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आरटीआई पार्ट-2: कैसे विजय दर्डा ने ऊर्जा मंत्रालय का इस्तेमाल कर अपने धंधे को फायदा पहुंचाया
चार अक्टूबर, 2013 को राज्यसभा में कांग्रेसी सांसद और लोकमत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन (महाराष्ट्र का सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला अख़बार “लोकमत”) व कई अन्य समाचार प्रतिष्ठानों के चेयरमैन, विजय दर्डा ने, तत्कालीन ऊर्जा राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को एक ‘निजी तथा गोपनीय’ पत्र लिखा .
इस पत्र में दर्डा ने सिंधिया से शिकायत की कि ऊर्जा मंत्रालय को ‘अच्छी और सकारात्मक’ कवरेज देने के बावजूद, मंत्रालय ने लोकमत समूह को पर्याप्त विज्ञापन नहीं दिए है. इससे पहले दर्डा ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (2010-11) के चेयरमैन के पद पर रह चुके हैं. पिछले तीन दशकों के दौरान पत्रकारिता के कई सम्मान हासिल कर चुके हैं.
इस पत्र में उन्होंने साफ तौर पर गाँधी जयंती पर मिलने वाले विज्ञापनों का हवाला दिया है, जिसमें दावा किया गया है कि “महाराष्ट्र के सभी अंग्रेजी, हिंदी, और मराठी के अख़बारों को विज्ञापन दिए गए लेकिन राज्य के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लोकमत ग्रुप के अख़बार को एक भी विज्ञापन नहीं दिया गया.’
इसके आगे दर्डा ने लिखा, “मुझे ये देखकर बड़ा दुःख होता है कि अंग्रेजी और मराठा भाषी तमाम ऐसे अखबारों को आपने विज्ञापन, टेंडर, नियुक्तियां, अध्यक्षीय भाषण, मिनिस्ट्री के युऍफ़आर या एऍफ़आर और पीएसयू के विज्ञापन थोक में दिए, जबकि उन्होंने आपकी और आपके नेताओं को हमेशा आलोचना की है. जिस लोकमत ग्रुप ने मंत्रालय की अच्छी ख़बरें छापी उसे दरकिनार किया गया.
दर्डा ने अपने पत्र का समापन कुछ इस तरह किया, “आप अपना ध्यान इस मामले पर केंद्रित कीजिए और संबंधित अधिकारियों को विज्ञापन, टेंडर , नियुक्तियां, मिनिस्ट्री के युऍफ़आर या एऍफ़आर और इससे जुड़े पीएसयू के विज्ञापन लोकमत ग्रुप को जारी करवाने में मदद कीजिये.
यह भावुकता भरा पत्र काम कर गया. एक नवम्बर को यानि एक महीने के भीतर सिंधिया के ऊर्जा मंत्रालय ने दर्डा की प्रार्थना को अपने मंत्रालय से संबद्ध सारे पीएसयू के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर को भेज दिया.
यह पत्र जिसकी सब्जेक्ट लाइन में “वीआईपी रेफरेंस लिखा था- जिसमें कि ऊर्जा मंत्रालय को अपने विज्ञापन लोकमत ग्रुप को देने की बात कही गई थी, और रेफरेंस था राज्यसभा सांसद श्री विजय दर्डा का.” इसमें सीएमडी को “जरुरी कदम” उठाने के लिए कहा गया और साथ ही मंत्रालय को भी इस पर अमल करने के लिए कहा गया गया था.
लेकिन यही पहला मामला नहीं है जब दर्डा ने अपने पद का उपयोग अपने बिजनेस हितों के लिए किया था, आरटीआई से जो दस्तावेज न्यूज़लॉन्ड्री को मिले हैं उनसे पता चलता है कि दर्डा ने दो और मौकों पर भी ऐसा ही किया था, उन मामलों में भी दर्डा ने लिखित तौर पर पीएसयू से लोकमत ग्रुप को विज्ञापन देने के लिए कहा था.
एक अक्टूबर 2012 को दर्डा ने नेशनल थर्मल पॉवर कारपोरेशन (एनटीपीसी) और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (एनएचएआई) को पत्र लिखा. दोनों पत्रों में लिखा था: “मैं आपको लोकमत समूह की तरफ से यह पत्र अग्रेसित कर रहा हूं ताकि आप इस मामले में यथोचित कार्यवाही कर सकें. अगर आप उचित कार्यवाही करेंगे तो मै आपका आभारी रहूंगा.”
एक अन्य मौके पर लोकमत ग्रुप की एवीपी (उत्तरी और मध्य भारत) अनु बेरी ने एनएचएआई के चेयरमैन आरपी सिंह को एक पत्र लिखा. 29 अक्टूबर, 2013 को लिए गए इस पत्र का सबजेक्ट था- “दिवाली विशेषांक” जिसमें लोकमत ग्रुप पब्लिकेशन को विज्ञापन देने का जिक्र था. किफायती दाम, लम्बे वक्त के लिए रियायती दरें, देने के प्रस्ताव के साथ लोकमत ग्रुप के दिवाली पर चारों संस्करण (दीपोत्सव, दीप भव, लोकमत और लोकमत समाचार) के लिए दोहरे रंगीन विज्ञापनों की मांग की गई थी और इसके लिए विशेष दरें थी 3,00,000 रूपए.
एक अखबार मालिक अपने प्रकाशन के लिए विज्ञापन हासिल करने की जुगत लगाता रहता है लेकिन दर्डा सार्वजनिक पद पर रहते हुए अपने पद का उपयोग अपने निजी फायदे के लिए कर रहे थे. इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि दर्डा अपने पत्र में खुद ही स्वीकार कर रहे हैं कि उनके अखबार ने विज्ञापन हासिल करने के लिए एक विशेष मंत्रालय के “हित में अच्छी और सकारात्मक” खबरें चलाई. यह भी इत्तेफाक है कि 2009 में लोकमत ग्रुप के ऊपर अशोक चह्वाण के पक्ष में पेड न्यूज़ छापने का आरोप लगा था.
हमने निम्नलिखित सवाल दर्डा से पूछे जो कि एक सांसद के रूप में उनके आचरण से जुड़े हैं:
- एकआरटी के जरिए मिले एक पत्र से हमें पता चला है कि 2012-2013 के बीच आपने ऊर्जा मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और दो पीएसयू प्रमुखों से लोकमत ग्रुप के प्रकाशनों के लिए विज्ञापन मांगे. क्या आप इसकी पुष्टि करेंगे?
- क्या आपको अपनी जिम्मेदारियों में एक मिडिया समूह के मालिक और एक सांसद के रूप में हितों का टकराव नजर आता है? आप मानते हैं कि आप अपने पद का दुरुपयोग अपने व्यापारिक फायदे के लिए कर रहे थे?
हमने सिंधिया को भी एक मेल भेजा है जिसमें हमने उनसे पूछा कि क्या वो ये मानते हैं कि दर्डा का पत्र जिसमें उन्होंने सकारात्मक खबरे छापने की बात लिखी है वो पेड न्यूज़ है, क्योंकि इसके बदले में दर्डा ने विज्ञापनों की मांग की है. न्यूज़लॉन्ड्री के इन सवालों का जवाब अअब तक नहीं मिला है. जब हमने सिंधिया से फ़ोन पर बात करना चाहा तो हमें बताया गया की वो विदेश में हैं.
दर्डा और सिंधिया से उत्तर मिलने के पश्चात हम इस स्टोरी को एक बार फिर से अपडेट करेंगे.
(मनीषा पांडे और अरुनभ सैकिया के साथ)
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