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हल्दी घाटी के इतिहास पर भगवे की छाया
भारत में स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों और खासकर सरकारी संस्थानों द्वारा तैयार की गई पुस्तकों की सामग्री की दशा और दिशा बदलने और उनको लेकर होने वाले विवाद नये नहीं हैं. हर बार सरकार बदलने के साथ यही प्रक्रिया दोहराई जाती है, विशेषकर तब जब यह परिवर्तन वैचारिक धरातल पर हो. असल में हैरानी की बात तो यह है कि भाजपा सरकार तीन साल पूरे कर चुकी है और एनसीईआरटी ने अब तक संशोधित पुस्तकों को जारी नहीं किया है. कई लोगों के लिए यह चिंता और अटकलें लगाने का विषय है कि एनसीईआरटी के अंदर असल में कौन सी खिचड़ी पक रही है जो देश में करोड़ों स्कूली विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तकें तैयार करने वाली नोडल एजेन्सी है. भाजपा शासित राजस्थान में हल्दी घाटी की लड़ाई को लेकर जो विवाद उठ खड़ा हुआ है, उससे हमें आने वाली चीज़ों का कुछ-कुछ अंदाज़ा लग सकता है.
विवाद
राजस्थान में दसवीं कक्षा की इतिहास की पुस्तक तथा राजस्थान विश्वविद्यालय के एमए (इतिहास) के पाठ्यक्रम में बदलाव की बड़ी अतार्किक और अजीब पहल की गई है. फरवरी 2017 में भाजपा विधायक मोहन लाल गुप्ता- जो राजस्थान विश्वविद्यालय के सिंडिकेट में सरकार के नामांकित प्रतिनिधि हैं- ने प्रस्ताव दिया कि इतिहास के पाठ्यक्रम में संशोधन करना चाहिए जिससे छात्रों को पता चले कि राजपूत शासक महाराणा प्रताप ने हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की मुगल सेना को परास्त किया था (अब तक स्थापित दृष्टिकोण यही है कि मेवाड़ के राणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूत सेना के पैर उखड़ गए थे और मुगलों ने उनका पीछा किया लेकिन वे राणा को नहीं पकड़ पाए). इस प्रस्ताव को राजस्थान सरकार के तीन मंत्रियों ने सार्वजनिक तौर पर समर्थन दिया जिनमें तत्कालीन उच्च शिक्षा मंत्री कालीचरण सर्राफ और स्कूल शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी शामिल थे.
इस तरह राजस्थान विवि के बोर्ड ऑफ स्टडीज़, जिसमें शिक्षाविद और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे प्रशासनिक अधिकरी भी शामिल हैं, द्वारा एमए (इतिहास) के दूसरे सेमेस्टर में एक नया विषय जोड़ दिया गया है- ‘हल्दी घाटी के युद्ध के परिणामों पर बहस’. इसके लिए प्रस्तावित अध्ययन सूची में एक नई पुस्तक ‘राष्ट्र रत्न महाराणा प्रताप’ का नाम जोड़ा गया है. बताया जाता है कि यह पुस्तक ‘नए शोध’ के आधार पर दावा करती है कि मुगलों के आक्रमण से राणा ने मेवाड़ को सफलतापूर्वक सुरक्षित बचा लिया था.
इस पुस्तक के लेखक चंद्रशेखर शर्मा हैं. उन्होंने ही कक्षा दस की इतिहास की पुस्तक में बदलाव किया है जिसके अनुसार अब छात्र पढ़ रहे हें कि ‘मुगलों की जीत प्रामाणिक नहीं थी’. इस विवादित अध्याय के अनुसार:
”न तो हल्दी घाटी का युद्ध बिना परिणाम के समाप्त हुआ और न ही अकबर को इसमें जीत मिली. वास्तव में मातृभूमि की रक्षा कर रहे राणा प्रताप अपने उद्देश्य में सफल हुए और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा से युक्त मुगल सम्राट अकबर की सेना मेवाड पर कब्ज़ा करने में असफल रही.”
जब मीडिया में से कुछ लोगों ने राजस्थान के मौजूदा उच्च शिक्षा मंत्री से इस बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने घोषणा कर दी, ”महाराणा प्रताप पहले स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्हें किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित कर देना ठीक नहीं हैं.”
तो आखिर हल्दीघाटी का युद्ध किसने जीता? और ये महत्वपूर्ण क्यों है?
यह सही है कि मुगल सेना महाराणा प्रताप को पकड़ नहीं पाई. पर ये भी सच है कि हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ के इस शासक को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. यहां तक कि वह इस युद्ध के बाद शाही महल से एक संप्रभु शासक के तौर पर शासन नहीं कर सके. इस बात से संशोधित पाठ्यपुस्तक में भी असहमति नहीं है. शर्मा का तर्क है कि कुछ इलाकों में महाराणा प्रताप लगभग 1580 तक जमीन के पट्टे दे रहे थे.
पर इतने से ही यह तो साबित नहीं हो जाता है कि उनके अधीन सारा क्षेत्र उनके नियंत्रण में था और उनकी संप्रभुता इतनी क्षीण नहीं हुई थीं कि फिर से पहली जैसे न हो सकें. हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा को विजेता घोषित करते ही वे सारी लोककथाएं, किंवदंतियां और लोकगीत बेकार साबित हो जाएंगे जो पुन: सेना खड़ी करने के लिए दुर्गम स्थानों पर उनकी यात्राओं और संघर्ष की गाथाएं बयान करते हैं.
यहां महत्वपूर्ण ये भी है कि इस युद्ध में किसी का विजेता घोषित होना जरूरी नहीं है. आज की तरहं अतीत में भी युद्ध सभी पक्षों को प्रभावित करते थे. विशेषज्ञता के अभाव में लोग अक्सर युद्ध को फुटबाल मैचों के नजरिए से देखने लगते हैं जिसमें विजेताओं और पराजितों की सूची स्पष्ट होती है. लेकिन ऐतिहासिक संदर्भों में सशस्त्र संघर्ष को दिलचस्प बनाने वाले सवाल जीत या हार से नहीं अक्सर कुछ और मुद्दों से जुड़े होते हैं. मसलन ऐसे क्या ऐतिहासिक कारण थे जिससे युद्ध की स्थिति बनी? लड़ने वाले पक्षों का युद्ध के बाद क्या हुआ? किसके लिए कितना महत्वपूर्ण था ये युद्ध?
मतलब यह कि ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल वे होते हैं जो किसी संघर्ष से जुड़े व्यापक संदर्भों के बारे में बात करते हैं. इसलिए एक स्तर पर राजस्थान के इतिहासकारों का पुरानी अवधारणाओं को उलटने के लिए यह तथ्य उजागर करना गले नहीं उतरता. यह बचपने की बात है कि जिस नायक (इस मामले में महाराणा प्रताप) के साथ वह खुद को जोड़कर देखते हैं, अब अतीत में वापिस लौटकर जबरन उसे विजेता बनाने पर तुले हुए हैं. और यही वह मसला है जिसके चलते एक महत्वपूर्ण मुद्दा और उभरता है.
क्या आधुनिक इतिहासशास्त्र में इतिहास के एक से ज्यादा संस्करणों को अच्छा नहीं माना जाता है? तो फिर समस्या क्या है?
इतिहास के आधुनिक शैली में लेखन सहित इतिहासशास्त्र की अभी तक की सभी परंपराओं का इस बात पर जोर रहा है कि इतिहास का कोई इकलौता संस्करण नहीं होना चाहिए और एक ही घटना के विविध कथ्यात्मक वर्णन होने चाहिए. यह भी उतना ही सच है कि वर्तमान की राजनीति हमारे अतीत की समझ को प्रभावित करती है. तो भला फिर मुगल-मेवाड़ संघर्ष का एक और संस्करण स्वीकार करने में हर्ज क्या है? इस विवाद में दो प्रमुख मुद्दे हैं जिन पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है:
(1) इतिहास के विविध संस्करणों का मतलब यह नहीं कि बिना स्रोतों का आधार दिए हम अतीत के बारे मनगढ़ंत फंतासियां गढ़ते रहें. निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इतिहासकारों को विविध स्रोतों की उचित संदर्भों में जांच करनी चाहिए. तथ्य सही होने चाहिएं, यह सबसे मूलभूत बात है.
सो असली मुद्दा विजेता को सम्मानित करने का नहीं है. समस्या यह है कि एक चुनी हुई सरकार राष्ट्रीय स्वाभिमान व राजपूतों के गौरव को एकमात्र मेवाड़ के शासक के साथ ही जोड़ रही है. हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि हल्दी घाटी की जंग भी आधुनिक काल से पहले शासकों द्वारा लड़ी गई उन्हीं लड़ाईयों की तरह थी जो अकूत धन संपत्ति अर्जित करने और साम्राज्यों के विस्तार के लिए लड़ी गई थीं. उनमें फर्क सिर्फ इतना था कि वे अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों और धर्मों से जुड़े हुए थे.
मेवाड़ के महाराणा और मुगल सम्राट अकबर दोनों की नजर उन इलाकों में कृषि और व्यापार से होने वाली आय पर थी जिसके लिए दोनों संघर्ष कर रहे थे. इससे उन्हें अपने मंत्रियों और सैन्य अधिकारियों को अपने पक्ष में रखने में मदद मिलती और उनकी युद्ध लड़ने की क्षमता में वृद्धि होती. उनमें से कोई भी अपनी प्रजा के लिए पालनहार नहीं था, न ही दोनों में से कोई ‘देश’ के नाम पर शासन करने की दुहाई दे रहा था. जो राज्य, राष्ट्र (कम से कम नाम के लिए ही) के हित में शासन करता है उसे राष्ट्रराज्य कहा जाता है. यह एक ऐसी राजनीतिक इकाई है जो आधुनिकता का आरंभ होने के साथ अस्तित्व में आई.
महाराणा प्रताप को एक स्वतंत्रता सेनानी (उस भगत सिंह की तर्ज पर जो औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई में आजादी के सिपाही थे) मानना असल में भ्रम पैदा करने जैसा है.
इसमें शक नहीं कि महाराणा अपने से ज्यादा मजबूत सेना के खिलाफ बड़ी बहादुरी से लड़े. पर मध्ययुग के अन्य सभी राजवंशों की तरह वह भी संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए ही यह जंग लड़ रहे थे. ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे पता चले कि उन राजपूती रियासतों में, जहां मुगल शासन का स्थानीय शासकों पर अंकुश था वहां प्रजा की स्थिति बेहतर या खराब थी.
(2) राष्ट्रीय स्वाभिमान को जगाने के लिए ऐतिहासिक रूप से गलत तथ्यों का प्रयोग करना अनुचित है. इससे पूरा देश एक संकीर्ण ढांचे में ढल जाएगा. क्योंकि ऐसे ऐतिहासिक कथन हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की बुनियाद पर खड़े होते हैं.
दक्षिणपंथी विचारक इस अवधारणा के आधार को बड़ी चालाकी से पाठकों अथवा दर्शकों के अनुरूप सामने रखते और इस्तेमाल करते हैं. अंग्रेजी चैनलों पर संघ परिवार की ओर से धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलने वाले वक्ता इस मुद्दे पर बड़ी चालाकी से घुमा-फिरा कर एक किस्म का दृष्टिकोण रखते हैं तो दूसरी तरफ इधर जिला स्तर पर उनकी पार्टी कार्यकर्ता और व्हाट्सएप पर सक्रिय कार्यकर्ता इतिहास की आड़ में मध्यकाल के इतिहास को हिंदू मुस्लिम संघर्ष के रूप में तोड़मरोड़ कर फौलाते हैं. संसद और विधानसभाओं के भीतर और बाहर भाजपा नेता अक्सर ‘एक हजार साल की गुलामी’ की बात करते नज़र आते हैं. खुद प्रधानमंत्री ने यह बयान दिया है. यह ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और मुस्लिम शासकों को एक ही पलड़े में तोलने की कोशिश है.
यह सच है कि आधुनिक काल से पहले राज्य सामान्य तौर पर दमनकारी थे, ‘मुस्लिम शासित’ राज्य भी इसी श्रेणी में थे. पिछले 50 सालों में दिल्ली सल्तनत, पाल, प्रतिहार, चोल व मुगल शासकों के शोषण को कई इतिहासकार प्रमुखता से सामने लाए हैं. इस पर इतनी चर्चा हो चुकी है कि अब ज्यादातर विद्वानों की रूचि भी इस मामले में खत्म हो गई है.
लेकिन किसी भी मुस्लिम राजवंश ने अंग्रेजों की तरह भारत पर राज नहीं किया. उन्होंने स्थानीय संसाधन किसी दूसरे देश को नहीं भेजे और न ही उन्होंने सारा लाभ केवल अपने धर्म के अनुयायियों तक सीमित रखा. कई बार कुछ विशेष कारणों से वे इस तरह के कदम उठाते भी थे पर उनकी नीतियों को कोर्ई भेदभावपूर्ण नहीं कह सकता था. किसानों का गला दबाकर उनसे पैसे वसूलने के मामले में सभी शासक, मुस्लिम भी और हिंदू भी, एक ही जैसे सख्तदिल थे.
शासन करने वाले अभिजात्य वर्ग के सदस्य विभिन्न धर्मों से चुने जाते थे और धर्म के आधार पर वे कभी पक्षपात नहीं करते थे. वे अपने दोस्त और दुश्मन बनाने में अवसरवादी थे और हमारे मौजूदा शासक वर्ग से एकदम अलग नहीं थे जो रातोंरात सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने वाले स्वरूप को त्यागकर भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े योद्धा में तब्दील हो जाते हैं.
हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ के राणा का सबसे प्रमुख कमांडर था हकीम खान सुर जो मुगलों के सबसे विश्वस्त सिपहसालार मान सिंह से लोहा ले रहा था. मेवाड़ के अतिरिक्त सभी प्रमुख राजपूत वंशो के शासक मुगलों को राजपूतों में ही एक जाति मानकर उनसे विवाह संबंध जोड़ते रहे और अपनी बेटियां उस परंपरा के तहत देते रहे जिसमें राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा मजबूत जाति अपने से राजनीतिक रूप से कमजोर जाति से विवाह में लड़कियां लेती है. इस पंरपरा के अनुसार अपेक्षाकृत राजनीतिक रूप से ज्यादा मजबूत मानी जाने वाली जाति विवाह में कभी भी अपनी बेटियां राजनीतिक दृष्टि से कमजोर जाति को नहीं देती है.
अगर राजनीतिक मसलों पर हमारी राय से ऐतिहासिक समस्याओं के प्रति हमारी सोच प्रभावित होती है तो ऐसे में प्रोफेशनल इतिहासकारों की उपस्थिति की संभावना रहनी चाहिए जिससे वे विरोधाभासी ऐतिहासिक कथ्यों की जंग में हस्तक्षेप कर सकें. अब हमारे सामने सवाल ये है कि हमारे राजनीतिक वर्ग और देश की जनता के तौर पर हमारी स्वयं की सोच क्या है?
क्रिकेट की दुनिया, जो दक्षिण एशिया में राष्ट्र की अवधारणा को लेकर विपरीत विचारों की जंग का एक और आधुनिक युद्धस्थल बन चुका है, के उदाहरण से समस्या और स्पष्ट हो जाएगी. सितम्बर 2007 में पहला टी-20 विश्व कप दक्षिण अफ्रीका में हुआ था. फाइनल में सबसे पहले हारने वाली टीम के कप्तान शोएब मलिक को बुलाया गया. उनसे कुछ शब्द कहने को कहा गया तो उन्होंने अपनी बात की शुरूआत ही सारी दुनिया के मुस्लिमों से माफी मांगने के साथ की और साथ ही उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी टीम ने हर संभव प्रयास किया था. बात साफ है मलिक को कहीं न कहीं ये लग रहा था कि भारत-पाकिस्तान का मुकाबला अब मुस्लिमों और गैर मुस्लिमों के बीच का मुकाबला है.
भारत की ओर से खेल रहे इरफान पठान को इस मुकाबले में मैन ऑफ द मैच के खिताब से नवाज़ा गया जबकि भारतीय टीम को इस पूरी श्रृंखला में यहां तक लाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युसूफ पठान ने निभाई जिन्हें ‘मैन ऑफ द सीरीज़’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. बेचारे मलिक को इन तथ्यों का अहसास नहीं था. हमें भूलना नहीं चाहिए कि पाकिस्तान के राष्ट्रवाद की डगमगाती इमारत स्वयं एक संकीर्ण और इकतरफा इतिहास की नींव पर खड़ी है. भारत ने बतौर राष्ट्र अपने आधार कुछ अलग सिद्धांतों को बनाया है. ऐसे में ध्यान रहे कि पाकिस्तान के पदचिन्हों पर चलकर हमें कुछ हासिल नहीं होगा.
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