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झारखंड: आदिवासियों के ‘किस ऑफ लव’ से संकट में संस्कृति
पाकुड़ के लिट्टीपारा विधानसभा क्षेत्र में स्थित तालापहाड़ी गांव में 9 दिसंबर की शाम डुमरिया सिद्धो कान्हू मेले में थाईलैंड की तर्ज पर चुंबन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी रही झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के विधायक साइमन मरांडी की.
इस प्रतियोगिता में कुल 18 आदिवासी जोड़े शामिल हुए जिनमें से तीन जोड़े को पुरस्कार भी प्रदान किया गया. पैमाना यह रहा कि ये तीन जोड़े बाकियों की अपेक्षा अधिक देर तक चुंबन कर पाए इसीलिए उन्हें ईनाम दिया गया. हजारों लोगों के सामने अपने प्यार का इजहार करने का आदिवासियों का यह तरीका एकदम से चर्चा में आ गया.
मीडिया में कार्यक्रम की चर्चा के बाद भाजपा ने इस कार्यक्रम पर अपनी गहरी आपत्ति जताई है.
भाजपा के कड़े हमले के बाद साइमन मरांडी ने कहा, “आदिवासी प्यार का इजहार करने में संकोची स्वभाव के होते हैं. ये लोग एक-दूसरे से दिल की बात नहीं कह पाते जिसकी वजह से हाल के दिनों में आदिवासियों के बीच तलाक के मामले भी देखने को मिले हैं. इस तरह के आयोजन संथाल आदिवासियों की समृद्ध संस्कृति और प्रगतिशील विचारों का प्रतीक है.”
झारखंड भाजपा के उपाध्यक्ष हेमलाल मुर्मु ने इसे आदिवासी संस्कृति का माखौल बताया. उन्होंने कहा, “संथाल सभ्यता में लड़के लड़कियां हाथ भी नहीं मिलाते. चुंबन तो बहुत दूर की बात है. संथाल सभ्यता में ‘प्यार का चुंबन’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं है.”
हालांकि भाजपा के विरोध से साबित होता है कि उसे इस देश की आदिवासी पट्टी की परंपराओं का भी ठीक से ज्ञान नहीं है. आदिवासियों की एक बड़ी आबादी में घोटुल की एक परंपरा है. इस परंपरा के तहत अविवाहित आदिवासी युवक और युवतियां गांव से बाहर बने घरों में रात को इकट्ठा होते हैं. नाचते-गाते हैं. और इस प्रक्रिया में अपना योग्य जीवनसाथी चुनते हैं. यौन स्वतंत्रता हमारे देश में सबसे अधिक आदिवासी समाजों में ही मौजूद है. हालांकि किस ऑफ लव एक नई शुरुआत है.
बहरहाल राजनीतिक बयानबाजियां जो भी हों, तालापहाड़ी गांव के लोगों पर इसका कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा हैं. लोगों की प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक है. तालापहाड़ी गांव के निवासी मुकेश अहिरवार (35) कहते हैं, “इतने वर्षों से महिलाओं और पुरूषों को सभ्यता के नाम पर अलग-अलग रखा गया. इस तरह के आयोजन से समाज खुलता है. सोच खुलती है. जोड़ों ने एक दूसरे से जबरदस्ती नहीं की तो किसी दूसरे को क्या दिक्कत है.”
मेला घूमने आईं सुषमा मरांडी कहती हैं कि “इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए. भाजपा वालों ने इसे मुद्दा बनाकर अच्छा ही किया है. कम से कम तालापहाड़ी पर लोगों की नजर तो गई. मैं चाहती हूं वे रघुबर दास को भी इस बारे में बताएं. विधानसभा में तालापहाड़ी की बात गूंजे. सरकारें संथालों को जीने का तरीका बताने के लिए नहीं चुनी गई हैं, वे तालापहाड़ी में बुनियादी सुविधाओं की ओर ध्यान दें.”
मुर्मु ने इसे झामुमो विधायकों और ईसाई मिशनरियों द्वारा रची गई साजिश बताया है. वे कह रहे हैं कि यह मिशनरियों के इशारे पर आदिवासी संस्कृति के साथ खिलवाड़ हो रहा है. उन्होंने कहा कि ये लोग झारखंड और संथाल परगना को रोम और जेरुसलम बनाने पर तुले हुए हैं.
खुलेआम चुंबन प्रतियोगिता पर हिंदू जागरण मंच के संथाल परगना प्रभारी मुकेश कुमार शुक्ला ने भी इस पर कड़ा ऐतराज व्यक्त किया है. उन्होंने कहा कि, “आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित करने व इसे बदमान करने का कुचक्र रचा जा रहा है. इसे किसी भी हाल में चलने नहीं दिया जाएगा.”
उन्होंने कहा कि प्रतियोगिता के आयोजन के खिलाफ हिंदू जागरण मंच दोनों झामुमो विधायक स्टीफन मरांडी व साइमन मरांडी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेगा. उन्होंने दोनों विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग मुख्यमंत्री से की है.
तालापहाड़ी का आयोजन नई दिल्ली में आयोजित ‘किस ऑफ लव’ का ग्रामीण संस्करण है. 2014 में छात्रों ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के झंडेवालान दफ्तर के आगे चुंबन लिया था.
उम्मीद है तालापहाड़ी की घटना मंगलवार से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में छाया रहेगा. भाजपा मांग भी कर रही है कि साइमोन मरांडी को विधानसभा सत्र में आने से रोका जाए. इस कहानी का एक पक्ष यह भी है कि गत विधानसभा चुनाव में मरांडी ने ही मु्र्मु को मात दी थी.
हिंदुवादी संगठनों के विरोध के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा ने मरांडी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और उन्हें आगे से सावधानी बरतने की हिदायत दी है.
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