडा आई हुई हैं तो मेरा मन था कि अबकी बार तसल्ली से उनके साथ बैठूंगा और कुछ लम्बी बातचीत करूंगा. आज सुबह अरविन्द ने फोन किया कि आज दोपहर में आ जाओ तो मन प्रसन्न हो गया.
याद आता है लिंडा दो साल पहले अपना दस साला काम खत्म कर निकल गई थीं और तब लगा था कि यह मालवे का आखिरी चक्कर हो, पिछले दिनों प्रहलाद सिंह तिपान्या जी मई–जून में अमेरिका होकर आये तो फेसबुक से पता चला था कि लिंडा को चोट लगी है और वे पूरी निर्भीकता से अपने आपरेशन के फोटो और फिर यहां–वहां के फोटो डालती रही हैं. अभी पिछले हफ्ते ही वे कही बाहर थीं और उनका पोस्ट देखकर ख़ुशी हुई थी. आज उनसे मिलने का योग आया तो बहुत उत्साह से मैं चला गया, जाते समय कुछ ताजे फल ले गया था ताकि गपशप के दौरान हम सब मिलकर कुछ खाते रहें.
अरविन्द के घर जाते ही उन्होंने मुस्कुराकर नमस्ते बोला तो मै भी गर्मजोशी से मुस्कुरा दिया और हाथ जोड़ दिए. घर में गया तो अनु अपने काम में लगी थी और अरविन्द और लिंडा मानो मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. देवास में मराठा शासन रहा, अंग्रेजों के खिलाफ भी प्रजा मंडल जैसे आन्दोलन यहां उभरे हैं और साहित्य संगीत की नगरी होने के कारण मालवा का यह शहर प्रदेश और देश में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है.
यहां की टेकड़ी, उद्योग, कला, चित्रकला, रंगोली कला, नृत्य, संगीत और बैंक नोट प्रेस के कारण यह शहर प्रसिद्ध भी है. हम बैठे हैं बाहर खुले में पेड़ों के नीचे, एक गिलहरी दीवार पर तेजी से दौड़ते हुए तेज आवाज़ में कुछ कह रही है, पेड़ों पर पक्षी शोर मचा रहे हैं, तापमान सामान्य है, मौसम खुशगवार है, अदरख की चाय और हम तीन लोग. बातचीत शुरू होती है हालचाल से, भारत अमेरिका के सम्बन्ध और वर्तमान परिस्थितियों से जो बमुश्किल पांच मिनट में खत्म हो जाती है और मै मुस्कुरा देता हूं.
लिंडा कहती हैं, मैं जब कोई बात करने या इंटरव्यू जैसा करने आता है तो भाग जाती हूं पर आज बैठकर बात करने का मन है क्योंकि आप सब लोग अपने लोग हो जिनके साथ मै पिछले लगभग बीस वर्षों से काम कर रही हूं.
सन 1998 में इलाहाबाद में डा नामवर सिंह ने मुझसे कहा था कि यदि कबीर को जानना समझना है और कुछ काम करना है तो इन लोगों से मिलो, मालवा में जाओ और देखो कि कितना गंभीर काम लोग करते हैं और कैसे सीखते हैं? अगर नामवरजी उस कबीर की छः सौवीं जयंती पर मुझे यह नहीं कहते तो शायद आज हम यहां नहीं बैठे होते. और न ही इतनी बेतकल्लुफी से और बात कर रहे होते.
लिंडा का भारत से पहला जुड़ाव
आज से पचास बरस पूर्व सोलह बरस की एक अमरीकी लड़की कुछ नया सोचती है, हर बार और कुछ करना चाहती है. वह अपने सपनों को अंजाम भी देती है और इक्कीस बरस की उम्र में उठकर भारत जैसे देश में आ जाती है. बनारस शहर में उसका पाला पड़ता है साधू–सन्यासियों और भजन गाने वालों से.
बनारस ही क्यों, क्योंकि वे कहती हैं भारतीय सूफी संतों की परम्परा में तुलसीदास और कबीर का बनारस से गहरा नाता रहा है लिहाजा वे बनारस को अपना उद्देश्य बनाकर आती है और यहां लोगों से मिलती है. उसे सगुण और निर्गुण दोनों मिलते है यहां, जो जनमानस में रचे बसे है.
आज प्रोफ़ेसर लिंडा हेस पचहत्तर साल से ज्यादा की हो चुकी हैं और उनके सपने बहुत बड़े है. सेवा निवृत्ति के बाद वे इन दिनों प्राग के एक प्राध्यापक के साथ चार सौ पेज से ज्यादा और असंख्य संख्यायों से भरी मैनुस्क्रिप्ट के अंग्रेजी अनुवाद का वृहत्तर कार्य कर रही हैं.
बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी के सम्मोहन में वे भटकती हैं, पढ़ती हैं, समझने का प्रयास करती हैं. गंगा का पानी उन्हें उत्साहित करता है, और वे उसी में रचना–बसना चाहती हैं. परन्तु कुछ काम, कुछ परिवार और इस तरह से लौट जाती हैं अमेरिका.
पर भारत का मोह, निर्गुण, सगुण, कबीर, तुलसी, मीरा और सूरदास उनका पीछा नहीं छोड़ते और वे पुनि–पुनि लौटकर आती हैं यहां, ताकि कुछ कर और समझ सकें. सोचिये एक भद्र अमेरिकी महिला जो पढ़ी–लिखी है, स्टेनफोर्ड जैसे विश्वविद्यालय में दक्षिण एशियाई विभाग के संस्कृति एवं भाषा विभाग में प्रमुख रही हो, उसे भारत से इतना प्यार और वो भी यहां के समूचे सूफी आन्दोलन और भक्ति काल के चार बड़े कवियों की कविता से प्रभावित होकर क्या–क्या नहीं किया होगा.
हमारे मौजूदा विश्वविद्यालय के हिंदी विभागों की हालत क्या है इस पर फिर कभी. पर लिंडा हेस ने भारत में आकर समूची भक्ति कालीन परम्परा को आत्मसात कर एक नए प्रकार का विश्लेषण और विचार दिया.
कबीर और तुलसी, दोनों से एकसार रिश्ता
वे कहती हैं– तुलसीदास भी मेरे प्रिय थे और कबीर भी, मीरा भी और सूरदास भी परन्तु कबीर ने मुझे ज्यादा आकर्षित किया क्योंकि कबीर हर बार अपनी बात, अपना संघर्ष, अपना विरोध और अपने तर्क लोगों को सुनाकर कहते है– “सुनो भाई साधौ…” जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण बात है और संसार में अपने तरह का अलग नजरिया भी.
क्योंकि सूर, मीरा और तुलसी में भक्ति चरम पर रहा जबकि कबीर हर जगह सवाल उठाते हैं और विद्रोह भी करते हैं. कबीर यूं लगा जैसे मेरे चित और मन मस्तिष्क पर छाये हुए विद्रोही स्वभाव की ही परिणिति हैं या रिफ्लेक्शन हैं इसलिए मैंने बहुत सोच–विचार कर कबीर पर काम करने का तय किया और जुट गई.
मूल रूप से तो वे बंगाल के मठों और उनके अवधूतों का अध्ययन करने आईं थीं, बंगाली भाषा सीखना चाहती थी पर जब कबीर को देखा, पढ़ा और गुना तो लगा कि यह तो एकदम मेरे स्वभाव के अनुरूप है और इसी में मुझे अब आगे बढ़ना है. गत 50 बरसों से वे लगातार भारत आ रही हैं और एक लंबा समय उन्होंने भारत में बिताया है जो अपने आप में एक बड़ी बात है.
दिल्ली से लेकर बंगलुरु, मुम्बई और और बड़े शहर ही नहीं बल्कि असली भारत के दूरदराज के इलाकों में यात्रा कर भक्तिकाल को समझने वाली संभवतः वे विश्व की पहली महिला होंगी जो दूर देश से आकर दलित, वंचित और हाशिये के समुदाय के लोगों के साथ उन्हीं के घरों में रहकर उन पर शोध का कार्य करती रहीं. यह शायद बड़ी बात ही नहीं बल्कि रेखांकित की जाने वाली उपलब्धि है. प्रोफ़ेसर लिंडा ने इस दौरान हिंदी सीखी, लोक भाषा मालवी सीखी और काम किया.
एकलव्य के द्वारा किये जा रहे काम को जब उन्होंने देखा तो वे मालवा में कबीर की वाचिक परम्परा से प्रभावित हुईं और उन्होंने इस समृद्ध परम्परा पर काम करने की ठानी और फिर सफ़र शुरू हुआ.
मालवा की कबीर मंडलिया
एकलव्य ने सन 1991-92 से मालवा के देवास जिले से कबीर भजन मंडलियों के साथ काम की शुरुआत की थी और इस दौरान एकलव्य के साथियों ने पाया कि यह मंडलियां मुख्य रूप से दलित समुदाय के बीच हैं. यहां लोग दिनभर मेहनत करते हैं और रात को खाना खाकर अपने एकतारे के साथ कबीर को गाते हैं. और सिर्फ गाते ही नहीं वरन सत्संग भी करते हैं कि कबीर जी ने ऐसा क्यों लिखा और आज इसकी क्या उपयोगिता है.
मालवा की कबीर मंडलियों के साथ एकलव्य का यह प्रयोग बरसों चला जहां मंडलिया माह के दूसरे दिन यानी दो तारीख को आती थीं और भजन गाकर चर्चा में शामिल होती थीं. यह बाबरी मस्जिद टूटने का समय था और देश में साम्प्रदायिकता ने अपने पांव ही नहीं पसारे थे बल्कि जमकर स्थापित भी हो गई थी. इसी समय उत्तर प्रदेश में कांशीराम और मायावती दलित राजनीति के नए पैरोकार बन रहे थे और “तिलक, तराजू और तलवार– इनको मारो जूते चार” जैसे नारे दे रहे थे. धार्मिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर था.
ऐसे में कबीर की प्रासंगिकता और आंबेडकर शताब्दी वर्ष के दौरान नए बने डा बाबा साहब अंबेडकर राष्ट्रीय सामाजिक शोध संस्थान, महू एकलव्य देवास को इस तरह के काम में वैचारिक सहयोग दे रहा था. साथ ही भारतीय इतिहास शोध परिषद् ने इस तरह के वाचिक परम्परा के दस्तावेजीकरण के लिए एकलव्य को एक छोटी मदद भी की थी.
कुल मिलाकर यह कबीर को नए तरह से गढ़ने का समय था और ऐसे में प्रहलाद तिपानिया जैसे लोक गायक जो बरसों से गा रहे थे सामने आये. कैसेट का दौर था उनकी पहली कैसेट डा सुरेश पटेल ने जबलपुर में बनवाई और वह इतनी प्रसिद्ध हुई कि हाथों–हाथ बिक गई, एकलव्य पर भी कबीर के भजन की किताब छपने का दबाव था. यह काम अपने तरह का अनूठा था. इतना कि इसमें कारवां बढ़ता ही गया.
शबनम वीरमानी से लेकर अंत में प्रोफ़ेसर लिंडा हेस का आना इस पूरे काम को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता गया. लिंडा ने इस दौरान कबीर के भजनों का अंग्रेजी में अनुवाद कर, कुमार गन्धर्व के द्वारा गाये भजनों का एक संकलन छापा जो प्रसिद्ध हुआ. बाद में वे मालवा की कई मंडलियों के साथ काम करने लगीं.
प्रह्लाद जी के यहां रहकर उन्होंने कबीर के भजन सुने, गुने और उन्हें आत्मसात किया, लोगों से बात की, देशभर के विख्यात बुद्धिजीवी, विश्व विद्यालयों में प्राध्यापकों, निर्गुण और सगुण गाने वालों के साथ लम्बे–लम्बे वार्तालाप किये और एक वृहद् किताब ‘बॉडी ऑफ़ सॉन्ग्स’ लिखी है जो पूरी कबीर की शैली, परम्परा, भक्तिकाल और आज के समय में कबीर की प्रासंगिकता को बयां करती है.
लिंडा बताती हैं कि उनके लिए यह निर्णय बड़ा कठिन था कि वे कबीर चुनें या तुलसीदास. क्योकि दोनों ही भक्तिकाल के महत्वपूर्ण कवि थे और जनमानस में इतने रचे–बसे हैं कि लोग बात–बात में तुलसी या कबीर की बानी को बोलते हैं.
कबीर और तुलसी के उद्धरणों से भारतीय जनमानस ओत–प्रोत है. साथ ही लोग सिर्फ बोलते ही नहीं बल्कि अपने जीवन में आत्मसात करके उन्हें अमल में भी लाते हैं, यह बड़ी बात है. मीरा जहां मेरे तो गिरधर गोपाल कहती हैं, सूरदास पूरे समर्पण से श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हैं, तुलसी दास एक आदर्श जीवन की बात करते हैं. वहीं कबीर में मुझे एक आदि विद्रोही नजर आता है.
उल्लेखनीय है कि अमेरिका में रहकर लिंडा बौद्ध धर्म की अनुयायी हैं और वे कबीर और बुद्ध को बहुत करीब पाती हैं. इसलिए वे कबीर को अपनाती हैं और हिंदी ही नहीं सीखतीं बल्कि मालवी सीखकर मंच पर बाकायदा गाती भी हैं. कभी नारायण जी देल्म्या के साथ या कभी प्रहलाद जी के साथ. उनके लिए कालूराम बामनिया को प्रोत्साहित करना जितना जरुरी है उतना ही वे टोंकखुर्द की लीला बाई और उनकी बहू को भी इतना प्रोत्साहित करती है कि वे आज सशक्त महिला मंडली चला रही हैं और मालवा में इन दिनों ये महिला गायक स्थापित हुई है.
लोग बाकायदा इन्हें चौका आरती में बुलाते हैं. मालवा में इतनी रची–बसी कि रिटायर होने के बाद वे पहली फुर्सत में मित्रों से मिलने आ गईं और अबकी बार बगैर किसी एजेंडे के. पर आज जब मै बॉडी ऑफ़ सोंग्स की बात कर रहा था तो किताब के अनुवाद की बात निकल पड़ी और फिर हम लोग देर तक उस पर बातें करते रहे.
लिंडा बोलीं मै कृतज्ञ हूं कि आपने इस किताब के अनुवाद का विचार मन में किया हालांकि यह कार्य बेहद बड़ा और दुष्कर है पर यदि इसे आप कर पायें तो मैं बहुत आभारी रहूंगी. और वे हाथ जोड़कर झुकाती हैं. यह सहजता और सरलता कहां होती है इस उम्र में और इस स्तर पर जाने के बा.
मुझे हमारे यहां के बौद्धिक लोगों का कृत्रिम आभा मंडल याद आया. बहरहाल, वे देवास में हैं तो कल टेकडी चढ़ आईं. बावजूद इसके कि अभी दो माह पूर्व ही उनका आपरेशन हुआ है पर वे मस्त–मौला हैं और खूब काम करती हैं और खूब पढ़ती है लिखती है.
बॉडी ऑफ़ सोंग्स
बॉडी ऑफ़ सोंग्स की प्रेरणा के बारे में वे कहती हैं कि किताब की शुरुआत एकलव्य के कार्यकर्ता दिवंगत दिनेश शर्मा के एक वाक्य से हुई जिसमें दिनेश ने कहा था कि कबीर ने दो तरह के भजन लिखे, एक सामाजिक और दूसरे धार्मिक. यही वो क्षण था जब उनके दिमाग में कौंधा कि कबीर को भारतीय जनमानस में इस तरह से समझा, देखा और गुना जाता है, इस पर काम करने की जरुरत है.
लिंडा दस साल तक मालवा के गांवों में बार–बार अमेरिका से आकर घूमती रहीं, देश भर के लोगों से विमर्श किया, भारत में हजारी प्रसाद द्विवेदी की किताब “कबीर” और बाद में डा पुरुषोत्तम अग्रवाल की “अकथ कहानी प्रेम की” ही थी जो कबीर को दूर तक ले जाती है.
गायकों में कबीर मंडलियों के अतिरिक्त कुमार गन्धर्व ने ज्यादा गाया और आबिदा से लेकर अन्य लोगों ने भी टुकड़ों–टुकड़ों में. शबनम वीरमानी की चार फिल्मों ने कबीर प्रोजेक्ट के तहत कबीर को दूर–दराज में स्थापित किया. आज कबीर कैफे, कबीर यात्रा जो राजस्थान में हर साल निकल रही है. मालवा या राजस्थान में मेवाती घराने के लोग कबीर पर बेहतर काम कर रहे हैं.
आज के दौर में कबीर
जब मैंने पूछा कि क्या आज के विषाक्त माहौल में कबीर से हमें कोई राह मिल सकती है या कोई समाधान कबीर में नजर आता है? विशेषकर जब कबीर के पंथ और अनुयायी ही आपस में इतने बंटे हुए हैं, तो वो बोलीं कि रास्ता तो किसी के पास भी नहीं है. मेरा देश या आपका देश, आज जिन भी परिस्थितयों से गुजर रहा है वहां लोगों को सही बात के लिए सही तरीकों को अपनाते हुए लड़ना होगा.
अपने इजराईली दोस्त का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वो विद्वान हैं, खूब पढ़ा लिखा है पर फिलिस्तीनियों का समर्थक है और वह उनके समर्थन में मैदान में अड़कर खड़ा हो जाता है, लड़ता है, भिड़ता है, बार बार हारता है पर फिर जुझारू की तरह से पहुंच जाता है.
जब मैं उससे पूछती हूं कि क्यों जाते हो लड़ने तो वह कहता है कि अच्छी बात के लिए अच्छे तरीके से लड़ना कोई गलत नहीं है. हम सबको लड़ना होगा, खूब लड़ना होगा. हम लोग कम हैं तो क्या पर क्या अच्छी बात और न्याय के लिए लड़ना छोड़ दें? बस यही बात कबीर भी कहते थे जो अकेले थे और पूरी हिम्मत से कहते थे– साधौ ये मुर्दों का गांव, राजा मरिहैं, परजा मरिहैं, मरिहैं सारा गांव.
प्रोफ़ेसर लिंडा हेस हमारे लिए एक प्रेरणा ही नहीं, एक ताकत भी हैं जिन्होंने भारत के भक्ति काल के महत्वपूर्ण कवि की रचनाओं को ना केवल अंग्रेजी में अनुदित किया बल्कि दर्शन और आध्यात्म के साथ सामाजीकरण की प्रक्रियाओं को भी विश्लेषित किया. हमें महत्वपूर्ण जमीनी काम बाकायदा दस्तावेजीकृत कर सौंपा है. अब हमारी यह जिम्मेदारी बनती है कि अपनी इस विशाल संस्कृति और परम्परा की थाती को संभाल कर रखें और इसको आगे बढायें.
(सौतुक डॉट कॉम (www.sautuk.com) से साभार)
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