क्या अखिलेश यादव को जगन मोहन रेड्डी से राजनीति सीखनी चाहिए?

अखिलेश यादव और जगन मोहन रेड्डी में जो सबसे बड़ा फर्क़ है, वह यह कि अखिलेश यादव को पार्टी विरासत में मिली और 2012 के बाद उसका ढलान ही दिखायी दे रहा है, लेकिन जगन मोहन रेड्डी ने खुद पार्टी बनायी और अपने सूझ–बूझ और अथक प्रयासों के साथ उसे बुलंदियों की तरफ लेते चले गये.

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और आंध्रप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के बीच एक बड़ी समानता है कि दोनों के पिता मुख्यमंत्री रहे हैं और दोनों नेताओं की उम्र में सिर्फ एक साल का फर्क़ है. इन दोनों नेताओं में जो सबसे बड़ा फर्क़ है, वह यह कि अखिलेश यादव को पार्टी विरासत में मिली और 2012 के बाद उसका ढलान ही दिखायी दे रहा है, लेकिन जगन मोहन रेड्डी ने खुद पार्टी बनायी और अपने सूझ–बूझ और अथक प्रयासों के साथ उसे बुलंदियों की तरफ लेते चले गये.

23 मई को परिणाम के बाद जगन मोहन रेड्डी ने जिस तरह से ऐतिहासिक जीत आंध्र प्रदेश में हासिल की है, वह सबको चौंकाने वाली थी. 175 विधानसभा की सीट में 151 तथा 25 लोकसभा की सीट में 22 सीटें जीतकर उन्होंने राजनीतिक पंडितों को भी हैरत में डाल दिया. इतनी बड़ी जीत के पीछे की वजह, क्या कार्यालय में बैठकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना था या कुछेक गिनी–चुनी रैली भर थी? ऐसा बिलकुल नहीं था. जगन मोहन रेड्डी ने चौदह महीनों के भीतर 3600 किलोमीटर की पदयात्रा की. ‘प्रजा संकल्प यात्रा’ निकाली, करोड़ों लोगों से मुख़ातिब हुए, 134 विधानसभाओं में पदयात्रा के दौरान लोगों को संबोधित किया. इतनी बड़ी सफलता के पीछे इतनी कड़ी मेहनत और इतना बड़ा संघर्ष छिपा है.

अखिलेश यादव अपने नेतृत्व में अब तक दो लोकसभा और एक विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हारने के बावजूद भी वातानुकूलित कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के अलावा शायद ही आक्रामक तरीके से जनता के बीच गये होंगे. पदयात्रा तो दूर खुद की साइकिल यात्रा निकालना भी दुश्वार समझा. यह अब भी विचारणीय है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य और भाजपा जैसी धनबल वाली पार्टी से क्या सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस करके जीता जा सकता है. बीते इतने सालों में कई ऐसे मौके आये, जिसमें भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर राजनीति गरमायी, लेकिन कोई आंदोलन तो दूर धरना प्रदर्शन तक नहीं किये गये. जबकि ममता बनर्जी जैसी नेता तो मुख्यमंत्री रहते हुए भाजपा की ज़्यादती के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गयी थी. इन सब हालात को देखने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अखिलेश यादव सुविधापरस्त राजनीति के अभ्यस्त हो गये हैं, जिनकी राजनीतिक दुनिया वैचारिकी, आंदोलन और संघर्ष सोशल मीडिया पर ट्वीट करने तक सीमित हो चुकी है.

13 पॉइंट रोस्टर जैसा काला कानून बनाकर भाजपा सरकार जब दलित, पिछड़ों का हक मारने की कोशिश कर रही थी, उस दौरान भी भारत बंद में शामिल होना तो दूर प्रेस कॉन्फ्रेंस करना तक उन्‍होंने उचित नहीं समझा. जब सपा सरकार में 56 यादव एसडीएम होने की अफ़वाह तेज़ी से उड़ायी जा रही थी, तब भी सफाई देने के बजाय वे मौन ही रहे जिसकी वजह से अफ़वाह को और बल मिला. चुनाव परिणाम आने के बाद इधर कई सपा कार्यकर्ताओं की हत्‍या हुई लेकिन उसे लेकर भी कोई खास गंभीरता नहीं दिखायी, वरना सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाने से बाद की होने वाली घटनाओं को रोका जा सकता था.

कार्यकर्ताओं को किस तरह सम्मान दिया जा सकता है, यह अखिलेश यादव को बीजेपी से सीखने की ज़रूरत है. अमेठी में जब बीजेपी कार्यकर्ता की मौत हुई तो स्मृति ईरानी ने महिला होने के बावजूद कंधा दिया, जो कार्यकर्ता के सम्मान में मिसाल साबित हो गया. यही नहीं, पश्चिम बंगाल और केरल में जब उसके कार्यकर्ताओं की हत्या हुई तो भाजपा ने पूरा तांडव मचा दिया. मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी उनके परिवार जनों को बुलाकर सम्मानित किया. अपने कार्यकर्ताओं का हौसला और मनोबल बढ़ाने का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है. भाजपा जानती है कि किसी भी पार्टी की असली ताकत कार्यकर्ता होते हैं.

जगन मोहन रेड्डी की राजनीतिक यात्रा बता रही है कि जनता के साथ जुड़ने का जुनून हो तो नयी पार्टी बनाकर भी सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा जा सकता है. यदि राजनीति संघर्षों का रास्ता छोड़कर सुविधापरस्त हो गयी तो उसका फिर ढलान भी निश्चित है, जैसा इस वक्त सपा में दिखायी दे रहा है. पिता के हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद जगन मोहन रेड्डी की राजनीतिक यात्रा में काफी उतार–चढ़ाव भी आये. जब उन्‍होंने कांग्रेस से अलग होकर 2011 में पार्टी बनायी, तो उनकी संपत्ति में बढ़ोत्तरी के मामले को लेकर कई मुकदमे भी दर्ज़ हुए, जिसकी वजह से उन्हें 16 महीना जेल में भी काटना पड़ा. उधर विरोधियों का हमला भी जारी रहा, किन्तु विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हौसलापस्त नहीं हुआ.

जगन मोहन रेड्डी ने सामाजिक न्याय को लेकर एक नायाब उदाहरण पेश किया है जिस पर अखिलेश यादव को भी भविष्य में अमल करना चाहिए. उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ ही पांच उपमुख्यमंत्री बनाने की पहल की है जो पांचों अलग–अलग समुदाय का प्रतिनिधित्व करेंगे. एक अनुसूचित जनजाति से, दूसरे अनुसूचित जाति से, तीसरे पिछड़ी जाति से, चौथे अल्पसंख्यक समुदाय से, पांचवें कापू समुदाय से होंगे. सामाजिक विविधता को देखते हुए हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने का यह विचार सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करता है.

इसके उलट देखा जाये तो सपा से गैर-यादव पिछड़ी जतियों का लगभग मोहभंग सा दिखायी दे रहा है. इस चुनाव में जब मुझे खुद अपने गांव के दूसरे जाति समूहों से बात करने का अवसर मिला तो ऐसा ही प्रतीत हुआ, जो कभी सपा का वोटर हुआ करते थे, आज उनका भाजपा के प्रति प्रेम दिखायी दिया, क्योंकि उन्हें सपा में अपने समाज के मजबूत नेता का अभाव दिखायी दे रहा था. इस चीज़ को भाजपा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुत चतुराई से साध लिया है.

पिछले दिनों चुनाव हारने के बाद गठबंधन पर टिप्पणी करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि मैं विज्ञान का छात्र हूं, यह एक प्रयोग था जो असफल हो गया. राजनीति कोई विज्ञान की प्रयोगशाला नहीं है जिसे आप यह कहकर छुटकारा पा लें कि प्रयोग असफल रहा. एक वैज्ञानिक अपना प्रयोग बंद कमरे की लेबोरेटरी में कर सकता है लेकिन राजनेता को तो अन्तत: जनता के साथ सुख–दुख का हिस्सा बनना ही पड़ता है. राजनीति की प्रयोगशाला जनता है जिसके बीच गये बगैर सफलता मिलना नामुमकिन है. विज्ञान में धैर्य के साथ प्रयोग किया जा सकता है लेकिन राजनीति में बेचैनी ज़रूरी है. अधिक धैर्यवान होने से राजनीति आगे निकल जाती है और राजनेता पीछे छूट जाता है.

(जितेंद्र यादव दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं. लेख मीडिया विजिल से साभार.)

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