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भारतीय टीवी मीडिया का आत्म नियमन: मिथक और हक़ीकत

संदर्भ प्रो. गौहर रज़ा बनाम ज़ी न्यूज़

भारत में लोकतंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य के साथ कारोबारी मीडिया के ढांचे के भीतर आत्म नियमन का सिद्धांत और न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन (एनबीए) का सांगठनिक चरित्र एक दूसरे के अंतरविरोधी है?

लोकतंत्र के लिए समाचार माध्यमों (न्यूज़ मीडिया) के रोजमर्रा के कामकाज पर सरकारी ढांचे की निगरानी की अवधारणा को उपयुक्त नहीं माना जाता है और आमतौर पर इस पर सहमति भी दिखती है. लेकिन भारत में जन संचार की कंपनियों द्वारा आत्म नियमन के ढांचे के उपयुक्त नहीं होने के अनुभव मिलते हैं. तीसरा पक्ष यह भी है कि आत्म नियमन के लिए दृढ़ टेलीविजन समाचार चैनलों के कारोबार में लगी मीडिया कंपनियां भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) को मीडिया काउंसिल के रुप में विस्तार करने और उस संस्था की निगरानी के विरोध में भी हैं.

भारतीय समाज को सबसे ज्यादा और गहरे स्तर पर प्रभावित करने वाली संस्थाओं के रूप में जनसंचार (मास मीडिया) के माध्यमों में टेलीविजन के चैनलों को देखा जाता है. लेकिन खासतौर से निज़ी कंपनियों द्वारा संचालित टेलीविजन चैनलों द्वारा परोसी जाने वाली सामग्री और उसके तौर तरीकों से पड़ने वाले प्रभाव को विभिन्न स्तरों पर नकारात्मक महसूस किया जा रहा है. लिहाजा निज़ी कंपनियों के चैनलों की प्रस्तुतियों पर निगरानी के लिए एक ढांचे की आवश्यकता महसूस की जा रही है लेकिन वह ढांचा किस तरह का हो, जो मीडिया कंपनियों द्वारा स्वयं की निगरानी करने की विफलता और सरकारी नियंत्रण के दबाव से मुक्त हो? निगरानी के लिए नये ढांचे की जरूरत को पूरा करने के उद्देश्य से एनबीए के आत्म नियमन के अनुभवों का एक अध्ययन इस लेख में प्रस्तुत है.

तात्कालिक संदर्भ ज़ी न्यूज़ बनाम एनबीए

न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) के चेयरपर्सन न्यायाधीश आर.वी.रवीन्द्रन ने 31 अगस्त 2017 को ज़ी न्यूज़ को 9 अगस्त 2017 को रात नौ बजे अपना निम्नलिखित आदेश प्रसारित करने का आदेश दिया था-

“नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक शंकर शाद (भारत-पाक) मुशायरा के दौरान 5 मार्च, 2016 को प्रो. गौहर रज़ा द्वारा कविता पाठ के बारे में ज़ी न्यूज़ चैनल पर 9 से 12 मार्च 2016 को “अफजल प्रेमी गैंग का मुशायरा” के शीर्षक के साथ प्रसारित कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचारों एवं इस कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल की गई टैगलाइन के लिए “ज़ी न्यूज़” चैनल को खेद है. इसके अलावा ज़ी न्यूज़ चैनल प्रो. गौहर रज़ा तथा उक्त मुशायरें में भाग लेने वालों के बारे में “अफजल प्रेमी गैंग” के नाम से दिए गए विवरण के लिए भी खेद प्रकट करता है.”

ज़ी न्यूज़ को स्क्रीन पर साफ अक्षरों में यह आदेश लिखना था और धीरे-धीरे इस तरह पढ़े जाने का आदेश था ताकि दर्शक/पाठक ठीक से समझ सकें. ज़ी न्य़ूज ने इस आदेश का पालन नहीं किया. ज़ी न्यूज़ द्वारा इस आदेश का पालन नहीं करने पर एनबीएसए ने क्या कार्रवाई की, इसकी जानकारी सार्वजनिक तौर पर नहीं दी गई जबकि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने बहैसियत चेयरपर्सन ज़ी न्यूज़ के खिलाफ अपने आदेश की जानकारी सभी मीडिया को प्रेस विज्ञप्ति के जरिये दी थी. कई अखबारों में इस आदेश की खबर प्रमुखता से छपी. एनबीएसए ने ज़ी न्यूज़ के खिलाफ अपने आदेश को मीडिया को मुहैया कराया था उसके पीछे एनबीएसए का इरादा प्रो. गौहर रज़ा जैसे मामलों से नाराज होने वाले टेलीविजन न्यूज़ के दर्शकों के बीच टेलीविजन चैनलों की साख बचाने की कोशिश करना था.

इंडिया टीवी के संपादक और मालिक रजत शर्मा को भी दिसंबर 2008 में इंडिया टीवी चैनल पर फरहाना अली के झूठे इंटरव्यू को दिखाने की शिकायत के बाद 6 अप्रैल, 2009 को माफी मांगने का आदेश दिया गया था. एनबीएसए ने रजत शर्मा के बारे में अपने फैसले की कॉपी को समाचार एजेंसियों को मुहैया कराने का आदेश दिया था. रजत शर्मा ने उस आदेश को नहीं माना और एनबीएसए की सदस्यता ही छोड़ दी लेकिन एनबीएसए की वार्षिक रिपोर्ट (2009-2010) में इसका विवरण नहीं मिलता है. ना ही सार्वजनिक तौर पर यह आधिकारिक सूचना ही उपलब्ध है कि रजत शर्मा ने आत्म नियमन के सिद्धांतों के तहत एनबीएसए के फैसले को मानने से इंकार कर दिया और एनबीएसए की सदस्यता छोड़ दी लेकिन वे फिर किन शर्तों और एनबीएसए के किन प्रावधानों के आलोक में एनबीए के चेयरमैन व सदस्य चुने गए. रजत शर्मा के इस पूरे घटनाक्रम की चर्चा एनबीए की वेबसाइट पर नहीं मिलती है जबकि वेबसाइट नई तकनीक के रूप में किसी संस्थान के पारदर्शिता के सिद्धांत का आईना मानी जाती है.

एनबीए और एनबीएसए

एनबीए और एनबीएसए का ढांचा इस प्रकार हैं. न्यूज़ चैनलों को नियंत्रित करने वाली कंपनियों की संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन (एनबीए) है. जिसके 24 सदस्य है. इन 24 सदस्यों के 64 चैनल समाचार प्रसारण करते हैं. एनबीए का दावा है कि उनके सदस्य टेलीविजन चैनलों के समाचार दर्शकों के संख्या कुल संख्या में अस्सी प्रतिशत है. एनबीए ने यह भी फैसला किया है कि वह डिजिटल समाचार प्रसारकों को भी इस संस्था की सहयोगी सदस्यता देगा. एनबीए के जितने सदस्य हैं उन्हीं सदस्यों के हितों के लिए यह जिम्मेदार है.

एनबीए ने ही आत्म नियमन यानी प्रसारित होने वाली समाचार सामग्री को लेकर की जाने वाली शिकायतों, आपत्तियों पर सुनवाई के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) बनाई है. इस संस्था के गठन के साथ इसके सदस्यों ने अपने चैनलों के दर्शकों को ये वचन दिया है कि वे अपने द्वारा पत्रकारिता के लिए तैयार किए गए मानदंडों का पालन करेंगे. एनबीए ने अपने इस वचन पर दर्शकों में भरोसा पैदा करने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट की साख का इस्तेमाल किया है और एनबीएसए के चेयरपर्सन के तौर पर सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति करता है. ताकि दर्शकों को इस संस्था द्वारा न्याय की प्रक्रिया के गुजरने एवं आदेशों के पालन होने का भरोसा हो. एनबीए इसके लिए चेयरपर्सन को मानदेय का भुगतान करता है. एनबीएसए की वेबसाइट पर समाचार चैनलों के खिलाफ जो शिकायतें देखने को मिलती है उसके दो हिस्से हैं. पहला वो मामले जिसमें एनबीएसए ने निर्णय लिया है. इस निर्णय का मोटे तौर पर आशय यह है कि उन शिकायतों पर चैनलों के विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई के बिना ही शिकायतों का निपटारा कर दिया गया है. दूसरा हिस्सा आदेश के रूप में है. आदेश का मतलब ये निकलता है कि एनबीएसए के द्वारा अपने सदस्य चैनलों को शिकायत के विरुद्ध खेद प्रकट करने, चेतावनी देने और जुर्माना भरने का आदेश दिया गया है. लेकिन वेबसाइट पर एनबीएसए की वार्षिक रिपोर्ट में यह देखने को नहीं मिलता है कि उसके किन आदेशों को लागू किया गया या लागू नहीं किया गया. आदेश के लागू नहीं करने के हालात में एनबीएसए ने आगे क्या कार्रवाई की.

एनबीएसए

एनबीएसए ने आत्म नियमन के पक्ष में अपने उद्देश्यों व सामग्री के मानको की घोषणा की है. आत्म नियमन के सिद्धांत और समाचार-सामग्री के मानकों को अलग से निर्धारित किया गया है जो कि हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में एनबीए की वेबसाइट पर उपलब्ध है. एनबीएसए और एनबीए के इन दोनों दस्तावेजों का पूरा पाठ उनकी वेबसाइट पर जाकर देखा जा सकता है. आत्म नियमन के पक्ष में मुख्य बातें निम्न है-

किसी भी लोकतंत्र की सफलता का आधार यही है कि इसमें शामिल सभी संगठन और निकाय राजनीतिक संप्रभु-जनता के प्रति वफादार और जवाबदेह बनें. यह पूरी तरह स्पष्ट है कि लोकतंत्र का आधार बरकरार रखने और उसे फलने-फूलने का अवसर देने के लिए यह बेहद जरूरी है कि प्रत्येक नागरिक अपने दिल में स्वतंत्रता की भावना महसूस करे और देश में जो भी नियम कानून बनाए गए हैं, उनके किसी भी प्रकार के उल्लंघन को नाकाम करने के लिए वह पूरी तरह जागरूक भी रहे. महज सत्ता पलट जैसी घटनाओं की वजह से ही लोकतंत्र कमजोर होकर अराजकता में बदल जाता है, बल्कि इसके पीछे बहुत बड़ी वजह गहराई तक जड़ जमा चुका भ्रष्टाचार और अधिकारों का दुरुपयोग भी होता है.
इस समय लोकतंत्र में ही व्याप्त खतरों को उजागर करने के लिए समाचार माध्यम में खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यम (समाचार चैनल) ही सबसे अहम भूमिकाओं में शुमार होता जा रहा है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहुंच और प्रभाव लोकतंत्र को उन लोगों के लिए ज़ीवंत वास्तविकता बनाने में पूरी तरह सक्षम है, जो निरक्षर होने के कारण या किसी अन्य कारण से प्रिंट माध्यम व मीडिया का इस्तेमाल नहीं कर पाते. इससे उन लोगों में शासन की प्रक्रिया का हिस्सा बनने की भावना भी पैदा होती है.

ऐसा माध्यम जो सरकार और सार्वजनिक ज़ीवन में मौजूद खामियों को उजागर करने के लिए ही बनाया गया है, उस पर सरकार की ओर से नियंत्रण तो लाजिमी तौर पर नहीं हो सकता अन्यथा उसकी साख और विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाएगा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह मौलिक सिद्धांत है कि कंटेंट यानी विषय वस्तु के मामले में मीडिया को सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए क्योंकि सेंसरशिप यानी नियंत्रण और स्वतंत्र अभिव्यक्ति एक दूसरे के जन्मजात दुश्मन हैं. ऐसे में खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए निगरानी के संस्थागत तरीके और सावधानियां ईजाद करने का जिम्मा पूरी तरह से पत्रकारिता के पेशे का ही है. ये तरीके ऐसे होने चाहिए, जिनसे वह रास्ता परिभाषित हो सके, जिस पर चलकर संयम और पत्रकारीय नीतियों के उच्चतम मानकों की रचना हो सके और अपने पवित्र संवैधानिक कर्तव्य का निर्वाह करने में जो मीडिया का मार्गदर्शन कर सकें.

भारत में मीडिया का विकास होने से काफी पहले कई अन्य देशों में समाचार मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विकास हो चुका था; उन देशों में स्वशासन के कई मॉडल मौजूद हैं. इन सभी मॉडलों की जो अनूठी विशेषता है, वह अपने ही बीच के लोगों यानी पत्रकारिता के कार्यक्षेत्र से ही जुड़े व्यक्तियों की निर्णायक मंडली के जरिये निगरानी और स्वशासन है.
स्वशासन का ऐसा कोई भी मॉडल, जो खुद पर नियंत्रण रखने के लिए तैयार किया जाता है, उसमें स्वाभाविक तौर पर कुछ कमियां और खामियां होती ही हैं क्योंकि इस मॉडल का पालन करना पूरी तरह स्वेच्छा पर निर्भर करता है. लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं समझा जाना चाहिए कि इस तरह के मॉडल का असर नहीं होता या वे कारगर साबित नहीं होते. उनका असर या उनका प्रभाव इसी तथ्य से आता है, जिसके मुताबिक किसी भी समाचार चैनल की बुनियादी ताकत उसकी उस साख या विश्वसनीयता में निहित होती है, जहां से जन मानस को प्रभावित करने की उसकी क्षमता आती है. इसी के कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों की निर्णायक मंडली अगर इस पर नियंत्रण करती है, तो किसी भी चैनल की विश्वसनीयता पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा.

यह अपरिहार्य हो जाता है कि समाचार चैनल दिशानिर्देश तैयार करें, प्रक्रियागत सावधानियां या सतर्कता तय करें और एक ऐसी संस्था या संगठन गठित करें, जो निगरानी करने वाले निकाय के तौर पर काम करे और शिकायतों का निवारण करने वाला मंच भी हो.

मौलिक या बुनियादी सिद्धांत

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े पेशेवर पत्रकारों को यह स्वीकार करना चाहिए और समझना चाहिए कि वे जनता के विश्वास के पहरुए यानी पहरेदार हैं और इसीलिए उन्हें सत्य की खोज करने और उसे संपूर्ण रूप में पूरी आजादी के साथ और निष्पक्षता के साथ लोगों के सामने पेश करना चाहिए. पेशेवर पत्रकारों को अपने द्वारा किए गए कामों के संबंध में पूरी तरह जवाबदेह भी होना चाहिए.

इस संहिता का उद्देश्य ऐसे व्यापक प्रचलनों को दस्तावेज की शक्ल देना है, जिन्हें न्यूज़ ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) के सभी सदस्य प्रचलन और प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करते हैं. इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को जन सेवा और एकरूपता के उच्चतम संभव मानकों को अपनाने और उन पर चलने में मदद मिलेगी.

समाचार चैनल यह मानते हैं कि पत्रकारिता के उच्च मानकों के साथ जुड़े रहने के मामलों में उनके ऊपर खास किस्म की जिम्मेदारी है क्योंकि जनमत को सबसे ज्यादा प्रभावित करने की ताकत भी उनके ही पास है. मोटे तौर पर समाचार चैनलों को जिन सिद्धांतों पर चलना चाहिए, उनका उल्लेख यहां पर किया गया है.

लोकतंत्र में ख़बरों के प्रसारण का बुनियादी उद्देश्य, लोगों को शिक्षित करना और उन्हें यह बताना कि देश में क्या हो रहा है ताकि देश की जनता महत्वपूर्ण घटनाओं को भली भांति समझ सके और उनके बारे में अपने मुताबिक निष्कर्ष निकाल सके.

आत्म नियंत्रण का सिद्धांत

खुद पर नियंत्रण रखने के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने साझा रूप से स्वीकार किए गए सामग्री संबंधी दिशानिर्देश तैयार किए हैं. इसका उद्देश्य संपादकीय सिद्धांतों को परिभाषित करना है, जो भारत के संविधान में उल्लिखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांत और तत्वों से पूरी तरह मेल खाते हैं. इसके अलावा इन दिशानिर्देशों में नियामक ढांचा तैयार किया गया है, जो टेलीविजन दर्शकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है. आत्म नियंत्रण के लिए बनाए गए इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य उन बुनियादी मूल्यों और लक्ष्यों को समझते हुए उनकी उद्घोषणा करना और उनका भली भांति पालन करना है, जिन्हें समाचार चैनल अंगीकार करते हैं. इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ये सिद्धांत कार्य में भी दिखाई दें महज शब्दों में ही नहीं.

दर्शकों की प्रतिक्रिया

सभी समाचार चैनल अपनी वेबसाइट पर उपभोक्ताओं अथवा दर्शकों की प्रतिक्रिया यानी फीडबैक प्राप्त करने का प्रावधान भी करेंगे. इसके अलावा दर्शकों की विशेष प्रकार की किसी भी शिकायत का उत्तर भी दिया जाएगा. यदि किसी समाचार चैनल को कोई विशेष शिकायत मिलती है और वह सत्य भी पाई जाती है, तो वह अपने प्रसारण के दौरान अर्थात पर्दे पर ही उसे स्वीकार करेगा और दर्शक को संपूर्ण रूप से और निष्पक्ष तरीके से उसका जवाब भी देगा. यदि कोई दर्शक/निकाय किसी समाचार चैनल पर प्रसारित हुए किसी विशेष समाचार से परेशान होता है, तो चैनल दर्शक को संपूर्ण रूप से और बिना किसी पक्षपात के उस शिकायत का जवाब देगा.

एनबीएसए के अधिकार

यदि प्राधिकरण के पास किसी तरह की शिकायत की जाती है अथवा प्राधिकरण के पास यह मानने के पर्याप्त कारण होते हैं कि किसी प्रसारणकर्ता ने आचार संहिता का उल्लंघन किया है अथवा उसकी अवमानना की है तो प्राधिकरण संबंधित प्रसारणकर्ता को सुनवाई का उचित मौका देने के बाद नियमों के दायरे में रहते हुए मामले की जांच करवा सकता है और यदि वह इस बात से संतुष्ट होता है कि ऐसा करना आवश्यक है, तो प्राधिकरण उस प्रसारणकर्ता को लिखित चेतावनी दे सकता है, उसकी भर्त्सना (निंदा) कर सकता है, उस पर प्रतिबंध लगा सकता है, उसके खिलाफ असहमति व्यक्त कर सकता है और/अथवा प्रसारणकर्ता पर जुर्माना भी लगा सकता है और/अथवा संबंधित अधिकारियों से उस प्रसारणकर्ता का लाइसेंस निलंबित/रद्द करने की सिफारिश भी कर सकता है.

इसमें शर्त यह है कि प्राधिकरण 1,00,000 (एक लाख) रुपये से अधिक राशि का जुर्माना नहीं कर सकता है. जुर्माने की इस राशि को संबंधित प्रसारणकर्ता से वसूला जाएगा.

शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया

इन विनियमों में शिकायतों के निवारण की ‘‘द्विस्तरीय’’ प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है जिसके तहत किसी प्रसारक की किसी सामग्री से पीड़ित किसी व्यक्ति को पहले संबंधित प्रसारक के पास शिकायत करनी होगी, जैसा कि बाद में कहा गया है और अगर उसकी शिकायत का समाधान नहीं होता अथवा शिकायतकर्ता संबंधित प्रसारक की ओर से उपलब्ध कराये गये समाधान से संतुष्ट नहीं है तब वह प्राधिकरण के समक्ष शिकायत कर सकता है.

एनबीए (न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन) का उद्देश्य

एनबीएसए द्वारा समाचार-सामग्री के मानकों को निर्धारित करना और आत्म नियमन के सिद्धांतों के पीछे संवैधानिक लोकतंत्र की भावनाओं को जाहिर करना इस संस्था का एक पक्ष हैं. क्योंकि एनबीएसए दर्शकों को संबोधित करने के लिए गठित की गई है और उस संस्था के लिए लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायापालिका के सर्वोच्य पद पर आसीन न्यायाधीश के प्रति नागरिकों के भरोसे को इससे संबंद्ध किया गया है. लेकिन एनबीए ने अपने उद्देश्यों के बारे में जो घोषणाएं की है वह अंतर्विरोधी जान पड़ती है.

एनबीए स्वयं को समाचार एवं समसामयिक चैनलों का खुद को आंख-कान बताया है और उनके साझा हितों में विभिन्न स्तरों पर पैरवी करने की घोषणा करता है. इसकी भाषा इस उद्योग के आर्थिक पक्षों को संबोधित करती है. लोकतंत्र और संविधान आर्थिक ढांचे का शब्द ही नहीं है. लिहाजा इन उद्देश्यों में लोकतंत्र और संविधान के हित शामिल नहीं है.
इसका विश्लेषण इस रुप में सामने आता है कि चैनलों के मालिकों की संस्था ने अपनी निगरानी में दर्शकों की शिकायतों को सुनने के लिए एक निगरानी संस्था का गठन किया है. आत्म नियमन एक महान लोकतांत्रिक मूल्य हैं और उसे अपने केवल खुद के आर्थिक व सामाजिक-सांस्कृतिक हितों के अनुरूप नहीं ढाला जा सकता है. आत्म नियमन का सिद्धांत केवल अपने हितों की सुरक्षा और उनके विस्तार के लिए हो तो वह आत्म नियमन का सिद्धांत नहीं रह जाता है. बल्कि आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक हितों के लिए इस सिद्धांत को एक आड़ के रूप में इस्तेमाल करने के पूंज़ीवादी सिद्धांत का एक हिस्सा हो जाता है.

प्रो. गौहर रज़ा का मामला

नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक शंकर शाद (भारत पाक) मुशायरे के दौरान 5 मार्च, 2016 को प्रो. गौहर रज़ा ने कविता पाठ किया. इसमें उन्होंने लोकप्रिय नाटककार सफदर हाशमी की हत्या को लेकर 1989 में लिखी गई एक कविता थी. दूसरी कविता इराक में दो पत्रकारों की हत्या की घटना को लेकर थी और तीसरी कविता उन्होंने 2016 में लिखी थी. यह समारोह उर्दू की नज्मों के जरिये भारत पाकिस्तान के बीच सांझी सांस्कृतिक विरासत के आधार पर भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया जाता रहा है. 5 मार्च, 2016 के इस कार्यक्रम को ज़ी न्यूज़ चैनल पर 9 से 12 मार्च, 2016 तक लगातार “अफजल प्रेमी गैंग का मुशायरा” के शीर्षक के साथ प्रसारित किया गया. कार्यक्रम के लिए इस्तेमाल की गई टैगलाइन में देशद्रोही शायर और अफजल गुरु के लिए कविता की रात जैसे शीर्षक इस्तेमाल किए गए. “ज़ी न्यूज़” चैनल ने प्रो. गौहर रज़ा के साथ उक्त मुशायरे में भाग लेने वालों के बारे में “अफजल प्रेमी गैंग” का इस्तेमाल किया. चैनल ने इस सांस्कृतिक कार्यक्रम के दृश्यों को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 9 फरवरी, 2016 की घटनाओं के उन वीडियो को भी दिखाया जिसमें देशद्रोही नारे लगाने का दावा किया गया था. जो वीडियो बाद में फर्जी साबित हुए.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उक्त कथित वीडियो को दिखाने के साथ ज़ी न्यूज़ ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि ये ऐसा गिरोह है जो भारत के टुकड़े करने वाली सोच के साथ खड़ा दिख रहा है.

इसकी शिकायत गौहर रज़ा ने ज़ी न्यूज़ से की और ये मांग की कि वह अपने इस कार्यक्रम के लिए चैनल के जरिये माफी मांगें और उक्त कार्यक्रम को वेबसाइट, सोशल मीडिया व इंटरनेट के साथ तमाम जगहों से हटाए. उन्होंने हर्जाने के तौर पर एक करोड़ रुपये की भी मांग की. लेकिन ज़ी न्यूज़ ने अपने कार्यक्रम को पत्रकारिता के मानदंडों के अनुरुप होने का दावा किया.

गौहर रज़ा की इस शिकायत के साथ ही 16 मार्च, 2016 को हिन्दी के कवि अशोक वाजपेयी, शुभा मुदगल, शर्मिला टैगौर और साईदा हमीद ने भी संयुक्त रुप से एक शिकायत दर्ज की. ज़ी न्यूज़ द्वारा अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति को उचित ठहराने के दावे के खिलाफ दोनों शिकायतकर्ताओं ने एनबीएसए में अपील दायर की. जिसके जवाब में ज़ी न्यूज़ ने अपने कार्यक्रम को मानकों के अनुरूप बताने के लिए यह तर्क दिया कि यदि गौहर रज़ा ने अपने कविता पाठ में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का संदर्भ नहीं दिया होता और उसकी प्रस्तुति भिन्न होती.

एनबीएसए ने 12 जुलाई को दोनों पक्षों की ओर से वकीलों की एक फौज के साथ इस अपील पर सुनवाई पूरी कर लेने के बाद ये पाया कि ज़ी न्यूज़ ने गौहर रज़ा को पाकिस्तानी कवियों के साथ समारोह में मौजूदगी को देश विरोधी शायर के रूप में चित्रित इसीलिए किया क्योंकि उन्होंने अपने कविता पाठ में जेएनयू और छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार का संदर्भ दिया था और चूंकि कन्हैया कुमार के खिलाफ जेएनयू में देश विरोधी एक मीटिंग में शामिल होने का आरोप है और उस मीटिंग में अफजल गुरू की तस्वीर लगाई गई थी एवं वह अफजल गुरू के समर्थन में थी. लेकिन एनबीएसए ने अपनी जांच में कहा कि गौहर रज़ा ने अपने कविता पाठ के दौरान महज जेएनयू, कन्हैया कुमार और रोहित वेमुला का केवल संदर्भ दिया था और इसकी वजह से समारोह के आयोजक, कवि और समारोह के श्रोताओं को अफजल प्रेमी गैंग कहना घोर आपत्तिजनक है. जबकि गौहर रज़ा ने अपनी कविता पाठ के दौरान अफजल गुरू का नाम तक नहीं लिया था.

सुनवाई के बाद एनबीएसए के चेयरपर्सन ने अधिकतम एक लाख रुपये के जुर्माने का आदेश दिया और 8 सितंबर, 2017 को रात नौ बजे हर बारह मिनट के अंतराल पर पांच बार खेद व्यक्त करने का आदेश दिया. लेकिन ज़ी न्यूज़ ने उस आदेश का पालन नहीं किया.

रजत शर्मा के खिलाफ शिकायत

30 दिसंबर 2008 को अमेरिका में लेखक, लेक्चरर और नीतियों की विश्लेषक फरहाना अली ने ई-मेल के जरिये रजत शर्मा की कंपनी न्यूज़ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड के चैनल इंडिया टीवी में 23 दिसंबर के आसपास एक स्टोरी को लेकर अपनी शिकायत भेजी. इंडिया टीवी ने फरहाना अली का एक वैसा इंटरव्यू प्रसारित किया जो कि उन्होंने इंडिया टीवी को दिया ही नहीं था. फरहाना अली ने न्य़ूज एजेंसी रॉयटर को एक इंटरव्यू दिया था जो कि अंग्रेज़ी में था लेकिन इंडिया टीवी ने उसे हिन्दी में प्रसारित किया. फरहाना अली न तो हिन्दी जानती है और ना ही बोल सकती है. इंडिया टीवी ने यह इंटरव्यू इंटरनेट से डाउनलोड किया था और उसे चैनल पर इस तरह से प्रसारित किया ताकि दर्शकों को यह लगे कि उन्होंने इंडिय़ा टीवी को वह इंटरव्यू दिया है.

उस स्टोरी में इंडिया टीवी ने फरहाना अली को अमेरिकी सरकार यानी सीआईए की जासूस कहा जबकि वे अमेरिका की सरकार की जासूस नहीं हैं. रॉयटर ने अपनी स्टोरी में फरहाना अली को भारत समर्थक और पाकिस्तान विरोधी बताया था. फरहाना अली पाकिस्तान में जन्मी हैं और इस तरह से स्टोरी देने से पाकिस्तान में उनके मित्रों व परिवार के रिश्तों के बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया. फरहाना अली ने एनबीएसए के नियमों के अनुसार जब इंडिया टीवी को अपनी शिकायत भेज़ी तो उसके जवाब में चैनल ने स्टोरी के प्रसारित किए जाने से ही आनाकानी की. लेकिन फरहाना अली ने इंडिया टीवी से ये गुजारिश की कि उनकी स्टोरी से वह पाकिस्तान के उग्रवादियों के निशाने पर आ सकती है व यह उनके ज़ीवन और मौत का सवाल है लिहाजा चैनल को इस स्टोरी को वापस लेना चाहिए और इसकी सूचना इंटरनेट पर भी डालनी चाहिए. शुक्र यह था कि फरहाना अली के बार-बार शिकायत करने पर इंडिया टीवी ने यह स्वीकार कर लिया कि वह स्टोरी प्रसारित की गई थी. लेकिन इंडिया टीवी ने साफ तौर पर ये कहने से इंकार कर दिया कि उसने जो स्टारी प्रसारित की थी वह अपुष्ट सूत्रों के हवाले से दी गई थी. बल्कि इंडिया टीवी ने फरहाना अली को यह सलाह दी कि वह रॉयटर को एक पत्र लिखकर ये मांग करें कि रॉयटर अपनी स्टोरी को वापस ले रहा है या उसमें संशोधन कर रहा है.

लेकिन फरहाना अली ने 14 जनवरी 2009 को फिर कहा कि इंडिया टीवी ने उन्हें सीआईए का एजेंट करार दिया है. आखिरकार इंडिया टीवी ने 3 मार्च 2009 को उस स्टोरी का खंडन ये बताते हुए प्रसारित किया कि फरहाना अली ने इंडिया टीवी को कोई इंटरव्यू नहीं दिया था और उनके संबंध में जो स्टोरी प्रसारित की गई थी वह मीडिया में आई खबरों पर आधारित थी जिसकी पुष्टि नहीं की गई थी. लेकिन इंडिया टीवी ने फरहाना अली की बार-बार की शिकायत के आधार पर स्टोरी का खंडन जारी नहीं किया था बल्कि फरहाना अली ने 6 फरवरी, 2009 को जब अपनी अपील एनबीएसए के समक्ष दायर कर दी और उस पर कार्रवाई करते हुए एनबीएसए ने इंडिया टीवी को कारण बताओ नोटिस जारी किया तब इससे बचने के इरादे से इंडिया टीवी ने 3 मार्च को खंडन प्रसारित किया था.

आखिरकार एनबीएसए ने इस अपील पर सुनवाई पूरी की और 6 अप्रैल, 2009 को इंडिया टीवी चैनल को एक लाख रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया. इसके साथ ही चेयरपर्सन न्यायाधीश जेएस वर्मा ने सात दिनों के अंदर इंडिया टीवी पर रात आठ और नौ बजे के बीच हर बारह मिनट के अंतराल पर निम्न बातें प्रसारित करने का भी आदेश दिया. “इंडिया टीवी दिसंबर 2008 में फरहाना अली के सम्बन्ध में प्रसारित स्टोरी के लिए माफी मांगता है क्योंकि वह तथ्यहीन थी और इससे फरहाना अली को होने वाले नुकसान के लिए हमें खेद है.”

इंडिया टीवी ने आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया और एनबीए की सदस्यता छोड़ देने का ऐलान किया. लेकिन वो किन शर्तों के आधार पर दोबारा एनबीए के सदस्य हो गए, इसकी जानकारी सार्वजनिक तौर पर जाहिर नहीं है और 2014 में रजत शर्मा को एनबीए का अध्यक्ष चुन लिया गया.

संसद की स्थायी समिति

संसद में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति ने 2008 में टेलीविजन चैनलों के विभिन्न स्तरों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव के मद्देनजर एक अध्ययन किया. इस अध्ययन का विषय टेलीविजन चैनलों के लिए सक्रिय टीआरपी की प्रणाली थी क्योंकि नकारात्मक सामग्री और प्रस्तुति के मूल में पूंज़ीवादी टेलीविजन चैनलों द्वारा कथित तौर पर टीआरपी की प्रतिस्पर्धा है. टीआरपी के आधार पर ही टेलीविजन चैनलों को अपने कार्यक्रम की सामग्री और प्रस्तुति करने का दबाव बनता था ताकि उन्हें ज्यादा से ज्यादा बाजार से विज्ञापन का राजस्व हासिल हो सकें.

स्थायी समिति के अध्ययन से पूर्व और अध्ययन के दौरान टेलीविजन चैनलों के लिए टीआरपी के मानक व प्रक्रिया बहुराष्ट्रीय पूंज़ीवादी कंपनी के नियंत्रण में रही है. संसद की स्थायी समिति ने टीआरपी की प्रणाली में बड़े स्तर पर खामी पाई. (जन मीडिया का टीआरपी अंक, सितम्बर 2012) टीआरपी की प्रणाली के तहत कुछेक सौ दर्शकों के मनपसंद के आधार पर टेलीविजन चैनलों के लिए रेटिंग निर्धारित की जाती थी. यह दर्शक वर्ग आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भारतीय समाज में परंपरागत रूप से वर्चस्व रखने वाले वर्ग के रूप में पहचाना जाता है. सरकार ने टेलीविजन चैनलों की सामग्री और प्रस्तुति को लेकर संहिता के तौर पर कानून बनाया था लेकिन निगरानी के लिए कोई उपयुक्त ढांचा मौजूद नहीं था. 2005, 2006 और 2007 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को टेलीविजन चैनलों को केबल टेलीविजन नेटवर्क (रेगुलेशन) के तहत विज्ञापन व कार्यक्रम के लिए निर्धारित संहिता का उल्लंघन करने के आरोप में 221 कारण बताओ नोटिस जारी करने पड़े थे और उनमें 67 मामलों में सरकार ने आदेश, सलाह, खेद व्यक्त करने और चेतवानी देने जैसी कार्रवाईयां की थी. संसद की इस समिति को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि सरकार द्वारा टेलीविजन चैनलों के खिलाफ शिकायत मिलने के बाद उन पर कार्रवाई की स्थिति में टेलीविजन चैनल न्यायालयों में याचिकाएं डाल देते हैं. उनका तर्क होता है कि सरकार के पास चैनलों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है.

प्रसंगवश 30 अगस्त, 2007 को इंडिया लाइव चैनल ने गणित की एक शिक्षिका उमा खुराना द्वारा अवैध यौन धंधे में संलग्न होने के झूठे आरोप को प्रचारित करने के इरादे से एक फर्जी स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित किया था. इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के बाद एक नाराज भीड़ ने उमा खुराना पर हमला किया जिसमें उनकी मौत तो नहीं हुई लेकिन उन्हें जीवन भर झेलने के लिए दर्द जरूर मिला. उमा खुराना को शिक्षिका के पद से हटा दिया गया था. स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर उन्हें दस दिनों तक पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल में रखा. उच्च न्यायालय ने इस स्टिंग ऑपरेशन को फर्जी करार दिया. उस समय लाइव इंडिया के संपादक सुधीर चौधरी थे जो कि प्रो. गौहर रज़ा के खिलाफ सामग्री प्रचारित करने के वक्त ज़ी न्यूज़ के संपादक है. सरकार ने इसके खिलाफ कार्रवाई की और एक महीने तक चैनल से प्रसारण को बंद करने का आदेश दिया.

सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर (ईएमएमसी) की स्थापना जरूर की जिससे सरकार को ये सुविधा हासिल हो सकें कि किसी शिकायत के बाद टेलीविजन चैनलों द्वारा प्रसारित कार्यक्रमों के वीडियो के आधार पर उसकी जांच की जा सकें. संसद की स्थायी समिति ने कार्यक्रम और विज्ञापनों के लिए निर्धारित संहिता के उल्लंघन की घटनाओं पर निगरानी रखने के लिए ईएमएमसी को ही पर्याप्त नहीं माना.

एनबीएसए के लिए दबाव

टेलीविजन के समाचार चैनलों के विरूद्ध आक्रोश और शिकायतों के सिलसिले पर नजर डालें तो ये साफतौर पर दिखता है कि 64 टेलीविजन चैनलों ने स्वयं की पहल से एनबीएसए का गठन नहीं किया है. टेलीविजन चैनलों की प्रस्तुतियों से भारतीय समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के मद्देनजर सरकार ने टेलीविजन चैनलों के नियंत्रकों के समक्ष ये एक विकल्प के तौर पर निर्देशित किया कि टेलीविजन चैनल उद्योग अपने कार्यक्रमों, सामग्री और प्रस्तुति पर निगरानी के लिए संस्था का गठन करें. जिसे प्रसारण क्षेत्र में आत्म नियमन के लिए दिशा-निर्देश की रिपोर्ट-2008 के नाम से जाना जाता है. यह समाचार और समसामयिक चैनलों के साथ मनोरंजन के टेलीविजन चैनलों के लिए भी तैयार किया गया था.

इसके तहत एनबीए जैसी संस्था को अपने लिए एनबीएसए जैसी ईकाई को स्थापित करना शामिल था जिसे चैनलों को मिलने वाली शिकायतों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के हालात में अपील पर सुनवाई करने और अपनी तरफ से कार्रवाई करने का सीमित अधिकार हो. इसके साथ ही निगरानी के ढांचे में तीसरे स्तर की संस्था भारतीय प्रसारण निगरानी प्राधिकरण (Broadcasting Regulatory Authority of India) को कार्यक्रम और विज्ञापनों के लिए निर्धारित संहिता का उल्लंघन करने के मामलों में कार्रवाई करने के लिए अधिकार दिया जाना शामिल था. इन दिशानिर्देशों के आलोक में एनबीए ने नीति संहिता और प्रसारण मानक एवं समाचार प्रसारण मानक नियमावली तैयार की.

समाचार–सामग्री मानक एवं संहिता का इतिहास

भारत में प्रिटिंग तकनीक पर आधारित कारोबारी जन संचार माध्यमों के विस्तार के साथ-साथ समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में सामग्री और उसकी प्रस्तुति को लेकर मानक संहिता तैयार करने का दबाव उभरता रहा है. भारत में पत्रकारिता को सामाजिक परिवर्तन की प्रतिबद्धता और समाज सेवा की भावनाओं को व्यक्त करने के एक माध्यम के रूप में देखा जाता रहा है. लेकिन भारत में समाचार माध्यमों को नियंत्रित करने वाली अधिकतर कंपनियां व व्यक्तियों के समूह अपने दूसरे कारोबार में सहयोग लेने के इरादे से न्यूज़ के कारोबार को जारी रखते हैं, ये तथ्य के रूप में स्पष्ट होता चला गया. जन संचार माध्यमों को नियंत्रित करने वाली कंपनियों व उसके मालिकों के हितों और परंपरागत तौर पर समाचारों व अन्य सामग्री के प्रसारण के लिए निर्धारित मानदंडों के बीच टकराव की घटनाएं स्पष्ट तौर पर सामने आने लगी.

प्रथम प्रेस आयोग ने भारतीय प्रेस परिषद का गठन करने के पीछे समाचार व अन्य सामग्री के लिए मानक तैयार करने और उस पर निगरानी रखने वाली संस्था की जरूरत को पूरा करने का उद्देश्य था. दूसरे प्रेस आयोग के गठन से पूर्व आपातकाल के दौरान 17 संपादकों की एक कमेटी ने संपादकों व पत्रकारों के लिए एक संहिता तैयार की थी जिसे 8 जनवरी, 1976 को राज्यसभा में पेश किया गया था. लेकिन दूसरी तरफ मान्यता प्राप्त संस्था एडिटर्स गिल्ड का मानना था कि जिम्मेदारी का एहसास करने वालों को किसी संहिता की जरूरत नहीं होनी चाहिए. एक तरह से पत्रकारों के लिए किसी संहिता की जरूरत का यह विरोध था. यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के उस पक्ष की आखिरी आवाज थी जो कि पत्रकारिता को सामाजिक प्रतिबद्धता का माध्यम मानता रहा है.

दरअसल औपचारिक संहिता और सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में गुंथी संहिता के इस द्वंद्व को स्पष्ट करने का वह दौर था जिसमें अनौपचारिकता की जगह खत्म होती जा रही थी. यह स्पष्ट था कि पत्रकारिता को लोकतंत्र की संस्था के बजाय विभिन्न स्तरों पर अपने हितों को पूरा करने वाली संस्था के रूप में उसका इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति हावी हो रही है. मसलन कई स्तरों पर संसदीय मर्यादा व मान्यताएं औपचारिक तौर पर संहिता में दर्ज नहीं है लेकिन उनका पालन लिखित नियमों से भी ज्यादा संवेदनशीलता के साथ होता रहा है. लेकिन भूमंडलीकरण के तहत आर्थिक स्तर पर नये संबंधों को विकसित करने के फैसले के बाद लोकतंत्र की भावनाओं को औपचारिकताओं के दायरे में बांधने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया गया. संहिता बद्धता के लिए पारदर्शिता की आड़ का इस्तेमाल किया गया. संसद में भी आचार संहिता को सक्रिय किया गया.

भारतीय प्रेस परिषद ने 1991 के बाद पत्रकारों व संपादकों के लिए जितनी संहिताएं जारी की है उसके मुकाबले अतीत में उनकी संख्या बेहद कम रही है. भूमंडलीकरण की नीतियों का यह अहम हिस्सा रहा है कि सार्वजनिक नियंत्रण की संस्थाओं को खत्म किया जाए और आर्थिक शक्तियां स्वयं ही अपने खिलाफ शिकायतों को निपटाने की प्रक्रिया पूरी करेगी. आर्थिक शक्तियां अपना विकास स्वयं कैसे करें इसके अधिकार को टेलीविजन क्षेत्र के संदर्भ में समझना हो तो टीआरपी की पूरी प्रणाली को सामने रखा जा सकता है. टीआरपी का उद्देश्य आर्थिक शक्तियों का विस्तार करना रहा है और आर्थिक शक्तियों का उद्देश्य लोकतंत्र की भावनाओं के विकास के साथ नहीं जुड़ा होता है. आर्थिक हितों का टेलीविजन चैनलों के साथ रिश्ता ज्यादा गहरा इसीलिए भी है क्योंकि भारतीय समाज में इसे सबसे ज्य़ादा प्रभावकारी जनसंचार माध्यम के रूप में महसूस किया गया.

आर्थिक हितों के मद्देनजर 1995 के बाद अपने विस्तार के क्रम में टेलीविजन चैनलों ने बहुत जल्दी ही पुराने मानकों व संहिताओं को स्वीकार नहीं करने वाले माध्यम के रूप में अपनी छवि बना ली. आपातकाल के दौरान सरकारी नियंत्रण को नामंजूरी लोकतंत्र की एक विचारधारा का रूप ले चुकी है. इसका टेलीविजन चैनलों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए इस्तेमाल किया.

मीडिया काउंसिल बनाम एनबीए का आत्म नियमन

नेशनल ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन (एनबीए), भारतीय प्रेस परिषद को मीडिया परिषद बनाने के प्रस्ताव का विरोध किया है. भारतीय प्रेस परिषद का गठन प्रथम प्रेस आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर किया गया था. परिषद प्रिंट तकनीक पर आधारित जन संचार के प्रकाशनों–पत्र पत्रिकाओं पर निगरानी की जिम्मेदारी का निर्वहन करती है. इसकी गतिविधियों से प्राप्त अनुभव के आधार पर इसे सफेद हाथी की संज्ञा दी जाती है.

भारतीय प्रेस परिषद प्रिंट में समाचार सामग्री के मानकों के उल्लंघन की घटनाओं की सुनवाई तो करता है लेकिन वह मानकों के उल्लंघन की घटनाओं को रोकने में नाकाम रहा है. यहां तक कि पेड न्यूज़ के संबंध में तैयार की गई अपनी रिपोर्ट को भी उसे समाचार पत्रों के मालिकों के दबाव में संशोधित करना पड़ा. इसी भारतीय प्रेस परिषद ने टेलीविजन चैनलों के विस्तार के बाद इस संस्था का विस्तार मीडिया परिषद के रूप में करने का प्रस्ताव 27 अगस्त, 2012 को पारित किया ताकि टेलीविजन चैनलों को भी परिषद की परिधि में शामिल किया जा सके. लेकिन एनबीए ने इस पर अपना सख्त विरोध जाहिर किया. एनबीए ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर परिषद के चेयरमैन न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के इस बयान पर भी कड़ा एतराज जाहिर किया कि एनबीए के आत्म नियमन का ढांचा पूरी तरह विफल साबित हुआ है. एनबीए ने प्रधानमंत्री को यहां तक लिखा कि एनबीएसए का गठन अक्टूबर 2008 में ही हुआ है. 4 नवंबर, 2011 को लिखे गए इस पत्र में एनबीए ने यह दावा किया कि तीन वर्षों से एनबीए लगातार टेलीविजन चैनलों के स्तर को लगातार उन्नत करने के प्रयास किए जा रहे हैं और इसके लिए टेलीविजन चैनलों को दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं. साथ ही समाचार सामग्री के मानक और आचार संहिता तैयार की गई है.

भारतीय प्रेस परिषद के चेयरपर्सन द्वारा मीडिया परिषद के रूप में इसके विस्तार के तर्क को खारिज करते हुए एनबीए ने प्रधानमंत्री के समक्ष यह जानकारी दी कि 2008 से पत्र लिखे जाने तक 198 शिकायतों पर सुनवाई की गई. 2010-2011 में 152 शिकायतों पर सुनवाई की गई और कुल नौ ब्राडकास्टर के खिलाफ आदेश जारी किए गए हैं. इसमें एक लाख रुपये का जुर्माना लगाने के आदेश की भी चर्चा की गई हैं लेकिन एनबीए ने इन आदेशों के लागू होने या लागू नहीं होने के बारे में किसी जानकारी का उल्लेख पत्र में नहीं किया है. एनबीए को टेलीविजन चैनलों के लाइसेंस के रद्द करने की अनुशंसा करने का भी अधिकार प्राप्त है लेकिन किसी चैनल के खिलाफ इस तरह की अनुशंसा नहीं की गई है.

आम दर्शक के लिए अनुपयुक्त एनबीएसए का ढांचा

एनबीएसए एक अपीलीय प्राधिकरण है टेलीविजन चैनलों द्वारा शिकायत पर कार्रवाई से संतुष्ट नहीं होने की स्थिति में एनबीएसए के समक्ष अपील दायर की जा सकती है. टेलीविजन चैनलों का संगठन होने के नाते एनबीएसए और एनबीए को भाषा के महत्व के बारे में न जानकारी हो ये मानना मुश्किल है. देश में भाषावर चैनलों में एक भाषा के रूप में हिन्दी के चैनलों की संख्या सबसे ज्यादा है. लेकिन सबसे ज्यादा दर्शक क्षेत्रीय चैनलों के हैं. इसे आंकड़ों के रूप में देखने और उनका विश्लेषण एनबीए की वेबसाइट पर देखा जा सकता है. एनबीएसए ने उन दर्शकों की ही शिकायत सुनने का प्रावधान किया है जो कि उसके समक्ष दो भाषाओं हिन्दी और अंग्रेज़ी में शिकायत देने में सक्षम हैं. उसकी वार्षिक रिपोर्ट भी केवल अंग्रेज़ी में ही देखने को मिलती है. एनबीए और एनबीएसए के कामकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही है. हिन्दी में केवल दिशानिर्देश और आचार संहिता ही वेबसाइट पर उपलब्ध है. शिकायतों और उस पर आधारित फैसले व आदेश की प्रति भी अंग्रेज़ी में ही मिलती है. भाषा संप्रेषण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है. एनबीएसए के समक्ष शिकायत संबंधी जानकारियां हिन्दी में उपलब्ध नहीं है. एनबीएसए देश का सुप्रीम कोर्ट नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की भाषा केवल और केवल अंग्रेज़ी है. लेकिन एनबीएसए के समक्ष करोड़ों की तादाद में वे दर्शक हैं जो कि अंग्रेज़ी भाषा नहीं जानते व नहीं समझते हैं. अंग्रेज़ी के माध्यम होने की वजह किसी सामान्य नागरिक को एक खास वर्ग के वकीलों के जरिये ही सुप्रीम कोर्ट में फरियाद करनी पड़ती है और उसी वर्ग के द्वारा अनुवाद की भाषा में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी उसे मिल सकती है. एनबीएसए में भी वकीलों के साथ पेश होने की छूट हैं. अंग्रेज़ी के कामकाज का माध्यम होने और वकीलों के प्रावधान से ये लगता है कि एनबीएसए बेहद कानूनी तकनीकी स्तर पर अपीलों की सुनवाई करता है. प्रो. गौहर रज़ा बनाम ज़ी न्यूज़ के मामले में ये देखा गया कि ज़ी न्यूज़ की तरफ से कई नामी गिरामी वकील मौजूद थे और प्रो. गौहर रज़ा को भी वकीलों के जरिये अपनी अपील पर बहस करनी पड़ी. सामान्य दर्शक ये सोच भी नहीं सकता है कि टेलीविजन के चैनलों की किसी सामग्री से उसका किसी भी स्तर पर अहित हुआ हो व सामाजिक स्तर पर वह सामग्री को नुकसानदेह समझता हो तो उसकी शिकायत व अपील के लिए वह उपयुक्त आर्थिक-नागरिक है. देश में नागरिकों के बीच विभेदीकरण का यह एक उदाहरण है.

एक नागरिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर ताकवर महसूस करता है. दूसरे तरह का नागरिक केवल आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर अपने को सुरक्षित महसूस कर सकता है. लेकिन एक नागरिक को केवल संविधान में नागरिकता के न्यूनतम प्रावधानों को पूरा करने के कारण ही महज नागरिक का दर्जा प्राप्त होता है. वह आर्थिक व सामाजिक स्तर पर इस रूप में सक्षम नहीं होता है कि वह संविधान में दूसरे नागरिकों की तरह अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें. एनबीएसए के प्रावधान दर्शकों में इसी तरह का विभेदीकरण करते हैं. इसीलिए हम देख सकते हैं कि जिस बड़े स्तर पर लोगों की सभाओं, सम्मेलनों, प्रदर्शनों में मीडिया की प्रस्तुति व सामग्री को लेकर शिकायतें, आलोचना व विरोध सुनने को मिलता है उसके मुकाबले एनबीएसए के समक्ष शिकायतों व अपीलों की संख्या बेहद कम हैं.

एनबीए की 2016-17 की 10 वीं सलाना रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष के दौरान 232 शिकायतों पर सुनवाई की. यदि शिकायतकर्ताओं के समाजशास्त्रीय व आर्थिक पृष्ठभूमि का अध्ययन किया जाए तो संभवत: ये तथ्य और भी स्पष्ट तौर पर सामने आ सकता है कि दर्शकों में किस वर्ग तक ही टेलीविजनों के चैनलों की सामग्री व प्रस्तुति के खिलाफ शिकायतें व अपील करने का विशेषाधिकार प्राप्त हैं.

भाषा को महज एक माध्यम के रूप में नहीं देखा जाता है. जब लोगों की आम भाषा से इत्तर और वह भी आतंकित करने वाली भाषा का इस्तेमाल हो तो उसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ होते हैं. भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में यह देखा गया है कि सार्वजनिक निगरानी तंत्र में बुनियादी बदलाव और अधिकतर लोगों की समझ से परे भाषा के इस्तेमाल को पूंज़ीवादी हितों को पूरा करने का माध्यम बनाया गया है. इस दौर को सूचना तकनीक क्रांति के रूप में देखा जाता है. लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी और संप्रेषण से जुड़ी लगभग सभी संस्थाएं खासतौर से निज़ी क्षेत्र की संस्थाओं की भाषा अंग्रेज़ी है. भारत में सरकारी और निज़ी क्षेत्र द्वारा सूचना क्षेत्र के नीतिगत मामलों को संचालित करने वाली संस्थाओं की कामकाज की भाषा अंग्रेज़ी ही है. यहां तक कि भारत सरकार की संस्था ट्राई (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के कामकाज की भाषा भी अंग्रेज़ी है.

नागरिक–दर्शक निगरानी बनाम आत्म नियमन

आत्म नियमन को यदि इस रूप में परिभाषित किया जाता है कि मीडिया पर निगरानी सरकार के स्तर पर नहीं होनी चाहिए तो आत्म नियमन का अर्थ केवल मीडिया कंपनियों के मालिकों तक सीमित नहीं होना चाहिए. मीडिया कंपनियों के टेलीविजन चैनल और उसके दर्शकों के साथ उससे प्रभावित होने वाले समाज के सदस्यों द्वारा आत्म नियमन से होना चाहिए. आत्म नियमन की बहस को इस तरह पेश किया जाता है जिससे ये लगता है कि आत्म नियमन का प्रश्न सत्ता और जनसंचार (मीडिया) कंपनियों के बीच का प्रश्न है. आत्म नियमन की बहस में दशर्कों को दर्शक ही रखने की कोशिश दिखती है. दर्शकों की बेबाक टिप्पणी और आलोचनाओं के लिए टेलीविजन चैनलों में कोई स्थान नहीं मिलता है. भारत जैसे विशाल देश में दिल्ली को टेलीविजन चैनलों के खिलाफ शिकायतों के लिए एकमात्र केन्द्र बनाया गया हैं. जबकि देश का सांगठनिक चरित्र विकेन्द्रित है. शिकायतों के लिए दिल्ली को केन्द्रित करने का अर्थ शिकायतों के लिए सामाजिक, आर्थिक सीमाओं को निर्धारित करना है. जिले स्तर पर नागरिक दर्शक निगरानी समितियों का गठन किया जाना चाहिए. ये समिति आरम्भिक स्तर पर शिकायतों को प्राप्त करें और उस पर विचार-विमर्श के बाद उन्हें टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित करने के लिए अग्रसारित करें. टेलीविजन चैनलों के लिए यह अनिवार्य हो कि वे नागरिक-दर्शक समितियों द्वारा समाचार-सामग्री की उन आलोचनाओं व टिप्पणियों के लिए समय निर्धारित करें जो कि लोकतंत्र के मूल्यबोध को विकसित करने में मदद करती हो. दर्शकों की अनुपस्थिति से आत्म नियमन की बहस केवल मीडिया कंपनियों के मालिकों के लिए बहस के रूप में नजर आती है.